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जिनकी नज़रों में थे रास्ते और भी- बलबीर सिंह राठी

Post Views: 203  ग़ज़ल जिनकी नज़रों में थे रास्ते और भी, जाने क्यों वो भटकते गये और भी। मैं ही वाक़िफ़ था राहों के हर मोड़ से, मैं जिधर भी

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