Tag Archives: गोहाना

हरियाणा में अनुसूचित जाति आयोग

सुरेंद्र पाल सिंह  हरियाणा में जाति आधारित शोषण-उत्पीड़न अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय रहा। सामाजिक स्तर पर बहुत जघन्य कांड  हरियाणा के समाज ने देखे। शासकीय मशीनरी में भी भेदभाव के आरोप लगते रहे हैं। निदान के लिए मानवाधिकार आयोग और अनुसूचित जाति आयोग के गठन की जरूरत महसूस की गई और लोगों ने इस तरह की व्यवस्था बनाने

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बलबीर सिंह राठी – ऐसे अपनी दुआ क़ुबूल हुई

 ग़ज़ल ऐसे अपनी दुआ क़ुबूल हुई, राह तक मिल सकी न मंजि़ल की, कारवाँ से बिछडऩे वालों को, उन की मंजि़ल कभी नहीं मिलती। खो गई नफ़रतों के सहरा1 में, प्यार की वो नदी जो सूख गई। राह बचकर निकल गई हमसे, वो तो मंजि़ल वहीं पे आ पहुंची। मेरे सर पर तना रहा सहरा, ये हवाओं की कोई साजि़श

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बलबीर सिंह राठी – ये अलग बात बच गई कश्ती

 ग़ज़ल   ये अलग बात बच गई कश्ती, वरना साजि़श भंवर ने ख़ूब रची। कह गई कुछ वो बोलती आँखें, चौंक उट्ठी किसी की ख़ामोशी। हम तो लड़ते रहे दरिन्दों से, तुम ने उन से भी दोस्ती कर ली। दिन भी होगा किसी के आँगन में, अपने चारों तरफ तो रात रही। यूँ भी अक्सर हुआ है मेरे घर, रात,

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बलबीर सिंह राठी – पहले कोई ज़ुबाँ तलाश करूँ

 ग़ज़ल पहले कोई ज़ुबाँ तलाश करूँ, फिर नई शोखियाँ1 तलाश करूँ। अपने ख्वाबों की वुसअतों2 के लिए, मैं नये आसमां तलाश करूँ। मंजि़लों की तलाश में निकलूँ, मुस्तकिल3 इम्तिहाँ तलाश करूँ। मेरी आवारगी ये माँग करे, मैं नई दूरियाँ तलाश करूँ। फिर मसल्सल फ़रेब खाने को, तुझ सा फिर मेहरबां तलाश करूँ। हर तरफ नफ़रतों के सहरा हैं, प्यार मैं

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बलबीर सिंह राठी – कौन बस्ती में मोजिज़ा गर है

 ग़ज़ल कौन बस्ती में मोजिज़ा गर है, हौंसला किस में मुझ से बढ़ कर है। चैन    से   बैठने   नहीं   देता, मुझ में बिफरा हुआ समन्दर है। लुट रहे हैं मिरे नफ़ीस ख्याल, कोई रहज़न भी मेरे अन्दर है। आदमी से हैं लोग ख़ौफ़ ज़दा, वहशियों से किसी को क्या डर है। ज़ुल्मों-इन्साफ़ की लड़ाई में, मेरा दुश्मन तो हर

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बलबीर सिंह राठी – कौन कहता है कि तुझको हर खुशी मिल जाएगी

 ग़ज़ल कौन कहता है कि तुझको हर खुशी मिल जाएगी, हां मगर इस राह में मंजि़ल नई मिल जाएगी। अपनी राहों में अंधेरा तो यक़ीनन है मगर, हम युँही चलते रहे तो रोशनी मिल जाएगी। इस क़दर सीधा है, ये रिश्तों का सारा सिलसिला, मेरे अफ़साने में तेरी बात भी मिल जाएगी। यूँ अंधेरी बंद गलियों में खड़े हो किस

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बलबीर सिंह राठी – जिनकी नज़रों में थे रास्ते और भी

 ग़ज़ल जिनकी नज़रों में थे रास्ते और भी, जाने क्यों वो भटकते गये और भी। मैं ही वाक़िफ़ था राहों के हर मोड़ से, मैं जिधर भी चला चल दिये और भी। जो कहा तुम ने वो हर्फ़े आख़िर न था, थे हक़ीक़त के कुछ सिलसिले और भी। अक्स टेढ़े लगे उसमें तुम को मगर, आइने के थे कुछ ज़ाविये1

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बलबीर सिंह राठी – कैसी लाचारी का आलम है यहाँ चारों तरफ़

 ग़ज़ल कैसी लाचारी का आलम है यहाँ चारों तरफ़, फैलता जाता है ज़हरीला धुआं चारों तरफ़। जिन पहाड़ों को बना आए थे हम आतिश फ़शां1, अब इन्हीं से ज़लज़ले2 होंगे रवां चारों तरफ़। ऐसे मंज़र3 में हमें जि़द्द है किसी गुलज़ार4 की, एक सहरा और ख़ाली आसमां चारों तरफ़। हो सका तो मैं बहारें ले के जाऊँगा वहाँ, सूखे पेड़ों

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बलबीर सिंह राठी – जो भी लड़ता रहा हर किसी के लिये

 ग़ज़ल जो भी लड़ता रहा हर किसी के लिये, कुछ न कुछ कर गया आदमी के लिये। जो अंधेरे मिटाने को बेताब था, ख़ुद फ़रोज़ां1 हुआ रोशनी के लिये। राहतें बख़्श दीं जिसने सब को वही, क्यों तरसता रहा हर खुशी के लिये। जि़ल्लतों2 के उक़ाबों3 ने नोचा उसे, जो मसीहा बना आदमी के लिये। जिनके दम से उजाले थे

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बलबीर सिंह राठी – करें उम्मीद क्या उस राहबर से

ग़ज़ल   करें उम्मीद क्या उस राहबर से, जो लौट आया हो मुश्किल रहगुज़र से, जो लगते थे बड़े ही मअतबर1 से, वो कैसे गिर गये मेरी नज़र से। मैं कैसे छोड़ दूं मौजों से लडऩा, अभी निकली कहाँ कश्ती भंवर से। जुनूँ वालों को जाने क्या समझ कर, डराते हैं वो अंजामे-सफ़र से। जो सब को छोड़ कर सीढ़ी

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