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सुरजीत सिरड़ी की तीन कविताएँ

सुरजीत सिरड़ी हरियाणा राज्य के सिरसा जिले में रहते हैं तथा पेशे से एक शिक्षक हैं। सुरजीत मूलतः पंजाबी भाषा के कवि हैं। इनकी कविताओं में इतिहास के साथ संवाद के समानांतर वर्तमान राजनैतिक चेतना भी नजर आती है जो पाठक को एक पल के लिए ठहरकर सोचने को विवश करती है।
एक साहित्यकार का दायित्व है कि वो अपने आस पास घट रही घटनाओं पर पैनी नजर रखे; इन कविताओं में गम्भीर किसान विमर्श नजर आता है. प्रस्तुत है किसानी चेतना से लबालब उनकी तीन कविताएं-

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किसान आंदोलन: लीक से हटकर एक विमर्श- सुरेन्द्र पाल सिंह

सुरेन्द्र पाल सिंह- जन्म – 12 नवंबर 1960 शिक्षा – स्नातक – कृषि विज्ञान स्नातकोतर – समाजशास्त्र सेवा, व्यावहारिक मनौवि‌ज्ञान, बुद्धिस्ट स्ट्डीज – स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से सेवानिवृत लेखन – सम सामयिक मुद्दों पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख प्रकाशित सलाहकर – देस हरियाणा कार्यक्षेत्र – विभिन्न संस्थाओं व संगठनों के माध्यम से सामाजिक मुद्दों विशेष तौर पर लैंगिक संवेदनशीलता, सामाजिक न्याय, सांझी संस्कृति व साम्प्रदायिक सद्भाव के निर्माण में निरंतर सक्रिय, देश-विदेश में घुमक्कड़ी में विशेष रुचि-ऐतिहासिक स्थलों, घटनाओं के प्रति संवेदनशील व खोजपूर्ण दृष्टि। पताः डी एल एफ वैली, पंचकूला मो. 98728-90401

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कॉर्पोरेट कृषि में पूँजी निवेश और अपराधीकरण- विकास नारायण राय

नब्बे के दशक में आये उदारीकरण के दौर ने हरियाणा के ऐसे तमाम गावों में ‘बुग्गी ब्रिगेड’ के रूप में खेती से विमुख बेरोजगारों के आवारा झुण्ड पैदा कर दिए थे। पंजाब के गावों में भी इस दौरान उत्तरोत्तर नशे का चलन बढ़ता गया है। लेकिन मंडी और एमएसपी व्यवस्था ने कृषि और किसानी के जुड़ाव को जिंदा रखा हुआ था। कॉर्पोरेट कृषि व्यवस्था इसे जड़ों से अस्थिर करने वाली प्रणाली है। (लेख से)

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किसानों के तूफान के आगे नहीं टिकेगा कोई गुमान सरकार किसानों से बात करे और निकाले समाधान- अरुण कुमार कैहरबा

(लेखक हिंदी विषय के अध्यापक तथा देसहरियाणा पत्रिका के सह-सम्पादक हैं .)

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हरित क्रान्ति के जनक प्रो. एम.एस.स्वामीनाथन – अमर नाथ

आजादी के बाद देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा था, “बाकी सभी चीजों के लिए इंतजार किया जा सकता है, लेकिन कृषि के लिए नहीं।” उस समय हमारे देश की आबादी 30 करोड़ से कुछ अधिक थी। सन 1947 में किसी शादी-ब्याह में 30 से ज्यादा लोगों को नहीं खिलाया जा सकता था, जबकि आज तो जितना पैसा हो, उतने लोगों को दावत दी जा सकती है। आज सरकारी गोदामों में वर्षों के लिए सुरक्षित गेहूं और चावल का भंडार मौजूद है। इस गुणात्मक परिवर्तन के सूत्रधार हैं हरित क्रान्ति के जनक प्रो. एम.एस.स्वामीनाथन।

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गांधी क्या बला है! – चौधरी छोटू राम

Post Views: 850 अनुवाद-हरि सिंह बटलर ने अन्य विषयों के अलावा भारतीय राजनीति पर छाई गांधी नामक परिघटना को भी अपने इस किसान-मित्र के माध्यम से जानना चाहा। जवाब में…

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भारत में अंग्रेजी राज के दो पहलू -चौधरी छोटू राम

Post Views: 487 चौधरी छोटू राम, अनुवाद-हरि सिंह बटलर ने छोटू राम को  लंदन से लिखा-‘भारत में अंग्रेजी राज आज भी खूब धमाके से चल रहा है। ऐसा क्यों और…

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सरकार और आजादी – सर छोटू राम

Post Views: 435 चौधरी छोटू राम, अनुवाद-हरि सिंह हार्टकोर्ट बटलर का मानना था कि तमाम सरकारें नागरिक आजादी पर हावी होती हैं। 1923-24 में, बकौल छोटू राम, ब्रिटिश सरकार का…

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भारतीय नारियां: चौधरी छोटू राम

Post Views: 395 चौधरी छोटू राम, अनुवाद-हरि सिंह बटलर द्वारा पर्दा-प्रथा, शिक्षा एवं सामाजिक जीवन में महिलाओं से भेदभाव पर टिप्पणियों के जवाब में चौधरी छोटू राम ने एक ओर…

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अंग्रेजी राज की न्याय-व्यवस्था: एक सटीक टिप्पणी -चौधरी छोटू राम

Post Views: 349 चौधरी छोटू राम, अनुवाद-हरि सिंह चौधरी छोटू राम खुद वकील होने के नाते ब्रिटिश न्याय प्रणाली को भली-भांति समझते थे। बटलर ने मित्रता के नाते इस विषय…