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एक पाठक – मक्सिम गोर्की

“रुको नहीं, मेरे साथ तुम सही रास्ते पर हो” उसने कहा, “बात शुरू करो, तुम मुझे यह बताओ कि साहित्य का उद्देश्य क्या है ?” मेरा अचरज बढ़ता जा रहा था और आत्मसंतुलन घटना जा रहा था । आखिर यह आदमी मुझसे चाहता क्या है? और यह है कौन ? निस्संदेह वह एक दिलचस्प आदमी था, लेकिन मैं उससे खीज उठा था । (कहानी से)

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आकशदीप- जयशंकर प्रसाद

‘आकाशदीप’ जयशंकर प्रसाद की बहुचर्चित कहानी है. यह कहानी ‘आकशदीप’ नामक कहानी संग्रह में संकलित है जिसका प्रकाशन सन् 1929 में हुआ था. कहानी की नायिका चम्पा को अपने पिता के हत्या के आरोपी बुधगुप्त से ही प्रेम हो जाता है. इस कहानी में प्रसाद जी ने कर्तव्य और प्रेम के मध्य अंतर्द्वन्द्व को चित्रित किया है.

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अपना अपना भाग्य- जैनेन्द्र

अपना-अपना भाग्य कहानी 1931 ई० लिखी गई थी, जो ‘वातायन’ कहानी संग्रह में संकलित है। यह कहानी संवाद शैली में लिखी गई है। इस कहानी में जैनेन्द्र ने मध्यवर्गीय समाज में व्याप्त स्वार्थपरकता को उजागर किया है. इस कहानी में गुलाम भारत के शहर नैनीताल के परिवेश का चित्रण मिलता है.

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गैंग्रीन /रोज- अज्ञेय

‘रोज़’ शीर्षक कहानी अज्ञेय के कहानी संकलन ‘विपथगा’ के पहले संस्करण में है। पर ‘विपथगा’ के पाँचवें संस्करण में, जो सन् 1990 ई. में नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली द्वारा प्रकाशित हुआ, यही कहानी ‘गैंग्रीन’ शीर्षक से प्रकाशित है। इस कहानी में अज्ञेय ने मध्यवर्गीय जीवन में नित्य की दिनचर्या के कारण व्याप्त एकरसता तथा उबाऊपन को चित्रित किया है. इस कहानी को ‘नई कहानी’ की पूर्व पीठिका के रूप में जाना जाता है.

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लाल पान बेगम- फणीश्वर नाथ रेणु

‘ठुमरी’ संग्रह में संकलित ‘लाल पान की बेगम’ सन् 1956 की कहानी है। इलाहाबाद से प्रकाशित ‘कहानी’ पत्रिका के जनवरी, 1957 के अंक में यह प्रकाशित हुई थी। पुंज प्रकाश ने इस कहानी का नाट्य रूपान्तरण भी किया है, जिसे सन् 2017 में—शारदा सिंह के निर्देशन में—पटना के ‘कालिदास रंगालय’ में मंचित किया गया। बिरजू की माँ के द्वारा ‘स्त्री सशक्तिकरण’ की मिशाल पेश की गई है। इस कहानी में बिरजू की माँ अपनी जिन्दगी अपने शर्तों पर जीती है, पूरे आत्मसम्मान एवं ठसक के साथ। (स्त्रोत- इन्टरनेट)

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कोसी का घटवार- शेखर जोशी

‘कोसी का घटवार’ शेखर जोशी की प्रसिद्ध कहानियों में से एक है. इसका प्रकाशन सन् 1958 में हुआ था. यह कहनी सामाजिक पिछड़ेपन की वजह से अधूरे रह गए प्रेम पर आधारित है. कहानी में पहाड़ी परिवेश का चित्रण कहानी को जीवंतता प्रदान करता है.

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अमृतसर आ गया है- भीष्म साहनी

‘अमृतसर आ गया है’ कहानी समकालीन कहानीकारों में अग्रणी भीष्म साहनी के ‘पहला पाठ’ कहानी संग्रह में संकलित है. हिंदी की भारत- पाक विभाजन आधारित कहानियों में यह कहानी अत्यंत प्रसिद्ध हुई है. इस कहानी में विभाजन के कारण एक चलती हुई रेल में उत्पन्न हुए सांप्रदायिक माहौल का चित्रण किया गया है.

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चीफ की दावत- भीष्म साहनी

भीष्म साहनी की कहानी ‘चीफ की दावत’ 1957 में प्रकाशित उनके कहानी संग्रह ‘पहला पाठ’ की सर्वाधिक चर्चित कहानी है. इस कहानी में भीष्म सहनी ने एक कम्पनी में काम करने वाले बेटे की मध्यवर्गीय मानसिकता को चित्रित किया है जिसमें वह अपनी माँ को अपने अधिकारी के समक्ष अप्रस्तुतियोग्य समझता है. अपने अपमान के बावजूद भी माँ अपने बेटे की उन्नति की ही कामना करती है.

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सिक्का बदल गया- कृष्णा सोबती

देश विभाजन से संबंधित कृष्णा सोबती की कहानियों में सबसे चर्चित एवं प्रसिद्ध कहानी है- “सिक्का बदल गया” है। इसका प्रकाशन ‘प्रतीक’ में 1948 में हुआ था। इस कहानी की मुख्य पात्र शाहनी नाम की एक पचास वर्षीय बुजुर्ग औरत है जो कि भारत-पाक विभाजन के कारण अपना घर-बार, खेत खलिहान छोड़कर विस्थापित होने पर मजबूर है. इस कहानी के केंद्र में विभाजन से उपजी त्रासदी ही है.

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पिता- ज्ञानरंजन

साठोत्तरी पीढ़ी के ‘चार यार’ के रूप में प्रसिद्ध मंडली के चार सदस्यों – ज्ञानरंजन, दूधनाथ सिंह, काशीनाथ सिंह एवं रवीन्द्र कालिया में से एक ज्ञानरंजन ने केवल 25 कहानियों की रचना की है जिसमें से एक भी सभी कहनियाँ अपने शिल्प और वस्तु के स्तर पर बेजोड़ है. इन्हीं कहानियों में से कहानी है ‘पिता’. इस कहानी में ज्ञानरंजन ने नई और पुरानी पीढ़ी के संस्कारों तथा मान्यताओं में टकराहट और अन्तर्विरोध का शानदार चित्रण मिलता है.