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बस्स! बहुत हो चुका-ओम प्रकाश वाल्मीकि

Post Views: 8 जब भी देखता हूँ मैं झाड़ू या गंदगी से भरी बाल्टी-कनस्तर किसी हाथ में मेरी रगों में दहकने लगते हैं यातनाओं के कई हज़ार वर्ष एक साथ…

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ठाकुर का कुआँ- ओम प्रकाश वाल्मीकि

Post Views: 10 चूल्‍हा मिट्टी कामिट्टी तालाब कीतालाब ठाकुर का । भूख रोटी कीरोटी बाजरे कीबाजरा खेत काखेत ठाकुर का । बैल ठाकुर काहल ठाकुर काहल की मूठ पर हथेली…

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मैं आदमी नहीं हूँ- मलखान सिंह

Post Views: 10 एक मैं आदमी नहीं हूँ स्साब जानवर हूँ दोपाया जानवर जिसे बात-बात पर मनुपुत्र—माँ चो—बहन चो— कमीन क़ौम कहता है। पूरा दिन— बैल की तरह जोतता है…

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अंधेरे में – गजानन माधव मुक्तिबोध

Post Views: 27 ज़िन्दगी के…कमरों में अँधेरेलगाता है चक्करकोई एक लगातार;आवाज़ पैरों की देती है सुनाईबार-बार….बार-बार,वह नहीं दीखता… नहीं ही दीखता,किन्तु वह रहा घूमतिलस्मी खोह में ग़िरफ्तार कोई एक,भीत-पार आती…

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एक रग का राग – गजानन माधव मुक्तिबोध

Post Views: 15 ज़माने की वक़त और बेवक़तधड़कती धुकधुकीनाड़ियाँ फड़कती देखकरखुश हुए हम किबगासी और उमस के स्वेद मेंभीगी हुई उकताहट-उचाट खत्म हुईऔर कुछ ज़ोरदारसनसनीखेज कुछ,गरम-गरम चाय के साथ-साथमिल गई…

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भूल-गलती – गजानन माधव मुक्तिबोध

Post Views: 17 भूल-गलतीआज बैठी है जिरहबख्तर पहनकरतख्त पर दिल के;चमकते हैं खड़े हथियार उसके दूर तक,आँखें चिलकती हैं नुकीले तेज पत्थर सी,खड़ी हैं सिर झुकाए         …

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हरिजन गाथा – नागार्जुन

Post Views: 16 कविता (1) ऐसा तो कभी नहीं हुआ था !महसूस करने लगीं वेएक अनोखी बेचैनीएक अपूर्व आकुलताउनकी गर्भकुक्षियों के अन्दरबार-बार उठने लगी टीसेंलगाने लगे दौड़ उनके भ्रूणअंदर ही अंदरऐसा…

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प्रतिबद्ध हूँ, संबद्ध हूँ, आबद्ध हूँ – नागार्जुन

Post Views: 4 कविता प्रतिबद्ध हूँसंबद्ध हूँआबद्ध हूँ प्रतिबद्ध हूँ, जी हाँ, प्रतिबद्ध हूँ –बहुजन समाज की अनुपल प्रगति के निमित्त –संकुचित ‘स्व’ की आपाधापी के निषेधार्थ…अविवेकी भीड़ की ‘भेड़या-धसान’…

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कालिदास – नागार्जुन

Post Views: 9 कविता कालिदास! सच-सच बतलानाइन्दुमती के मृत्युशोक सेअज रोया या तुम रोये थे?कालिदास! सच-सच बतलाना! शिवजी की तीसरी आँख सेनिकली हुई महाज्वाला मेंघृत-मिश्रित सूखी समिधा-समकामदेव जब भस्म हो…

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बादल को घिरते देखा है – नागार्जुन

Post Views: 5 अमल धवल गिरि के शिखरों पर,बादल को घिरते देखा है।छोटे-छोटे मोती जैसेउसके शीतल तुहिन कणों को,मानसरोवर के उन स्वर्णिमकमलों पर गिरते देखा है,बादल को घिरते देखा है।…