Tag Archives: कविता

” झुकना मत “

” झुकना मत “ जैसे ही डाक्टर ने कहा झुकना मत। अब और झुकने की गुंजाइश नही… सुनते ही उसे.. हँसी और रोना , एक साथ आ गया। ज़िंदगी में पहली बार वह किसी के मुँह से सुन रही थी ये शब्द …..।। बचपन से ही वह घर के बड़े, बूढ़ों माता-पिता, चाची, ताई, फूफी,मौसी.. अड़ोस पड़ोस, अलाने-फलाने, और समाज

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दायरे

विनोद सिल्ला कविता कर लिए कायम दायरे सबने अपने-अपने हो गए आदि तंग दायरों के कितना सीमित कर लिया खुद को सबने नहीं देखा कभी दायरों को तोड़ कर अगर देख लेता तोड़ कर इनको तो हो जाता उन्मुक्त पक्षियों की तरह जिन्हें नहीं रोक पाते छोटे-बड़े दायरे नहीं कर पाती सीमित इनकी उड़ान को देशों-प्रदेशों की या अन्य प्रकार

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अवसरवादी मुस्टंडा

महावीर शर्मा एक नन्हा सा अवसरवादी मुस्टंडा जो मेरे जन्म के वक़्त किसी काली सुरंग से भीतर घुस आया था जवान हो गया है एक जहरीले नाग की तरह । जब वह मचलता है तो फुंकारता है उसकी चिरी हुई जीभ मेरे नथुनों में लपलपाती है मेरा सांस लेना दूभर हो जाता है और एक कंपकंपी दौड़ जाती है मेरे

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धुनकर-बुनकर

डा. श्रेणिक बिम्बिसार तुक-तुक तांय-तांय शब्दों को रूई सा धुनें आओ कविता बुनें चौपाईयों सी लय थाप हो गज़ल के काफिए सी दोहों की सुगमता में भर जाए कबीर सी क्रांति रसों के तानों-बानों में उलझें रुपक कुछ ऐसे चुनें आओ कविता बुनें छंदों की धड़कन में चर्खे सी चाल हो स्वतःस्फूर्त आंदोलन से दमक उठे कविता का तार-तार निर्वस्त्र

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जंगली कौन

विनोद सिल्ला कितना भाग्यशाली था आदिमानव तब न कोई अगड़ा था न कोई पिछड़ा था हिन्दू-मुसलमान का न कोई झगड़ा था छूत-अछूत का न कोई मसला था अभावग्रस्त जीवन चाहे लाख मजबूर था पर धरने-प्रदर्शनों से कोसों दूर था कन्या भ्रूण-हत्या का पाप नहीं था किसी ईश्वर-अल्लाह का जाप नहीं था न भेदभावकारी वर्ण-व्यवस्था थी मानव जीवन की वो मूल

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मुनाजात-ए-बेवा

अल्ताफ़ हुसैन हाली पानीपती   मुनाजात-ए-बेवा (1884) ए सब से अव्वल1 और आखिर2 जहाँ-तहाँ हाजि़र और नाजि़र3 ए सब दानाओं से दाना4 सारे तवानाओं से तवाना5 ए बाला हर बाला6 तर से चाँद से सूरज से अम्बर से ए समझे बूझे बिन सूझे जाने पहचाने बिन बूझे सब से अनोखे सब से निराले आँख से ओझल दिल के उजाले ए

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ए हिन्द-पाक के लोगो

अमृतलाल मदान (पिछले पचासों सालों से साहित्य सृजन में सक्रिय वरिष्ठ साहित्यकार अमृतलाल मदान हरियाणा के कैथल शहर के निवासी हैं। नाटक, कविता, उपन्यास, यात्रा आदि लगभग हर विधा में साहित्य रचना कर रहे हैं। प्रगतिशील मूल्य व चेतना इनके साहित्य का केंद्रीय सूत्र है। सांप्रदायिक शक्तियों के खिलाफ निरंतर संघर्ष करते रहे हैं।  – सं।) ऐ हिन्द-पाक के लोगो

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लजीज खाना

विनोद सिल्ला कविता मैं जब कई दिनों बाद गया गाँव माँ ने अपने हाथों से बनाई रोटी कद्दू की बनाई मसाले रहित सब्जी रोटी पर रखा मक्खन लस्सी का भर दिया गिलास खाने में जो मजा आया इसके सामने मुझे लगा किसी रैस्टोरैंट का शाही पनीर कुछ भी नहीं

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सूखा

डॉ. निधि अग्रवाल ( गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश)  में जन्म। बचपन से पढने और लिखने का शौक। एम बी बी एस के बाद पैथोलॉजी में परास्नातक की शिक्षा। वर्तमान में झांसी (उत्तर ) में निजी रूप से कार्यरत। कविताएँ, कहनियाँ और सामाजिक विषयों पर ब्लॉग आदि का लेखन) सूखा सूख गए सब नदियाँ-पोखर नैना बरसे बन परनाले इस बरस भी न

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गाँवन की भिनसार

डॉ. निधि अग्रवाल ( गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश)  में जन्म। बचपन से पढने और लिखने का शौक। एम बी बी एस के बाद पैथोलॉजी में परास्नातक की शिक्षा। वर्तमान में झांसी (उत्तर ) में निजी रूप से कार्यरत। कविताएँ, कहनियाँ और सामाजिक विषयों पर ब्लॉग आदि का लेखन)   नहीं लड़ती घड़ी की सुइयों से गाँवन की भिनसार चिरैया की चिचयान

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