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एक विद्रोही स्त्री – आलोक श्रीवास्तव

इस समाज में शोषण की बुनियाद पर टिके संबंध भी प्रेम शब्द से अभिहित किये जाते हैं एक स्त्री तैयार है मन-प्राण से घर संभालने, खाना बनाने कपड़ा धोने और झाड़ू-बुहारी के लिये मुस्तैद है पुरुष उसके भरण-पोषण में हां, बिचौलियों के जरिये नहीं, एक-दूसरे को उन्होंने ख़ुद खोजा है और इसे वे प्यार कहते हैं और मुझे वेरा याद

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