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गाँधी जी की राष्ट्रभाषा ‘हिन्दुस्तानी’ का क्या हुआ? – अमरनाथ

वैसे भी हिन्दुस्तानी कहने से जिस तरह व्यापक राष्ट्रीयता और सामाजिक समरता का बोध होता है उस तरह हिन्दी कहने से नहीं. जैसे पंजाबियों की पंजाबी, मराठियों की मराठी, बंगालियों की बंगाली, तमिलों की तमिल, गुजरातियों की गुजराती का बोध होता है उसी तरह हिन्दुस्तानी कहने से हिन्दुस्तानियों की हिन्दुस्तानी का बोध होता है. (लेख से)

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चिन्दी चिन्दी होती हिन्दी। हम क्या करें?- अमरनाथ

स्मिताओं की राजनीति करने वाले कौन लोग हैं ? कुछ गिने –चुने नेता, कुछ अभिनेता और कुछ स्वनामधन्य बोलियों के साहित्यकार। नेता जिन्हें स्थानीय जनता से वोट चाहिए। उन्हें पता होता है कि किस तरह अपनी भाषा और संस्कृति की भावनाओं में बहाकर गाँव की सीधी-सादी जनता का मूल्यवान वोट हासिल किया जा सकता है। (लेख से)

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तुलसी की लोकप्रियता का रहस्य- अमरनाथ

सारा अभियान अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध है और समता और न्याय पर आधारित समाज की स्थापना के लिए है.  उन्होंने एक आदर्श राज्य – रामराज की परिकल्पना की है जो हमारे युग के महानतम व्यक्ति गांधी का भी सपना बन गया. (लेख से)

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पूजा में बलि- प्रथा- अमरनाथ

बलि के पीछे का मुख्य कारण इन्सान का मांस भक्षण है. जबतक इन्सान को दूसरे जानवरों के मांस में स्वाद मिलेगा तबतक वह उनकी कुर्बानी भी करता रहेगा, जानवरों की बलि भी देता रहेगा. इन्सान अपने ईश्वर को वही चीजें भेंट करता है जो वह खुद पसंद करता है (लेख से)

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हिन्दी वालों की हिन्दी वालों से हिन्दी के लिए लड़ाई- अमरनाथ

आज यदि अभिभावक अंग्रेजी माध्यम की मांग कर भी रहे हैं तो उसका कारण स्पष्ट है. अंग्रेजी पढ़ने से नौकरियां मिलती हैं. जब चपरासी तक की नौकरियों में भी सरकार अंग्रेजी अनिवार्य करेगी तो अंग्रेजी की मांग बढ़ेगी ही. यह एक ऐसा मुल्क बन चुका है जहां का नागरिक चाहे देश की सभी भाषाओं में निष्णात हो किन्तु एक विदेशी भाषा अंग्रेजी न जानता हो तो उसे इस देश में कोई नौकरी नहीं मिल सकती (लेख से )

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हिन्दी जाति और उसका साहित्य- अमरनाथ

वस्तुत: हिन्दी साहित्य के इतिहास में जिसे हम अबतक रीतिकाल कहते आये हैं वह रीतिकालीन ब्रजभाषा का साहित्य हमारे जातीय साहित्य की मुख्य धारा का हिस्सा नहीं है, क्योंकि यह साहित्य तत्कालीन बहुसंख्यक जनता की चित्तवृत्तियों को प्रतिबिम्बित नहीं करता। अपवादों को छोड़ दें तो दो सौ वर्षों से भी अधिक समय तक के इस कालखण्ड के अधिकाँश हिन्दी कवि दरबारी रहे और अपने पतनशील आश्रयदाता सामंतों की विकृत रुचियों को तुष्ट करने के लिए श्रृंगारिक कविता या नायिकाभेद लिखते रहे। (लेख से)

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राष्ट्रीय शिक्षा नीति- 2020 : ठेंगे पर राजभाषा- अमरनाथ

शिक्षा को पूरी तरह निजी हाथों में सौंप देगी. शिक्षा इतनी मंहगी हो जाएगी कि ज्ञान और प्रतिष्ठित नौकरियां भी थोड़े से अमीर लोगों के हाथ में सिमटकर रह जाएंगी. अपने घरों में स्थानीय बोलियाँ बोलने वाले किसानों और मजदूरों के ग्रामीण बच्चे भला महानगरों के पाँच सितारा अंग्रेजी माध्यम वाले बच्चों का मुकाबला कैसे कर सकेंगे? (लेख से)

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पराई भाषा में पढ़ाई और गाँधी जी- अमरनाथ

गाँधी जी चाहते थे कि बुनियादी शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक सब कुछ मातृभाषा के माध्यम से हो. दक्षिण अफ्रीका प्रवास के दौरान ही उन्होंने समझ लिया था कि अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा हमारे भीतर औपनिवेशिक मानसिकता बढ़ाने की मुख्य जड़ है. ‘हिन्द स्वराज’ में भी उन्होंने लिखा कि, “करोड़ों लोगों को अंग्रेजी शिक्षण देना उन्हें गुलामी में डालने जैसा है. (लेख से )

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हिन्दी जाति का संगीत और सिनेमा – डॉ. अमरनाथ

गुलशन बावरा, कैफी आजमी, अली सरदार जाफरी, मजरूह सुल्तानपुरी, कमाल अमरोही, शकील बदायूंनी, साहिर लुधियानवी, गुलजार, जावेद अख्तर और निदा फाजली तक अधिंकांश बड़े गीतकार उर्दू के हैं किन्तु न तो उनके गीतों को ‘उर्दू गीत’ कहा जाता है और न तो उनकी फिल्मों को हम ‘उर्दू फिल्में’ कहते हैं .

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प्रेमचंद : हिन्दी के जातीय स्वरूप के सच्चे पारखी – अमरनाथ

Post Views: 12 जन्मदिन पर विशेष  प्रेमचंद का भाषा- चिन्तन जितना तार्किक और पुष्ट है उतना किसी भी भारतीय लेखक का नहीं है. ‘साहित्य का उद्देश्य’ नाम की उनकी पुस्तक…