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किसान आंदोलन के पर्यायवाची स्वामी सहजानन्द सरस्वती के किसानों के नाम दो संबोधन

स्वामी सहजानन्द सरस्वती (22-2- 1889-26-6-1950) भारत के राष्ट्रवादी नेता एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। वे भारत में किसान आन्दोलन के जनक थे। वे आदि शंकराचार्य सम्प्रदाय के दसनामी संन्यासी अखाड़े के दण्डी संन्यासी थे। वे एक बुद्धिजीवी, लेखक, समाज-सुधारक, क्रान्तिकारी, इतिहासकार एवं किसान-नेता थे।
मुख्य कृतियाँ- भूमिहार-ब्राह्मण परिचय, ब्रह्मर्षि वंश विस्तर, मेरा जीवन संघर्ष, जंग और राष्ट्रीय आजादी, किसानों के दावे, कर्मकलाप, क्रांति और संयुक्त मोर्चा, गीता हृदय इत्यादि।
उन्होने ‘हुंकार’ नामक एक पत्र भी प्रकाशित किया।

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त्योहारी कुण्डलियाँ- सत्यवीर नाहडिय़ा

सत्यवीर नाहडिय़ा- रेवाड़ी जिले के नाहड़ गांव में 15 फरवरी, 1971 को जन्म। एम.एस.सी और बी.एड. की उपाधि। “लोक-राग” नामक हरियाणवी रागनी-संग्रह प्रकाशित। चंडीगढ़ से “दैनिक ट्रिब्यून” में ‘बोल बखत के’ नाम से दैनिक-स्तंभ। हरियाणवी फिल्मों में संवाद-लेखन। रा.व.मा.व. बीकेपुर रेवाड़ी में रसायन शास्त्र के प्राध्यापक के पद पर सेवारत।

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विज्ञान को हिन्दी में सुलभ कराने वाले हिंदी के अप्रतिम योद्धा : गुणाकर मुले – प्रो. अमरनाथ

(लेखक कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं.)

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हिन्दी की गांधीवादी आलोचना -प्रो. अमरनाथ

गांधी जी के अनुसार सच्चा प्रजातंत्र कभी भी हिंसा और दंड-विधान के बल पर कायम नहीं किया जा सकता. व्यक्ति के पूर्ण और स्वतंत्र विकास के लिए जनतांत्रिक समाज को परस्पर सहयोग और सद्भाव, प्रेम और विश्वास पर आधारित रहना चाहिए. मानवता का विकास इन्हीं सिद्धांतों के आधार पर आज तक हुआ है और आगे भी होगा. (लेख से)

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ः मुक्ति और प्रेम के कवि- प्रो. सुभाष चन्द्र

फैज का रचनाकार अपने जीवन अनुभवों की पूंजी से रचना करता है, इसीलिए वह लाऊड होकर भी विश्वसनीय होती है। अपने युग के अन्तर्विरोधों, सत्ता की क्रूरताओं-अत्याचारों और मेहनतकश के संघर्षों-आन्दोलनों को अभिव्यक्त करने का संकल्प लिया और उस दायित्व को बखूबी निभाया। फैज शायरी में अपने निजी दुख-दर्दों-पीड़ाओं का रोना नहीं रोते, बल्कि अपनी तकलीफों और जमाने की तकलीफों को एकमएक कर देते हैं। अपने अनुभवों का विस्तार करके उनको आमजन की तकलीफों से गूंथ देने से फैज की कविताएं सामूहिक गान और आह्वान गीत की शक्ल अख्तियार करती जाती हैं और पाठक पर गहरा असर करती है। (लेख से)

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बूढ़ासागर की पथरीली पटरियों पर: एक संस्मरण – कनक तिवारी

दिग्विजय महाविद्यालय के परिसर में अपने जिस पहले मकान में वे रहे थे, ठीक उसके पीछे बूढ़ासागर की पथरीली पटरियों पर बैठकर उस वक्त के शीर्षक ‘आशंका के द्वीपः अंधेरे में‘ वाली कविता का एकल श्रोता बनना मेरे नसीब में आया। (पोस्ट से)

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अंतिम बेला में- रविंद्रनाथ ठाकुर, अनुवाद- योगेश शर्मा

योगेश शर्मा कुरुक्षेत्र विश्विद्यालय में हिंदी स्नातकोत्तर के अंतिम वर्ष के छात्र और देस हरियाणा की प्रबन्धन टीम का हिस्सा हैं