मेरी ओर हुए आकर्षित, ऐसे नए व्यक्ति हो तुम?

Post Views: 164 वाल्ट व्हिट्मन (1819-1892) मेरी ओर हुए आकर्षित, ऐसे नए व्यक्ति हो तुम?   मेरी ओर हुए आकर्षित, ऐसे नए व्यक्ति हो तुम? चेता दूँ शुरुआत में तुम्हें,…

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मीडिया में हरियाणवी महिला की छवि – सहीराम

Post Views: 626 सहीराम  मीडिया में हरियाणवी महिला की छवि क्या है? जैसे हरियाणवी पुरुष जिसे आमतौर पर हाळी-पाळी कहा जाता है, की छवि खेतों में खटनेवाले एक मेहनतकश किसान…

पूंजीवाद और स्वास्थ्य सेवाओं की बीमारी – नवमीत

Post Views: 294 सार्वजनिक स्वास्थ्य का आधुनिक इतिहास भारत में ब्रिटिश काल से शुरू होता है जब अंग्रेजों ने भारत में अपना शासन सुदृढ़ करने के लिए अन्य चीजों के…

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बुरे मणस का सग करै क्यूँ – कर्मचंद केसर

Post Views: 171 हरियाणवी ग़ज़ल बुरे मणस का सग करै क्यूँ। मन की स्यान्ति भंग करै क्यूँ। मानवता कै बट्टा लाग्गै, दीन दुखी नैं तंग करै क्यूँ। काग बणैं नां…

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बन्दा रिक्शा खींच रहा है – ओम सिंह अशफाक

Post Views: 258 ओमसिंह अशफाक  1 नया-नया किसी गांव से आया लगता है झिझका शर्माया ना रहने का कोई ठौर ठिकाना यूं शहर लगे उसको बेगाना संदर—सुंंदर भवन बणे हैं…

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दुक्ख की इसी होई बरसात – कर्मचंद केसर

Post Views: 338 हरियाणवी ग़ज़ल दुक्ख की इसी होई बरसात। निखर गया सै मेरा गात। बिद्या बिन नर रह्ये अनाड़ी, जणु कोय दरखत सै बिन पात। बूढ़े माँ-बापां की खात्तर,…

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मुसाफिर जाग सवेरा होग्या – कर्मचंद केसर

Post Views: 245 हरियाणवी ग़ज़ल मुसाफिर जाग सवेरा होग्या। चाल आराम भतेरा होग्या। कलजुग म्हं सच चढ़ग्या फांसी, झूठे के सिर सेहरा होग्या। सारा कुणबा मिलकै रह था, इब सबका…

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रुक्खाँ जिसा सुभा बणा ले – कर्मचंद केसर

Post Views: 149 हरियाणवी ग़ज़ल रुक्खाँ जिसा सुभा बणा ले। सबनै हँंसकै गले लगा ले। जीणा भी तो एक कला सै, सोच-समझ कै टेम बित्या ले। राजा दुखिया रंक सुखी…

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बुरी संगत म्हं जो भी पड़ग्या – कर्मचंद केसर

Post Views: 177 हरियाणवी ग़ज़ल बुरी संगत म्हं जो भी पड़ग्या। उसका समझो डूंह्ड उजड़ग्या। कतल केस म्हं सजा भुगत कै, नेता बण संसद म्हं बड़ग्या। जद कोयल की कूक…

हिंदी दलित साहित्य – 2018

Post Views: 783 बजरंग बिहारी तिवारी हिंदी दलित साहित्य : 2018      अन्य भारतीय भाषाओँ की तुलना में हिंदी दलित साहित्य इस मायने में भिन्न है कि यहाँ रचनाकारों की…