Category Archives: हरियाणवी सिनेमा

ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन

विकास साल्याण  (देस हरियाणा फ़िल्म सोसाइटी के तत्वावधान में डा. ओमप्रकाश ग्रेवाल अध्ययन संस्थान, कुरुक्षेत्र में 2 सितंबर 2018 को पर्यावरण संकट पर केन्द्रित फ़िल्म ‘कार्बन’ की प्रस्तुति की गई, जिसमें विभिन्न विद्वानों, बुद्धिजीवियों व नागरिकों ने फ़िल्म पर चर्चा में हिस्सा लिया। फिल्म में मुख्य भूमिका में यशपाल शर्मा, जैकी भगनानी,नवाजुद्दीन सिद्दिकी, प्राची देसाई हैं । इस संवेदनशील फ़िल्म

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विकास साल्याण – अलीगढ़ : समलैंगिकता पर विमर्श

समलैंगिकता को अलग-अलग दृष्टि से देखा जाता है कुछ समलैंगिकता को मानसिक बीमारी मानते हैं। कुछ इसे परिस्थितियों के कारण उत्पन्न आदत मानते हैं तो कुछ एक सामान्य प्राकृतिक कृत्य मानते हैं। लेकिन तीनों ही स्थितियों में किसी भी प्रकार से इसे अपराध या पाप नहीं माना जा सकता। वह कार्य जिसे बिना किसी को कोई नुकसान पहुंचाए अपनी इच्छा

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स्वच्छ हवा और पानी एक बिजनेस बन गया है

गतिविधि ‘देस हरियाणा फिल्म सोसाइटी’ के माध्यम से हर महीने ही सामाजिक सरोकारों से जुड़ी फिल्मों का प्रदर्शन किया जाएगा और उस पर गंभीर चर्चा होगी जिससे हरियाणा में फिल्म देखने के नजरिये में गुणात्मक बदलाव आएगा। ‘डा. ओमप्रकाश ग्रेवाल अध्ययन संस्थान, कुरुक्षेत्र’ में (2 सितंबर 2018) पर्यावरण संकट पर केन्द्रित फ़िल्म ‘कार्बन’ की प्रस्तुति की और विभिन्न विद्वानों,बुद्धिजीवियों व

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सहीराम – कुछ मुंबइया फिल्में और हरियाणवी जनजीवन का यथार्थ

                सिनेमा अभी तक यही माना जाता रहा है कि हरियाणवी जन जीवन खेती किसानी का बड़ा ही सादा और सरल सा जन जीवन है। इसमें न कोई छल-कपट है, ना कोई दिखावा है, ना कृत्रिमता, ना कोई बनावट है और ना ही कोई दोहरापन है। ना कोई जटिलता है, ना किसी तरह

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विकास साल्याण – ‘दायरा’ संकीर्ण सामाजिक दायरों पर प्रहार

सिनेमा-चर्चा रोहतक के फि़ल्म एवम् टेलीविजन संस्थान के छात्रों द्वारा बनाई गई ‘दायरा’ फि़ल्म हरियाणवी सिनेमा को नई दिशा की ओर ले जा रही है। इस फिल्म में उस गहरे व कड़वे मुद्दे को उठाया गया है। जिसके कारण हरियाणा विश्व में प्रसिद्ध है वह मुद्दा है ऑनर-किलिंग का। जो वास्तव में बड़ा गम्भीर व संवेदनशील विषय है। लेकिन ‘दायरा’

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सत्यवीर नाहडिया -पचास साल का सफर हरियाणवी सिनेमा

सिनेमा हरियाणा प्रदेश के स्वर्ण जयंती वर्ष के पड़ाव पर यदि हरियाणवी सिनेमा की स्थिति का सूक्ष्म अध्ययन करें तो निराशा ही हाथ लगती है। सन् 1984 मेंं प्रदर्शित हुई हरियाणवी फीचर फिल्म चंद्रावल ने सही मायने में प्रदेश के गीत-संगीत एवं संस्कृति की अमिट छाप छोड़ी तथा इस फिल्म ने आशातीत सफलता अर्जित की किंतु ‘चंद्रावल’ से पहले या

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गुरनाम कैहरबा – हरियाणा में उभरता रंगमंच

रंगमंच आर्थिक रूप से समृद्ध माने जाने वाले हरियाणा प्रदेश में नाटक-रंगमंच व कला का क्षेत्र लगातार उपेक्षित रहा है। जिस वजह से यहां पर कलात्मक पिछड़ापन देखा जा सकता है। हरियाणा में कोई समृद्ध परम्परा नही रही। मगर वर्तमान में  हरियाणा में रंगमंच के नए अंकुर फुट रहे हैं जो हरियाणा में बड़े सांस्कृतिक बदलाव का संकेतक है। समकालीन

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ज़ोहरा बाई अम्बाला वाली (अम्बाला) – महेन्द्र प्रताप चांद

ज़ोहराबाई बहुत ही शिष्ट, सुशील और स्वाभिमानी महिला थीं। फिल्मी दुनिया में वे अपने हर गीत के लिए दो हजार रुपए पारिश्रमिक लेती थीं, जो उस समय एक बहुत बड़ी राशि थी। बसंत देसाई के संगीत में बनी एक फिल्म ‘मतवाला शायर राम जोशी’ में उन्होंने बीस गाने गाये थे और चालीस हजार रुपए पारिश्रमिक लिया था। सन् 1950 के बाद कुछ नई गायिकाएं आ गईं और इन्हें कम पारिश्रमिक पर गाने के लिए कहा गया तो इन्होंने इसे स्वीकार करने की अपेक्षा फिल्मों में गाना ही छोड़ दिया। जबकि अधिकतर कलाकार प्राय: दौलत और शोहरत के पीछे भागते हैं, लेकिन ज़ोहराबाई पब्लिसिटी से बहुत दूर रहती थीं और प्रेस वालों से भी बहुत बिदकती थीं।

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सिनेमा में हरियाणा

   यह पहली हरियाणवी फिल्म ‘‘चंद्रावल’’ के आने से पहले की बात है जब हिंदी की एक बड़ी हिट फिल्म आयी थी। नाम था ‘नमक हलाल’। यह हिंदी फिल्मों में अमिताभ बच्चन का जमाना था और अमिताभ बच्चन की उन दिनों थोड़ा आगे-पीछे मिलते-जुलते नामोंवालो दो फिल्में आयी थी – एक ‘नमक हलाल’ और दूसरी ‘नमक हराम’। ‘नमक हलाल’ में मालिक के नमक का हक अदा करने वाले जहां खुद अमिताभ बच्चन थे, वहीं ‘नमक हराम’ में फैक्टरी मालिक बने अमिताभ बच्चन अपने जिगरी दोस्त को इसलिए ‘नमक हराम’ मान लेते हैं क्योंकि खुद उन्होंने ही अपने इस जिगरी दोस्त को मजदूरों के बीच मजदूर बनाकर भेजा तो हड़ताल वगैरह तोड़ने के लिए था, लेकिन मजदूरों के दुख-तकलीफों को देखकर वह उनका हमदर्द बन जाता है। अच्छी बात यह है कि नमक हलाली हरियाणवियों के हिस्से आयी थी।

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