Category Archives: हरियाणवी लोक-विनोद

जीजा कई दिन हो लिए तां जांदा नी

एक बै रमलू बहु नै लेण चल्या गया। जब सासु अपणी छोरी ने घालण तै नाट ग्यी तो ओ पांच-सात दिन ओड़ै डटग्या सुसराड़ में। एक दिन उसकी साली बोल्यी-जीजा कई दिन हो लिए तां जांदा नी। रमलू फट बोल्या-तेरी बाह्ण म्हारे कई-कई म्हीने रहें जा, मैं तो कदे नी कहंदा ‘तूं जांदी कोनी’। या सुणकै साली बोल्यी-फेर वा तो

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तूं किमे न किमे जरूर बदलेगा

एक बै एक आदमी ने बस खरीद ली अर चलाण खात्तिर एक ड्राईवर राख लिया। ओ मालिक था घणाए बेईमान, सारी हाठा न्यूं सोचदा अक् कड़े यू ड्राईवर किमे न किमे राछ ना बदल ले। ड्राईवर ने बस चलाण तांही गेर लाया तो ओ पास में एक खडय़ा था-न्यूं बोल्या-के करै सै? ड्राईवर बोल्या-गेर बदलूं सूं। मालिक फट बोल्या-देख्या, मैैं

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थाम भी के बस ल्योगे

संक्रात का दिन था। किसान नै सुण राख्या था अक् संक्रांत ने गरूड़ दीखज्या तो बड़ा आच्छा हो सै। उसने खेत मेें तै आंदे होए राही में एक भर्या होया गुरुड़ पा ग्या। वो उसने ठाकै अर खेश में लपेट कै चाल पडय़ा गाम कानी। गाम धोरै सी दो-तीन जणे खड़े बतलाण लागर्ये थे। वो उन धोरै जाकै न्यू बोल्या-भाई

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ऊकडूं बैठणा अर फूंक मारणा ए घरेलू सै

एक देहाती शहर के डाक्टर धोरै जाकै बोल्या-डाक्टर साब, मेरै खांसी जुकाम होर्या सै कोए देशी घरेलू सा नुक्सा बताओ नै। डाक्टर बोल्या-1 किलो चीनी, 50 ग्राम छुहारे, 10 ग्राम सौंठ, 10 ग्राम अदरक, 10 ग्राम मुलैह्ठी, 10 ग्राम ईलायची, पाणी में उबाल कै अर ऊकडूं बैठ कै-फूंक मार-मार कै पी लिए। देहाती न्यूं बोल्या-डाक्टर साब-‘म्हारै तो इनमें तै ऊकडूं

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लेके रहेंगे-लेके रहेगे

एक बै जागरूक माच्छरां नै मिलकै एक सभा बुलाई-उनका नेता बोल्या-भाईयो! ‘हमारे साथ बड़ी बेइन्साफी हो रही है-जुल्म ढाए जा रहे हैं। देखो-साबुन के लिए साबुणदानी, मसालों के लिए मसालादानी’ चूहों के लिए चूहेदानी-परन्तु हमारी माच्छरदानी पर तो माणसां नै कब्जा कर राख्या सै। साथियो-उठो और कसम खाओ-माच्छरदानी में रहणे का हक लेकर रहांगे’ सभी श्रोता मच्छर भी नारे लगाने

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मेज तलै है जी

एक बै एक स्कूल में डी.ओ. चली गई। उस स्कूल को दसमी कलास में छोरे पढ़ाई में रद्दी थे अर उनके नाम थे-होशियार सिंह और कशमीर सिंह। उननै जब बेरा पाट्या अक् डी.ओ. चैकिंग करैगी तो कश्मीर मेज तलै जा लुह्क्या। डी.ओ. नै क्लास में आणा ए था। आकै ने भारत का नक्शा बोर्ड पै बणाकै अर् न्यूं बोल्ली-होशियार सिंह

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-‘वेरी गुड

  एक अणपढ़ माणस नै अंग्रेजी सीखण का शौंक होग्या। सिखाण आला मास्टर भी भागां करकै ए मिलग्या। एक हफ्ते में तीन शब्द सिखाए-‘यश, नो, वैरी गुड’। अनपढ़ नै तो तीनों रट लिए। इसे बीच में एक दिन गाम में चोरी हो ग्यी। पुलिस चोरां नै टोह्वण लागर्यी थी अक् राह में वो ए माणस टकराग्या। पुलिसियां नै पूच्छ्या भाई

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जुत्ती हाथां म्हें ठार्या सूं

  एक छिकमा एं कंजूस दुकानदार था। उसकी देखमदेख छोरा उसतै भी घणा मंजी होग्या। एक दिन दुकानदार सांझ नै आण की क्है कै शहर चला गया। दिन छिप गया। बाबु नहीं आया तो छोरा दुकानदार करकै घरा चल्या गया। घरा जायां पाच्छै उसकै याद आई अक् बिजली चसदी ए रहग्यी। ओ बंद करण खात्तर उल्टा ए चल दिया। न्यून

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ना तो तिसाइये रह ज्यागी

लोकविनोद एक बै एक गादड़ अर एक गादड़ी रैहट पै पाणी पीण चले गए जब गादड़ी पाणी पीण लागदी तो रैहट की कटा-कट की आवाज तै पाणी पीणा छोड़ देंदी। गादड़ बोल्या-के बात सै? गादड़ी बोली अक् जब मैं पाणी पीण लागूं सूं या कटा-कट होण लागज्या सै। गादड़ नै समझाया अक् बावली इस कटा-कट म्हैं ए पी गी तो

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तेरा बाब्बु भी आर्या सै

लोक-विनोद मां के मर्यां पाच्छै रमलू नै एक दिन पूच्छा करवाई तो उसनै न्यूं बता दिया अक् तेरी मां कुतिया की जोनी में गई है, तूं उसकी सेवा करेगा तो तेरे जरूर लाभ होवैगा। रमलू जाण लागर्या था, राह में एक कुतिया देखी तो उसने मैं समझ कै घरां ले आया। घरवाली तै सारी बात समझा कै उसकी सेवा करण

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