Category Archives: हरियाणवी लघुकथा

जाय रोया जाड्डा   

सोनिया सत्यानिता  रेडियो आळी दादी के नाम से जाने जाने वाली दादी को “ओबरी आळी”भी कह्या करते। बड़ा सी ओबरी, फिर आँगन ठीक दो मंजली घर उसका। भाग की विडंबना। ओबरी आळी दादी के दस किल्ले। पर मालिक कोई नहीं । दादा गुजर गए थे उसके ब्याह तै  पांच साल पाछै। याणी उम्र म्हं बाप की उम्र के आदमी के

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धर्मेंद्र कंवारी – बंडवारा

हरियाणवी  लघुकथा पहला – मैं तो यो घर लेऊंगा, मैं छोटा सूं दूसरा – मैं तो इसमैं घणेए साल तै रहूं सूं, तूं प्लाट ले ले तीसरा – रै मन्नै भी किम्मे देवोगे, मेरे हाड टूट लिए कमा-कमा कै, सबतै बड्ड़ा सूं। पहला – भाई मैं यो घर ताम्मैं ले ल्यो, मां-बाप भी ताहरै गेलै रवैंगे दूसरा-तीसरा – रै भाई

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धर्मेंद्र कंवारी – बिजली

हरियाणवी लघुकथा एक – भाई इस सरकार नै तो आग्गै लोग एक बी बोट ना दें। दूसरा – कत्ती नाश होर्या सै भाई, इन ससुरा नै न्यूं भी कोनी बेरा अक किस तरियां सरकार चलाणी सै। टाबर – बाबू बिजळी आग्गी? बाबू – रै तोल्ला सा छात्त पै जाकै तार गेर ले, सानी तो काट लेवां या सरकार तो सुसरी

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धर्मेंद्र कंवारी – बाबाजी

हरियाणवी लघुकथा होटल बरगै कमरे म्ह एक बड्डे से सोफे पै बाबाजी बैठे थे। एसी फुल स्पीड म्हं हवा देण लागर्या था, मौसम कती चिल्ड। एक-एक करके लोग आवैं अर बाबा जी सबकी कड़पै हाथ धरदे। घंटी बजते ही बाबा जी ने एप्पल का फोन जेब तै काड्या अर बोल्लै बाबा – हैलो भक्त – जय हो बाबा जी, थोड़ी

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धर्मेंद्र कंवारी – सरकार

हरियाणवी लघुकथा हुक्के की गुड़गुड़ाहट गेल बात होरी थी। एक बुड्ढ़ा – रै कत्ती नाश हो लिया, आड़ै सरकार नाम की तो चीज ए कोनी दिखदी। दूसरा – कै होया रामफळ, क्यूं गुस्सा होरा? पहला – रै बोहड़िया का ट्रासंफर नहीं हौके देण लागरैया, तीन बर एमएलए धौरे जा बी आए? दूसरा – कोए बात नै हो जागा भाई, थोड़ी

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कौआ और चिड़िया

लोक कथा                 एक चिड़िया थी अर एक था कौआ। वै दोनों प्यार प्रेम तै रह्या करै थे। एक दिन कौआ चिड़िया तै कहण लाग्या अक् चिड़िया हम दोनों दाणे-दाणे खात्तर जंगलां म्हं फिरैं, जै हम दोनों सीर मैं खेती कर ल्यां तो आच्छा रैगा। चिड़िया भी इस बात पै राजी होग्यी। आगले दिन चिड़िया कौआ तै कहण लाग्यी अक्

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गादड़ का चौंतरा – लोक कथा

हरियाणवी लोक कथा एक गादड़ था, वो अपणा चौंतरा बणा कै, लीप-पोत कै, साफ-सुथरा राख्या करता। वो अपणा रोब भोत राख्या करता। वो न्यू जाणता के सारा जंगल तेरा कह्या मानै। एक दिन वो खूब सज-धज कै अपणे  चौंतरे पै जा बैठा। जो कोये आवे उसे त बूझे मैं किसा लागू सूं? सब न सराह दिया। बस फेर के था

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लोक कथा – बाम्हण अर बाणिया

लोक कथा बाम्हण अर बाणिया एक बणिया घणा ऐ मूंजी था वा रोज गुवांडा मैं जाकै रोटी खाये करै था अर उसकै घरां किसी बात की कमी नी थी। सारे गुवांड उसतै कतराण लाग्ये। एक दिन उसतै किस्सै नै भी रोटी ना दी। वा भूखा मरदा घरां कान्हीं चाल पड्या। रास्ते मैं उसने एक पीपल का पेड़ देख्या जिसपै बरबन्टे

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