Category Archives: हरियाणवी भाषा-बोली

डा. नवमीत नव – आबादी को उसकी भाषा से वंचित कर देना तो जुल्म है

मेरे कुछ साथी डॉक्टर रहे हैं जो रूस से पढ़कर आये हैं। वे बताते हैं कि वहां मेडिकल की पढ़ाई रूसी भाषा में होती है। और बहुत अच्छी होती है। या फिर चीन में, फ्रांस में या जर्मनी में। सब अच्छे से होता है। सिर्फ हमारे यहां ही एलियन भाषा को थोपा जाता है। हमें डॉक्टर बनाने हैं, अंग्रेजी के

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1857, किस्सा सदरूद्दीन मेवाती का

सहीराम  नौटंकी पात्र : नट तथा नटी। दो देहाती (बार-बार उन्हीं को दोहराया जा सकता है),एक ढिढ़ोरची (दो देहातियों में एक हो सकता है या नट भी हो सकता है) और गानेवाले स्त्री-पुरूष। (सभी संवाद तुकबंदी में हैं। उनकी अदायगी में काव्यात्मकता,लयात्मकता और नाटकीयता रहे तो ज्यादा बेहतर। गाने,दोहे, चौबोले, बहरेतवील आदि काव्यरूपों के गायन में स्त्री-पुरूष दोनों आवाजें रहें

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डा. हरविन्द्र सिंह – हरियाणा में पंजाबी भाषा

भाषा विमर्श ‘पंजाबी’ शब्द से तात्पर्य पंजाब का निवासी होने से भी है और यह पंजाब-वासियों की भाषा भी है। पंजाब की यह उत्तम भाषा ‘गुरमुखी’ लिपि में लिखी जाती है।1 पंजाबी भाषा की वर्णमाला जो शारदा और टांकरी से निकली है इसमें गुरुओं के मुख-वाक्य गुरमुखों ने लिखे, जिस कारण नाम ‘गुरमुखी’ प्रसिद्ध हुआ। पंजाब प्रदेश की शुद्ध भाषा

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मेवाती लोक जीवन की मिठास – डा. माजिद

मेवाती लोक जीवन की मिठास इत दिल्ली उत आगरा मथुरा सू बैराठ।    काला पहाड़ की शाळ में बसै मेरी मेवात।।                 इस मेवाती दोहे में मेवात का भौगोलिक फैलाव दिल्ली से लेकर फतेहपुर सीकरी के बीच बताया गया है, जिसमें गुड़गांव, फरीदाबाद, भरतपुर, दौसा, अलवर, मथुरा, आगरा, रेवाड़ी जिलों के बीच का भाग शामिल है। इस पूरे क्षेत्र को

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हरियाणा में पंजाबी भाषा व साहित्य की वस्तुस्थिति

                अक्सर हरियाणा में पंजाबी संस्था या विभाग को छोड़ कर और जितनी भी सरकारी या गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा जितनी भी भाषण व लेखन प्रतियोगिताएं होती हैं, उसमें अभिव्यक्ति का माध्यम सिर्फ हिन्दी या अंग्रेजी भाषा ही होता है, परन्तु पंजाबी भाषा के प्रति यह रवैया नकारात्मक होता है। जिसके कारण पंजाबी भाषी विद्यार्थी इस तरह की प्रतियोगिताओं में भाग लेने से वंचित रह जाते हैं।

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हरियाणा में भाषायी विविधता

समय के साथ-साथ परिस्थितियां बदली और ‘बांगरू’ भाषा के लोक नाटक (सांग), रागनी, कथाएं, गाथाएं, किस्से, कहानियां, लोक गीत, फिल्में, हास्य-व्यंग्य इतने प्रचारित-प्रसारित हुए कि एक सीमित क्षेत्र की भाषा ही हरियाणवी मानी जाने लगी। हरियाणा के प्रतिष्ठित भाषाविद् डा. बलदेव सिंह का मत है कि ‘‘यहां जिस हरियाणी की बात की जा रही है, वह सारे हरियाणा की बोली नहीं है, अपितु रोहतक और सोनीपत की बांगरू है। इसके अतिरिक्त हरियाणा के में ब्रज, मेवाती, अहीरवाटी, बागड़ी, कुरुक्षेत्र-करनाल की कौरवी आदि कई बोलियां हैं।’’

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