Category Archives: हरियाणवी कविता

दीया

संगीता बैनीवाल सारे दीखैं तोळा-मासा मैं तो बस रत्ती भर सूं माटी म्ह मिल ज्यां इक दिन माटी तैं फेर बण ज्यां सूं जितना नेह-तेल भरोगे उतनी राह रोशन कर ज्यां सूं धरो बाती जिब मेरे हिया पै हंसते-हंसते जळ ज्यां सूं फर्क जगहां का देखे बिन मैं मरघट म्हं बी जळ ज्यां सूंमैं बांट रोशनी औरां नै खुद आप

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कदे सोच्या के ?

विक्रम राही वाटस एप पै पोस्ट फारवर्ड एडवांस हो चाहे हो बैकवर्ड कदे सोच्या के ? फेसबुक पै रहै रोज हाजरी पड़ोस मैं चाहे आग लागरी कदे सोच्या के ? बेटी बचाण की क्यूँ आई नौबत माणस सां माणस की सोहबत कदे सोच्या के? रोज खुदकशी किसान करे जां मेहनत करैं आर दण्ड भरे जां कदे सोच्या के ? फुटपाथ

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विपिन चौधरी – ओबरा

हरियाणवी कविता जद ताती-ताती लू चालैं नासां तैं चाली नकसीर ओबरे म्हं जा शरण लेंदे सिरहानै धरा कोरा घड़ा ल्हासी-राबड़ी पी कीं काळजे म्हं पड़दी ठंड एक कानीं बुखारी म्हं बाळू रेत मिले चणे अर दूसरे कानीं, गुड़ भरी ताकी गुड़ नैं जी ललचाया करदा अर दादी धोरै रहा करदी ताकी की चाबी सारी दुपहरी ओबरे म्हं काट्या करदे स्कूल

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विपिन चौधरी – डाब के खेत

हरियाणवी कविता डाब कै म्हारे खेतां म्हं मूंग, मोठ लहरावे सै काचर, सिरटे और मतीरे धापली कै मन भावै सै रै देखो टिब्बे तळै क्यूकर झूमी बाजरी रै। बरसे सामण अर भादों मुल्की बालू रेत रै, बणठण चाली तीज मनावण टिब्बे भाजी लाल तीज रैे रै देखो पींग चढ़ावै बिंदणी रै। होळी आई धूम मचान्दी गूंजें फाग धमाल रैे, भे-भे

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विपिन चौधरी – मेरा सादा गाम

 हरियाणवी कविता म्हारी बुग्गी गाड्डी के पहिये लोहे के सैं जमां चपटे बिना हवा के जूए कै सेतीं जुड़ रहे सैं मण हामी इसे म्हं बैठ उरै ताईं पहोंच लिए रेज्जै का पहरा करे सै म्हारै कुरता अर बां उपराण सांम्हीं राख्या करां, थोड़ी-थोड़ी हांण म्हं समाहीं जाया करां इस झोटा बुग्गी तैं रेत भोत उड़े सै अर फेर ये

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रोशन लाल श्योराण – यादें

कविता वो बचपन के दिन कड़ै गए, वो छूटे साथी कड़ै गए, मैं ढूंढू उनको गळी-गळी वो यारे प्यारे कड़ै गए। वो खुडिया-डंडा, वो लुका छिपी वो तीज और गुग्गा कडै़ गए वो दीवाळी दशहरे कड़ै गए वो मशाल फुलझड़ी कड़ै गए मैं ढूंढू उनको गळी-गळी वो खील-खिलौणे कड़ै गए। वो खेल खिलाड़ी कड़ै गए, वो कुश्ती दंगल कड़ै गए,

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सरपंची – जसबीर लाठरों

हरियाणवी कविता गाम मां सरपंची के लेक्शन का, घणा इ रोळा ओर्या था, जोणसा बी लेक्शन मां खड्या था, ओइयो बोळा ओर्या था, भरतु शराबी देसी दारू कैढ का, लोगां ना रोज़ो पलाया करदा, बिना पीण आळे ना बी, धक्के ते पलाया करदा, खागड़ रूळदा अपणे आप ना, रान्डयां की फौज का कमांडर लाया करदा, बोट्टां खातर रान्डयां ते ओ,

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विपिन चौधरी – टूम ठेकरी

हरियाणवी कविता जी करै सै आज दादी की तिजोरी मैं तै काढ़ ल्याऊं सिर की सार,धूमर अर डांडे नाक की नाथ, पोलरा कान की बुजली, कोकरू अर डांडीये गळे की-नौलड़ी,गळसरी, गंठी, जोई, झालरा, हंसली, तबीज अर पतरी, हाथ के कडूले,छन पछेली, टड्डे अर हथफूल कमर का नाड़ा अर तागड़ी, पैरां की झांझण, कड़ी, छळकड़े, गीटीयां आले,पाती, नेवरी अर रमझोल अर

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सहीराम – संघर्ष कथा

आंखिन देखी मैं कहता हूं, सुनी सुनायी झूठ कहाय। गाम राम की कथा सुनाऊं, पंचों सुनियो ध्यान लगाय। हल और बल कुदाली कस्सी, धान बाजरा फसल गिनाय। भैंस डोलती पूंछ मारती, गैया खड़ी-खड़ी रम्भाय। सुबह सवेरे हाली निकलै, गर्मी सर्दी को बिसराय। सारा दिन वो खटै खेत में, मिट्टी संग मिट्टी होइ जाय। चाहे धूप जेठ के चिलके, चाहे कोहरा

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राजकुमार जांगड़ा ‘राज’ – अन्नदाता

क्यूं काम करणियाँ भूखे सोवे,हामने या बता दो रै । क्यूं ठाडे के दो बॉन्डे हो से ,कोई तो समझा दो रै । कमा कमा के झोड़ा होग्या, गिनती नहीं खून पसीने की । हामने कद न्या भा मिलेगा,किम्मे ठोड़ ठिकाणे ला दयौ रै । रोटी माँगा आँख दिखावे ,काम मांग ल्यां घणे गुर्रावें । झूठ बोल सबने बहकावें ,कोए

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