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चरण आपके पुष्प – स्वामी रामदास

Post Views: 223 स्वामी रामदास (1884-1963) अनुवाद दिनेश दधिची मधुमक्षिका पुष्प पर जैसे मँडराती है उसी प्रकार हृदय मेरा, हे प्रभो! आपके चरणों पर मँडराता है। वह करती है मधु-पान…

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खुल्ला बारणा – साकी / एच. एच. मनरो अनु – राजेन्द्र सिंह

साकी’ प्रसिद्ध अंग्रेज लेखक एच. एच. मनरो का उपनाम है जिनका जन्म 1870 में ब्रिटिश बर्मा में हुआ।  13 नवम्बर 1916 को फ़्रांसिसी जमीन पर जर्मन सेना से लड़ते हुये युद्ध के मैदान में इनका देहान्त हुआ। कहानी के क्षेत्र में इनको वैश्विक स्तर पर उस्ताद का दर्जा हासिल है। द इंटरलोपर, द ओपन विण्डो, द टॉयज़ ऑफ़ पीस, द बुल, द ईस्ट विंग आदि इनकी अनेक कालजयी कहानियां हैं।  इस अंक में प्रस्तुत है साकी उर्फ़ एच. एच. मनरो की विश्व प्रसिद्ध कहानी  ‘The Open Window’  का  हरियाणवी अनुवाद। अनुवाद किया है राजेंद्र सिंह ने, जो राजकीय महाविद्यालय, गुड़गांव में अंग्रेजी के सहायक प्रोफेसर हैं।

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साथ तैरने वालों को मशविरा – कमला दास

Post Views: 664 कमला दास (1934-2009) अनुवाद दिनेश दधिची  साथ तैरने वालों को मशविरा तैरना सीखोगे जब तुम उस नदी में मत उतरना जो न बहती हो समंदर की तरफ़…

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एक सरकार को श्रद्धांजलि – फ़िलिप लार्किन

Post Views: 159 फ़िलिप लार्किन (1922-1985) अनुवाद डा. दिनेश दधिची एक सरकार को श्रद्धांजलि अगले बरस सैनिकों को घर ले आएँगे। पैसे की तंगी है और यह ठीक भी है….

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भारत  विभाजन  के उत्तरदायी – असगर अली इंजीनियर, अनु. डा. सुभाष चंद्र

Post Views: 316 साम्प्रदायिक सवाल मुख्यत: सत्ता में हिस्सेदारी से जुड़ा था, चूंकि सत्ता में हिस्सेदारी के सवाल का आखिर तक कोई संतोषजनक हल नहीं निकला और अंतत: देश का…

अंततः – वेंडी बार्कर

Post Views: 94 वेंडी बार्कर  अनुवाद दिनेश दधिची एक-दूजे के जलाशय में रहे हम तैरते रात-भर धुलती रही घुलती रही चट्टान तट पर धार से . जल-धार से . खुरदरे…

चार कविताएं – वेंडी बार्कर

Post Views: 220 वेंडी बार्कर (जन्म 1942 ) अनुवाद  दिनेश दधीचि (1) याद है हव्वा को मैंने तो बस उसका झुकना भर देखा पथ पर देखा—वह कुछ सोच-समझ कर झुका…

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मेरी ओर हुए आकर्षित, ऐसे नए व्यक्ति हो तुम?

Post Views: 163 वाल्ट व्हिट्मन (1819-1892) मेरी ओर हुए आकर्षित, ऐसे नए व्यक्ति हो तुम?   मेरी ओर हुए आकर्षित, ऐसे नए व्यक्ति हो तुम? चेता दूँ शुरुआत में तुम्हें,…

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घायल हिरण

Post Views: 283 विलियम काउपर (1731-1800)  अनुवाद दिनेश दधीचि चोट खाया हिरण था मैं, अरसा पहले झुण्ड पुराना छूट गया था, साँस जिधर से लेता हूँ मैं, उधर बहुत-से तीर गड़े थे…