Category Archives: अनुवाद

अदालत जारी है …

कर्मजीत कौर किशांवल  पंजाबी से अनुवाद परमानंद शास्त्री                                       (कर्मजीत कौर किंशावल पंजाबी की कवयित्री हैं, गगन दमामे दी ताल कविता संग्रह प्रकाशित हुआ है। इनकी कविताएं दलित जीवन के यथार्थपरक चित्र उकेरती हुई सामाजिक न्याय के संघर्ष का पक्ष निर्माण कर रही हैं। पंजाबी से अनुवाद किया है परमानंद शास्त्री जी ने। उन्होंने पंजाबी से हिंदी में गुरदियाल सिंह

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आज का कन्हैया

कर्मजीत कौर किशांवल  पंजाबी से अनुवाद परमानंद शास्त्री                                       (कर्मजीत कौर किंशावल पंजाबी की कवयित्री हैं, गगन दमामे दी ताल कविता संग्रह प्रकाशित हुआ है। इनकी कविताएं दलित जीवन के यथार्थपरक चित्र उकेरती हुई सामाजिक न्याय के संघर्ष का पक्ष निर्माण कर रही हैं। पंजाबी से अनुवाद किया है परमानंद शास्त्री जी ने। उन्होंने पंजाबी से हिंदी में गुरदियाल सिंह

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धर्म का राज

कर्मजीत कौर किशांवल की कविताएं  पंजाबी से अनुवाद परमानंद शास्त्री                                       (कर्मजीत कौर किंशावल पंजाबी की कवयित्री हैं, गगन दमामे दी ताल कविता संग्रह प्रकाशित हुआ है। इनकी कविताएं दलित जीवन के यथार्थपरक चित्र उकेरती हुई सामाजिक न्याय के संघर्ष का पक्ष निर्माण कर रही हैं। पंजाबी से अनुवाद किया है परमानंद शास्त्री जी ने। उन्होंने पंजाबी से हिंदी में

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नदियों के बारे में नीग्रो का कहना है

 लैंग्स्टन ह्यूज़ (1902-1967) अनुवाद – दिनेश दधीचि नदियों को जाना है मैंने नदियाँ जो प्राचीन बहुत हैं; उतनी जितनी अपनी दुनिया. मानव की नस-नस में बहता रक्त नहीं था, तब भी वे थीं— जाना है मैंने नदियों को. तभी आज अन्तस् में मेरे गहराई है नदियों जैसी. मैंने यूफ़्रेतिस के जल में स्नान किया था, जब सुबहें थीं नयी-नवेली. कांगो

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आज़ादी

सफ़दर हाशमी (1954-1989) अनुवाद – दिनेश दधिची आज़ादी आज़ादी किसको कहते हैं? यह भी एक सवाल है. क्या मतलब है इसका, सोचो, बोलो तो क्या ख्याल है? क्या इसका मतलब है जो चाहो सो कर लो? करो शिकार पक्षियों का या मछली पकड़ो? तोड़-फोड़ या आग लगाना? मार-पीट या झगड़ा करना? कहते नहीं इसे आज़ादी. इस से तो होगी बर्बादी.

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चरण आपके पुष्प

स्वामी रामदास (1884-1963) अनुवाद दिनेश दधिची मधुमक्षिका पुष्प पर जैसे मँडराती है उसी प्रकार हृदय मेरा, हे प्रभो! आपके चरणों पर मँडराता है। वह करती है मधु-पान और यह अमृत-रस पीता रहता है। वह पल दो पल क्रीड़ा करती, पर मैं तो सदा विचरता हूँ। वह छोड़ पुष्प को जाती है, मैं सदा-सर्वदा चरणों में ही रहता हूँ। मेरा जीवन

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खुल्ला बारणा

साकी / एच. एच. मनरो, अनु – राजेन्द्र सिंह ‘साकी‘ प्रसिद्ध अंग्रेज लेखक एच. एच. मनरो का उपनाम है जिनका जन्म 1870 में ब्रिटिश बर्मा में हुआ।  उन दिनों बर्मा भारत की ही एक राजनैतिक इकाई था। जब 1914 में प्रथम विश्व युद्ध शुरू हुआ तो इनकी की आयु 40 से ऊपर थी, लेकिन कोई बाध्यता न होने के बावजूद

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साथ तैरने वालों को मशविरा

कमला दास (1934-2009) अनुवाद दिनेश दधिची  साथ तैरने वालों को मशविरा तैरना सीखोगे जब तुम उस नदी में मत उतरना जो न बहती हो समंदर की तरफ़ अनजान रहती हो जो अपनी मंज़िलों से यह समझती हो कि बहना ही महज़ फ़ितरत है उसकी ठीक वैसे ही कि जैसे ख़ून का दरिया थका-माँदा बहा करता है ले कर साथ यादों

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एक सरकार को श्रद्धांजलि

  फ़िलिप लार्किन (1922-1985) अनुवाद डा. दिनेश दधिची एक सरकार को श्रद्धांजलि अगले बरस सैनिकों को घर ले आएँगे। पैसे की तंगी है और यह ठीक भी है. वे जिन स्थानों पर पहरा देते थे अब तक या जिन्हें व्यवस्थित रखने का ज़िम्मा लेते थे आइन्दा वे लोग स्वयं पहरा दें औ’ दायित्व संभालें. पैसे की दरकार हमें अपने घर

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भारत  विभाजन  के उत्तरदायी

असगर अली इंजीनियर, अनु. डा. सुभाष चंद्र साम्प्रदायिक सवाल मुख्यत: सत्ता में हिस्सेदारी से जुड़ा था, चूंकि सत्ता में हिस्सेदारी के सवाल का आखिर तक कोई संतोषजनक हल नहीं निकला और अंतत: देश का विभाजन हो गया। यहां तक कि जिन्ना के चौदह सूत्री मांग पत्र, जो उन्होंने 1929 के प्रारंभ में ही (नेहरू रिपोर्ट विवाद के बाद) तैयार कर

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