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ऐसे में बालमुकुंद गुप्त को याद करना अच्छा लगता है – सुभाष चंद्र

Post Views: 100 टोरी जावें लिबरल आवें।  भारतवासी खैर मनावें नहिं कोई लिबरल नहिं कोई टोरी।  जो परनाला सो ही मोरी। ये शब्द हैं  – पत्रकार, संपादक, कवि, बाल-साहित्यकार, भाषाविद्,…

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हिंदी-साहित्य के इतिहास पर पुनर्विचार – नामवर सिंह

इतिहास लिखने की ओर कोई जाति तभी प्रवृत्त होती है जब उसका ध्‍यान अपने इतिहास के निर्माण की ओर जाता है। यह बात साहित्‍य के बारे में उतनी ही सच है जितनी जीवन के।

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लूकाच का वास्तविकतावाद – डा. ओमप्रकाश ग्रेवाल

Post Views: 69 मार्क्सवाद के बारे में बहुत से पर्वाग्रह लोगों के मन में घर कर गये हैं। उनमें से एक मुख्य धारणाा यह है कि इस दृष्टिकोण से प्रतिबद्धता…

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उर्दू शायरी की विधाएं – शशिकांत श्रीवास्तव

Post Views: 65 ( अंग्रेजी के विद्वान शशिकांत श्रीवास्तव साहित्य के गंभीर अध्येता हैं। कई दशकों तक कालेज में अध्यापन किया और हरियाणा के  सरकारी कालेजों में प्रिंसीपल रहे। हिंदुस्तानी…

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इसी जन्म में हर तरह का अनुभव हासिल करना चाहती थी – कमला दास

Post Views: 11 एक स्त्री को कुछ भी बनने से पहले एक अच्छी पत्नी, एक अच्छी मां के रूप में खुद को साबित करना पड़ता है। और इसका मतलब है…

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कविता हमारे भीतर की देवतुल्य मौजूदगी के प्रति एक संकेत है – बेन ओकरी

कविता हमारे भीतर की देवतुल्य मौजूदगी के प्रति एक संकेत है और हमें अस्तित्व के उच्चतम स्थानों तक ले जा एक गूंज में बदल जाने का कारण बनती है। कवि आपसे कुछ नहीं चाहते, सिवाय इसके कि आप अपने आत्म की गहनतम ध्वनि को सुनें।

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जॉर्ज लूकाच – डा. ओमप्रकाश ग्रेवाल

Post Views: 20 साहित्यिक मसलों की मार्क्सवादी दृष्किोण से व्याख्या करने वाले समर्थ आलोचकों में लूकाच का नाम आता है। किन्तु उनकी कुछ मुख्य स्थापनाओं के बारे में मार्क्सवादी चिन्तकों…

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कविता की भाषा और जनभाषा – डा. ओमप्रकाश ग्रेवाल

Post Views: 353 आलेख कविता की भाषा का जन-भाषा से किस प्रकार का सम्बन्ध हो इस प्रश्न पर हम यहां केवल जनवादी कविता के संदर्भ में ही विचार करेंगे। कविता…

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‘हम नहीं रोनी सूरत वाले’ : सावित्रीबाई फुले की कविताई – बजरंग बिहारी तिवारी

Post Views: 242 जीवन की गहरी समझ के साथ काव्य-रचना में प्रवृत्त होने वाली सावित्रीबाई फुले (1831-1897) अपने दो काव्य-संग्रहों के बल पर सृजन के इतिहास में अमर हैं. उनका…

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राष्ट्रीय एकता और भाषा की समस्या – भीष्म साहनी

Post Views: 88 मैं भाषा वैज्ञानिक नहीं हूं, भाषाएं कैसे बनती और विकास पाती हैं, कैसे बदलती हैं, इस बारे में बहुत कम जानता हूं, इसलिए किसी अधिकार के साथ…