Category Archives: साहित्य विमर्श

अंतहीन संकट

डा. महावीर शर्मा 1929-30 में अमरीका में महामंदी का संकट आया, जिसमें बड़े-बड़े बैंक व अन्य वित्तीय संस्थान दिवालिया हो गए। दुनिया के शेयर बाजारों में अफरा-तफरी फैल गई। इसका व्यापक असर यूरोप व अन्य देशों पर भी पड़ा। यह महामंदी द्वितीय विश्व युद्ध तक जारी रही। अमरीकन सरकार की ‘न्यू डील’ भी इसका असर दूर करने में असफल रही।

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वर्तमान समय की दुरभिसंधि की करुण कथा – जाट कहवै , सुण जाटनी

राजेन्द्र गौतम ‘जाट कहवै सुण जाटणी’ हरियाणवी उपन्यासों की परम्परा को नया मोड़ देता है। कहने की अपेक्षा मुझे यह कहना ज्यादा सार्थक लगता है कि यह उपन्यास हरियाणवी उपन्यास-साहित्य में एक धमाका करता है। ‘मोड़ देना’ इसलिए सार्थक नहीं है क्योंकि हरियाणवी उपन्यासों की कोई बहुत लम्बी परम्परा है ही नहीं। राजाराम शास्त्री से लेकर सन् 2017 तक के

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फुहशनिगार नहीं, हकीकतनिगार- इस्मत चुगताई

गुरबख्श सिंह मोंगा समूचे भारतीय उपमहाद्वीप में इस्मत चुगताई का नाम किसी तआरूफ  का मोहताज नहीं। अपने ही घर में मजहब, मर्यादा, झूठी इज्जत के नाम पर गुलाम बना ली गई, औरत की आजादी पर उन्होंने सख्ती से कलम चलाई और उसके हकीकी हकूक के हक और उसकी हिफाजत में अपनी आवाज बुलंद की। वे सचमुच में एक स्त्रीवादी लेखिका

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दुख कोई चिड़िया तो नहीं

डॉ. विजय विद्यार्थी जब भी कोई दुख पहुँचता है अमित मनोज यह गीत गाता है ‘दुख कोई चिड़िया तो नहीं’ यह अभिव्यक्ति न सिर्फ कवि के दुखी या उदास मन की पराकाष्ठा है अपितु समाज के जख्मों पर मरहम लगाने और घावों को भरने की पुरजोर चेष्टा है। यह कवि के हृदय से निकली एक अन्तर्ध्वनि है जो समाज से

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बस दो-चार बातें : एक मन्टो यह भी

 मोहनरमणीक (रमणीक मोहन जाट कालेज, रोहतक से अंग्रेजी साहित्य के एसोसिएट प्रोफेसर पद से सेवानिवृत हुए। साहित्यिक-सांस्कृतिक-शैक्षिक गतिविधियों से जुड़े  हैं। सांझी संस्कृति, भाईचारा व अमन के लिए विभिन्न उपक्रमों के माध्यम से निरंतर सक्रिय हैं। हरकारा पत्रिका का वर्षों तक संपादन किया। ‘सप्तरंग’ नामक संस्था के माध्यम से प्रगतिशील मूल्यों को समाज में स्थापित करने के लिए संघर्षरत हैं

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सरबजीत, तारा पांचाल और पिलखन का पेड़

ओमसिंह अशफाक सरबजीत (30-12-1961—13-12-1998) दोस्तों का बिछडऩा बड़ा कष्टदायक होता है। ज्यों-ज्यों हमारी उम्र बढ़ती जाती है पीड़ा सहने की शक्ति भी क्षीण होती रहती है। जवानी का जोश तो बड़े-बड़े सदमें झेल जाता है, परन्तु उम्र के साथ ज्यों-ज्यों शारीरिक क्षमता घटती है, त्यों-त्यों मनोबल पर भी नकारात्मक प्रभाव बढ़ता जाता है और दुख हमें तोडऩे लगता है। कुछ

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भूल गई रंग चाव, ए भूल गई जकड़ी

राजेन्द्र सिंह आज के इस युग में जब स्वयं हाशिए पर चले गए हिन्दी साहित्य में भी प्रकाशन का अर्थ सिर्फ  कहानियों, कविताओं या कुछ हद तक उपन्यास के प्रकाशन तक सिमट कर रहा गया है, तथा शोध के नाम पर ठेके पर तैयार करवाए गए ऐसे शोध प्रबन्धों के जुगाडी प्रकाशनों की भरमार है जिसको शायद शोधकर्ता ने स्वयं

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दलित स्त्री के जीवन की महागाथा – ‘दाई’

अनिता भारती भारत की सत्तर प्रतिशत आबादी गांव में निवास करती है। इस आबादी के पास शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं का नितांत अभाव है।  अशिक्षा, गरीबी और अज्ञानता के साथ-साथ मौलिक सुविधाओं के अभाव में ग्रामीण समाज ने जीने खाने और रहने के अपने तौर तरीकों का विकास अपने तरीकों से कर लिया है। ऐसे ही तौर

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दास्तान एक शहर की

ओमसिंह अशफाक  दास्तान- ए -शहर कैसे बयां करूं जीऊँ तो कैसे जीऊँ, मरूँ तो कैसे मरूँ मैं सन् 1984 में इस शहर में आया तो इसे आदतन शहर कहकर अपने कहे पर पुनर्विचार करना पड़ता था। बेशक जिला मुख्यालय तो यह 1973 में ही बन गया था, पर किसी भी कोण से शहर की शक्ल तब तक नहीं बन सकी

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