Category Archives: साहित्य

छाती, तू और मैं – निकिता आजाद

निकिता आजाद (युनिवर्सिटी ऑफ आक्सफोर्ड) में पढ़ी हैं। उन्होंने  ‘हैपी टु ब्लीड’ लिखे सैनिटरी नैपकिन के साथ अपनी तसवीर पोस्ट करते हुए लोगों को पितृसत्तात्मक रवैए के खिलाफ खड़े होने की अपील की थी और सोशल मीडिया पर #happytobleed मुहिम चलाई थी। contact – nikarora0309@gmail.com तू हमेशा कहता रहा ये बहुत छोटी हैं बहुत ढीली हैं बहुत चपटी हैं और

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सोनकेसी – पहाड़ी लोक-कथा

एक बार एक साहुकार था। उसके चार पुत्र थे ।चार में से बड़े तीन पुश्तैनी धन्धे के साथ अपना-अपना काम धन्धा  भी करते थे पर सबसे छोटा बेटा कोई काम-धाम नहीं करता था । उसकी इस आदत की वजह से साहुकार उससे नाराज रहने लगा । बोल-चाल भी बंद हो गई । बाकी के भाई भी उससे खिंचे-खिंचे से रहने

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” झुकना मत “

” झुकना मत “ जैसे ही डाक्टर ने कहा झुकना मत। अब और झुकने की गुंजाइश नही… सुनते ही उसे.. हँसी और रोना , एक साथ आ गया। ज़िंदगी में पहली बार वह किसी के मुँह से सुन रही थी ये शब्द …..।। बचपन से ही वह घर के बड़े, बूढ़ों माता-पिता, चाची, ताई, फूफी,मौसी.. अड़ोस पड़ोस, अलाने-फलाने, और समाज

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साहित्य का अध्ययन-अध्यापन

  prof. Krishan Kumar, Ex-Director NCERT delivered a lecture on teaching and study of literature on sept. 13 at shahid Udham Singh Govt. College, Indri (Karnal). प्रो. कृष्ण कुमार की भाषण. साहित्य का अध्ययन-अध्यापन. शहीद उधमसिंह राजकीय महाविद्यालय, इंद्री (करनाल) में १३ सितबर २०१८। साहित्य के छात्रों और अध्यापकों के लिए शानदार संवाद। शिक्षा साहित्य भाषा के सवालों को छूता

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प्रदीप कासनी – सरबजीत : एक दोस्त एक अदीब

आखिर दिसम्बर ‘98 का यह दिन आना ही था। दक दुर्निवार खिंच से आबद्ध कवि सधे कदमों से उस पाले को लांघ गया, जहां हम सब स्तब्ध और लाचार खड़े थे। पिछले साल के आखिरी माह की तेरह तारीख को सरबजीत नहीं रहा। अपनी मृत्यु से कुछ माह पहले एक अच्छे-भले, चलते-फिरते, हंसते-बोलते, सोचते और महसूसते शख्स को एक दिन

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मैं क्यों लिखता हूँ

ओम सिंह अशफाक मैं क्यों लिखता हूँ?-इस सवाल का जवाब बहुत सरल भी हो सकता है और जटिल भी। सरल इस तरह कि जैसे हर इंसान भोजन करता है, सोता है, जागता है, चलता-फिरता है, उठता-बैठता है, नहाता-धोता है, सोचता-विचारता है, बातचीत करता है यानि दैनिक जीवन के सभी कार्य-कलाप करता है, वैसे ही लिखता भी है। अब आप कह

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हाशिये के लोगों की औपन्यासिकता का विमर्श

प्रोफेसर सुभाष चन्द्र  वीरेन्द्र यादव रचित  ‘उपन्यास और वर्चस्व की सत्ता’ पुस्तक हिन्दी आलोचना और विशेषकर उपन्यास आलोचना के लिए महत्त्वपूर्ण है। आधुनिक काल के अन्तर्द्वन्द्वों  को उपन्यास ने मुख्यत: व्यक्त किया है। अपने समय के विमर्शें को भी स्थान दिया है। यद्यपि आधुनिक काल में जन सामान्य के जीवन के विभिन्न पहलुओं को साहित्य में प्रमुखता से स्थान मिला

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