Category Archives: साहित्य

प्रदीप कासनी – सरबजीत : एक दोस्त एक अदीब

आखिर दिसम्बर ‘98 का यह दिन आना ही था। दक दुर्निवार खिंच से आबद्ध कवि सधे कदमों से उस पाले को लांघ गया, जहां हम सब स्तब्ध और लाचार खड़े थे। पिछले साल के आखिरी माह की तेरह तारीख को सरबजीत नहीं रहा। अपनी मृत्यु से कुछ माह पहले एक अच्छे-भले, चलते-फिरते, हंसते-बोलते, सोचते और महसूसते शख्स को एक दिन

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मैं क्यों लिखता हूँ

ओम सिंह अशफाक मैं क्यों लिखता हूँ?-इस सवाल का जवाब बहुत सरल भी हो सकता है और जटिल भी। सरल इस तरह कि जैसे हर इंसान भोजन करता है, सोता है, जागता है, चलता-फिरता है, उठता-बैठता है, नहाता-धोता है, सोचता-विचारता है, बातचीत करता है यानि दैनिक जीवन के सभी कार्य-कलाप करता है, वैसे ही लिखता भी है। अब आप कह

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हाशिये के लोगों की औपन्यासिकता का विमर्श

प्रोफेसर सुभाष चन्द्र  वीरेन्द्र यादव रचित  ‘उपन्यास और वर्चस्व की सत्ता’ पुस्तक हिन्दी आलोचना और विशेषकर उपन्यास आलोचना के लिए महत्त्वपूर्ण है। आधुनिक काल के अन्तर्द्वन्द्वों  को उपन्यास ने मुख्यत: व्यक्त किया है। अपने समय के विमर्शें को भी स्थान दिया है। यद्यपि आधुनिक काल में जन सामान्य के जीवन के विभिन्न पहलुओं को साहित्य में प्रमुखता से स्थान मिला

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हम तालिबान बनना चाहते हैं

सहीराम  खाप पंचायती वैसे तो तालिबान बन ही चुके थे, सब उन्हें मान भी चुके थे। लेकिन पक्के और पूरे तालिबान बनने की उनकी इच्छा ने इतना जोर मारा कि उन्होंने फौरन ही एक साझा पंचायत बुला ली और जल्द से जल्द पक्के और पूर्ण तालिबान बनने के उपाय तलाशने लगे। एक पंचायती का सुझाव था कि तालिबान बनने के

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हम ढूंढते फिरे जिन्हें खेतों और गलियों में

ओमसिंह अशफाक  शमशेर बहादुर सिंह  (13-1-1911—12-5-1993) आज से करीब 64 साल पहले मैं शमशेर के इलाके में ही पैदा हुआ था। उनके पैतृक गांव ऐलम (मुज्जफरनगर) से मेरा पैतृक गांव कुरड़ी (बागपत) सिर्फ 18 किलोमीटर की दूरी पर है और गांव में जाते वक्त मुझे अक्सर उनके गांव ऐलम के बीच से गुजरना पड़ता है। ऐतिहासिक शहर पानीपत से ऐलम

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रात भर लोग अंधेरे की बलि चढ़ते हैं

ओमसिंह अशफाक  आबिद आलमी (4-6-1933—9-2-1994) पिछले दिनों अम्बाला में तरक्की पसंद तहरीक में ‘फिकोएहसास के शायर’ जनाब आबिद आलमी हमसे हमेशा के लिए बिछड़ गए। उनका मूल नाम रामनाथ चसवाल था, परन्तु शायरी की दुनिया में वे ‘आबिद आलमी’ के नाम से मशहूर हुए। उनका जन्म 4 जून 1933 को जिला रावलपिंडी की गूजनखान तहसील के गांव ददवाल में हुआ

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पितृतुल्य प्रो. शिव कुमार मिश्र

ओमसिंह अशफाक  शिव कुमार मिश्र (2-2-1931—21-6-2013) जी का जाना हिन्दी जगत में सक्रिय विमर्श और रचनात्मक आलोचना के एक स्तम्भ का उखड़ जाना है। समकालीन परिदृश्य में इस वय में बहुत कम आलोचक होंगे, जो पूरे भारत का भ्रमण करते हुए साहित्यिक विमर्श में संलग्र होकर नई पीढ़ी और युवा रचनाकारों का मार्गदर्शन करते हुए उनके प्रेरणा स्त्रोत बन जाने की

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नव जागरण के अग्रदूत डॉ. ओ.पी. ग्रेवाल

ओमसिंह अशफाक  (हरियाणा की मिट्टी के सलौने-सपूत, नवजागरण के अग्रदूत डा. ओ.पी. ग्रेवाल का साढ़े 68 साल की नाकाफी उम्र में 24 जनवरी 2006 को ब्रेन-ट्यूमर के कारण निधन हो गया था। इस भावनात्मक आलेख में उनके योगदान, महत्व और व्यक्तित्व को स्मरण किया गया है—लेखक) नव जागरण के अग्रदूत -डॉ० ओ.पी. ग्रेवाल (6-6-1937—24-1-2006) पृष्ठभूमि और परिवार : डॉ. ओम

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माई दे मालोटा – कमलेश चौधरी

हरियाणवी कहानी हरियाणा के जिस स्थान पर मैं रहती हूं, वह कुछ सालों पहले तक ठेठ गांव  था। धीरे-धीरे वह विकसित होकर कस्बे का रूप धारण कर गया। अब वह कस्बाई सीमाओं मं कसमसाता हुआ शहर बन जाने को बैचेन हैं दो प्राइवेट बैंक एक राष्ट्रीय  बैंक, अनाज मंडी, सब्जी मंडी, सरकारी व प्राइवेट स्कूल, दो पेट्रोल पम्प आदि शहर

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किसानी जीवन का ऋण

अमृतलाल मदान अधखुली नींद में अधखुली खिड़की से दिखने लगा था धीरे धीरे सरकता पूरा खिला चांद लुक्का-छिप्पी खेलता छोटी-छोटी बदलियों के संग आधी रात के आकाश में। सोचा, उठकर कोई प्रेम कविता लिखूं यादों की बदलियों में भूले-बिसरे चांद की और स्वयं अपनी लेखनी पर आत्ममुग्ध हो चूमने लगूं  उसे। तभी मैंने देखा एक धब्बा चांद का कुछ ज्यादा

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