Category Archives: सामाजिक न्याय

थर्डजेंडर की स्थिति में बदलाव की जरुरत

सपना हमारे समाज में जहां एक ओर स्त्री और पुरुष के अस्तित्व को सहज रूप से स्वीकारा जाता है। वहीं दूसरी ओर ‘तीसरा-लिंग’ जो न तो स्त्री है और न ही पुरुष अर्थात् अलिंगी होते हैं, उन्हें लोगों द्वारा ऐसा देखा जाता है, जैसे वे दूसरी दुनिया से आए एलियन हो। उन्हें लोगों द्वारा हिजड़ा, किन्नर, खुसरा, छक्का आदि नामों

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सावित्रीबाई फुले : जीवन जिस पर अमल किया जाना चाहिए

7 जनवरी को दलित शोषण मुक्ति मंच (DSMM), दिल्ली ने भारत की पहली महिला शिक्षक सावित्रीबाई फुले की 187वें जन्मदिवस पर एक कार्यक्रम का आयोजन किया न्यूज़क्लिक प्रोडक्शन 09 Jan 2018 7 जनवरी को दलित शोषण मुक्ति मंच (DSMM), दिल्ली ने भारत की पहली महिला शिक्षक सावित्रीबाई फुले की 187वें जन्मदिवस पर एक कार्यक्रम का आयोजन किया I इस कार्यक्रम

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वैचारिक एवं वैज्ञानिक संघर्ष के पुरोधा क्रांति पुरुष महामना रामस्वरूप वर्मा

एडवोकेट रवीन्द्र कुमार कटियार निष्कलंक, निष्पक्ष, स्वयं चेता मानवतावादी! लोभ नहीं धन, पद का चिंतक, त्यागी, समतावादी! जिसके तर्क अकाट्य विरोधी भी सुनते हों आतुर! किया असंभव को भी संभव चाहे जितना भी हो दुष्कर!!      उत्तर भारत में सर्वाधिक बौद्धिक वैज्ञानिक एवं वैचारिक संघर्ष के पुरोधा, क्रांति सृष्टा महामना राम स्वरूप वर्मा का जन्म 22 अगस्त सन् 1923 ई0

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हरियाणा में अनुसूचित जाति आयोग

सुरेंद्र पाल सिंह  हरियाणा में जाति आधारित शोषण-उत्पीड़न अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय रहा। सामाजिक स्तर पर बहुत जघन्य कांड  हरियाणा के समाज ने देखे। शासकीय मशीनरी में भी भेदभाव के आरोप लगते रहे हैं। निदान के लिए मानवाधिकार आयोग और अनुसूचित जाति आयोग के गठन की जरूरत महसूस की गई और लोगों ने इस तरह की व्यवस्था बनाने

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मीडिया में हरियाणवी महिला की छवि

सहीराम  मीडिया में हरियाणवी महिला की छवि क्या है? जैसे हरियाणवी पुरुष जिसे आमतौर पर हाळी-पाळी कहा जाता है, की छवि खेतों में खटनेवाले एक मेहनतकश किसान की छवि है या फिर खड़ी और थोड़ी लठमार सी जुबान बोलनेवाले और एक हद तक मुंहफट तथा उज्जड, लेकिन साथ ही हाजिर जवाब और कुछ-कुछ मजाकिया-विटी-किसान की छवि है या फिर एक

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उनकी आत्मकथा पढ़ते हुए मैं बेहद पिघल गया था ओम प्रकाश वाल्मीकि

ओमसिंह अशफाक ओम प्रकाश वाल्मीकि (30-6-1950—18-11-2013) जी से मेरी मुलाकात सिर्फ तीन बार हुई, लेकिन फोन पर चार-पांच बार की बातचीत ने हमारे बीच काफी आत्मीयता पैदा कर दी थी, बल्कि उससे भी पहले ‘जूठन’ पढ़ते हुए ही इस आत्मीयता और घनिष्ठता की बुनियाद पड़ चुकी थी। कुछ यूं हुआ कि उनकी आत्मकथा पढ़ते हुए मैं बेहद पिंघल गया था-पढ़ता

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डा. ओमप्रकाश ग्रेवाल – मध्यवर्ग के आदर्शवादी तत्व और आरक्षण का सवाल

आलेख पिछले साल मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर सरकारी नौकरियों में से सत्ताईस प्रतिशत को सामाजिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षित करने के राष्ट्रीय मोर्चा सरकार के फैसले के विरुद्ध देश के कई हिस्सों में तीव्र प्रतिक्रिया हुई। उत्तर भारत के कई राज्यों में इस निर्णय के खिलाफ एक जबरदस्त आंदोलन खड़ा हो गया, जिसे शिक्षित

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डा. ओमप्रकाश ग्रेवाल – विकल्प की कोई एक अवधारणा नहीं

आलेख             विकल्प का सवाल आज पहले से भी जटिल हो गया है, लेकिन विकल्प की अनिवार्यता में कोई अन्तर नहीं आया है। आप ने इस परिचर्चा का विषय रखा है ‘विकल्प की अवधारणा’। लेकिन मेरे विचार से विकल्प की कोई एक अवधारणा नहीं है। मसलन, एक विकल्प यह हो सकता है कि वर्तमान समाज-व्यवस्था

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