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आओ नया समाज बनाएं – राजेंद्र चौधरी

बुनियादी एवं व्यापक बदलाव के लिए अंतत आम जन का, सत्ता से वंचित तबकों का संगठित होना ज़रूरी है. केवल एक पार्टी या नेता के पक्ष में वोट डालने के लिए नहीं अपितु बहुसंख्यक आबादी के हक़ में देश को चलाने के लिए. ज़रूरत इस बात कि है कि पूरा समय शासन व्यवस्था की नकेल प्रभावी रूप से जनता के हाथ में रहे. पॉँच साल में एक बार नहीं अपितु पूरे पॉँच साल लगातार शासन करने वालों में जनता के प्रति जवाबदेही का भाव रहे और जनता की सत्ता में बैठे लोगों पर कड़ी निगाह रहे.

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हाईड्रो प्रोजेक्ट्स नहीं रुके तो होगा आने वाले विधानसभा चुनावों का बहिष्कार – भगत सिंह किन्नर

Post Views: 22 शिमला के होटल पीटर हॉफ में मंगलवार को वर्ल्ड बैंक द्वारा हिमाचल प्रदेश सरकार को 200 मिलियन डॉलर का बड़ा कर्ज देने से पहले जन सुनवाई का…

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भू-स्खलनः एक डरावनी सच्चाई – गगनदीप सिंह

पिछले साल मानसून हिमाचल प्रदेश के लिए बहुत भयंकर किस्म की तबाही लेकर आया था। आपदा प्रबंधन-भू-राजस्व विभाग द्वारा जारी रिपोर्ट भू-स्खलन की एक डरावनी तस्वीर पेश करती है। यह सोचने पर मजबूर करती है कि हम विकास के नाम पर कहीं विनाश की कहानी तो नहीं लिख रहे।  क्या इस साल भी मानसून हिमाचल के लिए तबाही लेकर आयेगा।

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स्वामी अग्निवेश : आर्य समाज के आधुनिक व्याख्याता

समूचे विश्व में सत्ता और कॉरपोरेट की मिली भगत से प्राकृतिक संसाधनों की लूट हो रही है. जंगलों में रहने वाले आदिवासी समूहों को बेदखल किया जा रहा है. प्रकृति के अंधाधुंध दोहन से पर्यावरण को भारी नुकसान हो रहा है. इस समय विश्व पर्यावरण भारी संकट में है.  सदियों से प्रकृति के सहारे अपना जीवन यापन कर रहा आदिवासी समाज दर-दर की ठोकरें खा रहा है.

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शंकरगुहा नियोगी : नव उदारीकरण के पहले शहीद

आम सभा में भाषण देते हुए 25 अगस्त 1991 को शंकर गुहा नियोगी ने कहा था,“ मेरे दो बेटे हैं. मेरा एक बेटा कारखाने में काम करने जाता है तो वे उसके समस्त अधिकारों को छीनकर अमानवीय शोषण करते हैं. जब वह उस शोषक के खिलाफ सीना तानकर खड़ा होता है, यूनियन बनाकर इंकलाब का नारा लगाता है, अपने हक की माँग करता है, तब वे मेरे दूसरे बेरोजगार बेटे के हाथ में चाकू थमा देते हैं और कहते हैं, ‘ जा, अपने भाई पर चाकू चलाकर आ जा.‘ इस प्रकार इंसानियत के दुश्मन ये लालची उद्योगपति मेरे दोनो बेटों का शोषण करते हैं.

स्वतंत्रता आंदोलन और भारतीय साहित्य पर संगोष्ठी एवं प्रदर्शनी आयोजित

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग द्वारा आजादी के अमृत महोत्सव के तहत 1857 की क्रांति की वर्षगांठ के उपलक्ष्य में “भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन व हिन्दी साहित्य” विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं प्रदर्शनी का आयोजन किया गया।

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मौलाना अबुल कलाम आजाद : हिन्दूस्तानियत की मिशाल

मुस्लिम लीग के ‘टू नेशन थ्योरी’ का मौलाना आजाद द्वारा लगातार विरोध करने के बावजूद अंत में उनकी पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस भी विभाजन के लिए राजी हो गई। मौलाना इससे बहुत दुखी थे। 15 अप्रैल, 1946 को उन्होंने कहा कि मुस्लिम लीग की अलग पाकिस्तान की मांग के दुष्परिणाम न सिर्फ भारत बल्कि खुद मुसलमानों को भी झेलने पड़ेंगे क्योंकि वह उनके लिए ज्यादा परेशानियां पैदा करेगा।

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मेधा पाटकर : नर्मदा घाटी की अखण्ड आवाज

जब नर्मदा नदी पर बनाए जा रहे बाँध की ऊंचाई बढ़ाने का सरकार ने फैसला किया तो उसके विरोध में भी मेधा पाटकर 28 मार्च 2006 को अनशन पर बैठ गईं थीं और वे आज भी विस्थापितों के पुनर्वास की लड़ाई लड़ रही हैं. उनका कहना है कि उनकी यह लड़ाई तबतक चलती रहेगी जबतक सभी प्रभावित परिवारों का पुनर्वास सही ढंग से नहीं हो जाता.

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भीमराव अंबेडकर : संविधान के अप्रतिम शिल्पी

महात्मा गाँधी को अंबेडकर सिर्फ हिन्दुओं का नेता कहते थे, जबकि गाँधी अपने को सभी हिन्दुस्तानियों का नेता मानते थे। वे अपनी ओर से पहल करके अंबेडकर से संवाद की कोशिश करते रहे और उन्हें अपनी सोच से अवगत कराते रहे। गाँधी लगातार अंबेडकर की सोच को समझने की कोशिश भी करते रहे। अस्पृश्यता के विरुद्ध गाँधी भी थे और अंबेडकर भी, लेकिन एक द्रष्टा था दूसरा भोक्ता।

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नरेन्द्र दाभोलकर : अंधविश्वास के खिलाफ शहादत 

डॉ. दाभोलकर ने ‘सामाजिक कृतज्ञता निधि’ की स्थापना की थी जिसके तहत परिवर्तनवादी आंदोलन के कार्यकर्ताओं को प्रतिमाह मानदेय दिया जाता है। उन्होंने अंधविश्वास उन्मूलन से संबंधित एक दर्जन से अधिक पुस्तकें लिखी हैं। उनमें ‘ऐसे कैसे झाले भोंदू’ (ऐसे कैसे बने पोंगा पंडित), ‘अंधश्रद्धा विनाशाय’, ‘अंधश्रद्धा: प्रश्नचिन्ह आणि पूर्णविराम’(अंधविश्वास: प्रश्नचिन्ह और पूर्णविराम), भ्रम आणि निरास, प्रश्न मनाचे (सवाल मन के) आदि प्रमुख हैं।