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सूफीवाद की सार्थकता और प्रासंगिकता -प्रेम सिंह

Post Views: 8 (1) मानव सभ्यता के साथ किसी न किसी रूप में धर्म जुड़ा रहा है। आधुनिक काल से पूर्व युगों में सृष्टि की रचना एवं संचालन की परम-सत्ता…

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बुद्धिवाद : पाखंड व अन्धविश्वास से मुक्ति का मार्ग – पेरियार

जो सुना जाता है; जो लिखा गया है; जो लम्बे समय से होता आ रहा है; जो बहुतों के द्वारा माना जाता है या जो ईश्वर के द्वारा कहा गया है; उस पर विवेकशील लोगों को तुरन्त ही विश्वास नहीं करना चाहिए। जो कुछ भी हमें आश्चर्यजनक लगता है, उसे तुरन्त ही दिव्य या चमत्कारी नहीं मान लेना चाहिए। हर परिस्थिति में हमें स्वतंत्र रूप से तर्कसंगत और निष्पक्ष रूप से सोचने के लिए तैयार रहना चाहिए।

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अरुणा आसफ अली : 1942 की रानी झाँसी

महात्मा गांधी ने उन्हें पत्र लिखकर आत्म-समर्पण करने और आत्म-समर्पण के एवज में मिलने वाली धनराशि को हरिजन अभियान के लिए उपयोग करने को कहा, किन्तु अरुणा आसफ अली ने आत्म-समर्पण नहीं किया। वर्ष 1946 में जब उन्हें गिरफ्तार करने का वारंट रद्द किया गया तब जाकर अरुणा आसफ अली ने आत्मसमर्पण किया।

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इतिहास और पूर्वाग्रह – गणेश देवी

Post Views: 11 अज्ञेयवादी हूँ, लिहाज़ा न तो पूरी तरह आस्तिक हूँ, न धुर नास्तिक। फिर भी, बाज़ दफ़ा ऐसा होता है कि आस्था का प्रश्न अहम हो उठता है।…

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धर्म और हमारा स्वतन्त्रता संग्राम – भगतसिंह

Post Views: 91 अमृतसर में 11-12-13 अप्रैल को राजनीतिक कान्फ्रेंस हुई और साथ ही युवकों की भी कान्फ्रेंस हुई। दो-तीन सवालों पर इसमें बड़ा झगड़ा और बहस हुई। उनमें से…

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मैं नास्तिक क्यों हूँ? – भगत सिंह

यह लेख भगत सिंह ने जेल में रहते हुए लिखा था और यह 27 सितम्बर 1931 को लाहौर के अखबार “ द पीपल “ में प्रकाशित हुआ । इस लेख में भगतसिंह ने ईश्वर कि उपस्थिति पर अनेक तर्कपूर्ण सवाल खड़े किये हैं और इस संसार के निर्माण , मनुष्य के जन्म , मनुष्य के मन में ईश्वर की कल्पना के साथ साथ संसार में मनुष्य की दीनता , उसके शोषण , दुनिया में व्याप्त अराजकता और और वर्गभेद की स्थितियों का भी विश्लेषण किया है । यह भगत सिंह के लेखन के सबसे चर्चित हिस्सों में रहा है।

स्वतन्त्रता सेनानी बाबा रणधीर सिंह 1930-31के बीच लाहौर के सेन्ट्रल जेल में कैद थे। वे एक धार्मिक व्यक्ति थे जिन्हें यह जान कर बहुत कष्ट हुआ कि भगतसिंह का ईश्वर पर विश्वास नहीं है। वे किसी तरह भगत सिंह की काल कोठरी में पहुँचने में सफल हुए और उन्हें ईश्वर के अस्तित्व पर यकीन दिलाने की कोशिश की। असफल होने पर बाबा ने नाराज होकर कहा, “प्रसिद्धि से तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है और तुम अहंकारी बन गए हो जो कि एक काले पर्दे के तरह तुम्हारे और ईश्वर के बीच खड़ी है। इस टिप्पणी के जवाब में ही भगतसिंह ने यह लेख लिखा।

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साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज – भगत सिंह

साम्प्रदायिकता की समस्या के हल के लिए क्रान्तिकारी धारा ने अपने विचार प्रस्तुत किये। प्रस्तुत लेख जून, 1928 के ‘किरती’ में छपा। यह लेख इस समस्या पर शहीद भगतसिंह और उनके साथियों के विचारों का सार है।

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अंध विश्वास – प्रेमचंद

Post Views: 26 हिन्दू-समाज में पुजने के लिए केवल लंगोट बांध लेने और देह में राख मल लेने की जरूरत है; अगर गांजा और चरस उड़ाने का अभ्यास भी हो…

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सेक्युलरिज़म अथवा धर्मनिरपेक्षता – रमणीक मोहन

Post Views: 16 { इस लेख के मूल में यह विचार है कि पश्चिमी देशों में भी (जहाँ से असल में सेक्युलरिज़म का सिद्धांत आया) यह सिद्धांत तमाम कोशिशों के…

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गाँव एक गुरुद्वारे दो – सुरेंद्र पाल सिंह

बात सामान्य सी है लेकिन सामान्य लगने वाली बातों के हम इतने अभ्यस्त हो जाते हैं कि असामान्य बातें आँखों से ओझल होनी शुरू हो जाती हैं। हिंदू मन्दिर तो सदियों से केवल द्विजों के लिए ही शास्त्रसम्मत विधान से बनते रहे हैं लेकिन कोई गुरुद्वारा जब समुदाय के आधार पर बने तो सवालिया निशान लगना वाजिब है। मगर जब कोई बात आम हो जाए तो खास नहीं लगती। फिर भी आम के पीछे छुपे हुए खास को देखना आवश्यक है जिससे हमें सामाजिक डायनामिक्स की शांत और सहज दिशा और दशा का भान होता है।