placeholder

पथ की साथी सुभद्राकुमारी चौहान – महादेवी वर्मा

Post Views: 27 हमारे शैशवकालीन अतीत और प्रत्यक्ष वर्तमान के बीच में समय- प्रवाह का पाठ ज्यों-ज्यों चौड़ा होता जाता है त्यों-त्यों हमारी स्मृति में अनजाने ही एक परिवर्तन लक्षित…

placeholder

मुक्तिबोध : एक संस्मरण – हरिशंकर परसाई

Post Views: 21 भोपाल के हमीदिया अस्पताल में मुक्तिबोध जब मौत से जूझ रहे थे, तब उस छटपटाहट को देखकर मोहम्मद अली ताज ने कहा था – उम्र भर जी के भी न जीने का अन्दाज आयाजिन्दगी छोड़ दे पीछा मेरा मैं बाज आया जो मुक्तिबोध…

placeholder

प्रसाद : जैसा मैंने पाया – अमृतलाल नागर

Post Views: 14 प्रसादजी से मेरा केवल बौद्धिक संबंध ही नहीं, हृदय का नाता भी जुड़ा हुआ है। महा‍कवि के चरणों में बैठकर साहित्‍य के संस्‍कार भी पाए हैं और…

placeholder

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ- नामवर सिंह

इन पोथियों का मूल्य उन पर लिखी कीमत में नहीं, दुकानदार की आँखों में नहीं, मेरी डिग्रियों में नहीं, अध्यापक के वेतन में नहीं। उस कोटि-कोटि जनता के हृदय में है, उसकी आँखों में है, उसके हाथों में है। (लेख से )

placeholder

यादों के आइने में भगतसिंह और उनके साथी – यशपाल

Post Views: 630 मैं यह कहानी व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर लिख रहा हूं। भगत सिंह, सुखदेव और मैं कालिज के सहपाठी थे। भगवतीचरण हम लोगों से दो बरस आगे…

placeholder

और सफर तय करना था अभी तो, सरबजीत! – ओमप्रकाश करुणेश

Post Views: 201 ओम प्रकाश करुणेश  (कथाकर व आलोचक सरबजीत की असामयिक मृत्यु पर लिखा गया संस्मरण) सरबजीत के साथ पहली मुलाकात ठीक ठाक से तो याद नहीं, पर खुली-आत्मीय भरी…

placeholder

राठी साहिब के साथ आधी सदी – वी बी अब्रोल

Post Views: 234  वी.बी.अबरोल (प्रोफेसर वी बी अबरोल राजस्थान विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त करके जाट कालेज, रोहतक में अंग्रेजी के प्राध्यापक नियुक्त हुए। महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय में चले शिक्षक आंदोलन…

placeholder

हम ढूंढते फिरे जिन्हें खेतों और गलियों में – ओम सिंह अशफाक

Post Views: 375 शमशेर बहादुर सिंह  (13-1-1911—12-5-1993) आज से करीब 64 साल पहले मैं शमशेर के इलाके में ही पैदा हुआ था। उनके पैतृक गांव ऐलम (मुज्जफरनगर) से मेरा पैतृक…

placeholder

पितृतुल्य प्रो. शिव कुमार मिश्र – ओम सिंह अशफाक

Post Views: 348 शिव कुमार मिश्र (2-2-1931—21-6-2013) जी का जाना हिन्दी जगत में सक्रिय विमर्श और रचनात्मक आलोचना के एक स्तम्भ का उखड़ जाना है। समकालीन परिदृश्य में इस वय में…