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कहानी का रंगमंच -पंकज कुमार

Post Views: 422 आधुनिक काल में रंगमंच शब्द का प्रयोग व्यापक धरातल पर किया जाता है जिसमें रंगमंच के स्थूल तत्व, मंच, दृश्य-सज्जा, प्रकाश-व्यवस्थाओं, ध्वनि-संगीत योजना, नेपथ्य इत्यादि तो आते…

दायरा’ संकीर्ण सामाजिक दायरों पर प्रहार -विकास साल्याण

Post Views: 361 सिनेमा-चर्चा रोहतक के फि़ल्म एवम् टेलीविजन संस्थान के छात्रों द्वारा बनाई गई ‘दायरा’ फि़ल्म हरियाणवी सिनेमा को नई दिशा की ओर ले जा रही है। इस फिल्म…

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पचास साल का सफर हरियाणवी सिनेमा -सत्यवीर नाहडिया

Post Views: 1,736 सिनेमा हरियाणा प्रदेश के स्वर्ण जयंती वर्ष के पड़ाव पर यदि हरियाणवी सिनेमा की स्थिति का सूक्ष्म अध्ययन करें तो निराशा ही हाथ लगती है। सन् 1984…

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गुरनाम कैहरबा – हरियाणा में उभरता रंगमंच

Post Views: 798 रंगमंच आर्थिक रूप से समृद्ध माने जाने वाले हरियाणा प्रदेश में नाटक-रंगमंच व कला का क्षेत्र लगातार उपेक्षित रहा है। जिस वजह से यहां पर कलात्मक पिछड़ापन…

पहाड़ में कायांतरित होता आदमी -कमलानंद झा                                                 

Post Views: 1,007 सिनेमा                 पहाड़ पुरुष दशरथ मांझी के व्यक्तित्व ने एक बार फिर यह सिद्ध किया है कि ज्ञान, बुद्धिमत्ता और गहन संवेदनशीलता सिर्फ औपचरिक शिक्षा की मोहताज…

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हिन्दी सिनेमा में किसान-जीवन -सुनील दत्त

Post Views: 883 सिनेमा माध्यम भारत में अपने सौ साल पूरे कर चुका है। सिनेमा ने भारतीय समाज को गहरे से प्रभावित किया है। बदलते हुए समाज को भी सिनेमा…

स्टेज पर वह मां  की आखिरी रात थी – संजीव ठाकुर

Post Views: 655 व्यक्तित्व मैं तब साढ़े तीन बरस का था। सिडनी, मेरा भाई, मुझसे चार बरस बड़ा था। मां थिएटर कलाकार थीं, हम दोनों भाइयों को बहुत प्यार से…

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ज़ोहरा बाई अम्बाला वाली – महेन्द्र प्रताप चांद

ज़ोहराबाई बहुत ही शिष्ट, सुशील और स्वाभिमानी महिला थीं। फिल्मी दुनिया में वे अपने हर गीत के लिए दो हजार रुपए पारिश्रमिक लेती थीं, जो उस समय एक बहुत बड़ी राशि थी। बसंत देसाई के संगीत में बनी एक फिल्म ‘मतवाला शायर राम जोशी’ में उन्होंने बीस गाने गाये थे और चालीस हजार रुपए पारिश्रमिक लिया था। सन् 1950 के बाद कुछ नई गायिकाएं आ गईं और इन्हें कम पारिश्रमिक पर गाने के लिए कहा गया तो इन्होंने इसे स्वीकार करने की अपेक्षा फिल्मों में गाना ही छोड़ दिया। जबकि अधिकतर कलाकार प्राय: दौलत और शोहरत के पीछे भागते हैं, लेकिन ज़ोहराबाई पब्लिसिटी से बहुत दूर रहती थीं और प्रेस वालों से भी बहुत बिदकती थीं।

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लोक-रंग की आंच में पकाया हबीब ने अपना रंग-लोक -डा. सुभाष चंद्र

Post Views: 985 लोक-रंग की आंच में पकाया हबीब ने अपना रंग-लोक सुभाष चंद्र रंगमंच की दुनिया में हबीब तनवीर एक ऐसा नाम है जो पिछले साठ साल से कलाकारों…