Category Archives: लोक कथा

म्हारै गाम का चौकीदार – #MainBhiChowkidar

म्हारै गाम का चौकीदार बोहत टैम पहल्यां की बात सै। म्हारै गाम म्हं एक चौकीदार था। उसके बोहत सारे काम थे। गाम कुछ भी होंदा उसका गोहा (संदेशा, मुनियादी) उसने ए देणा पड़े करदा। कोटा म्हं चीनी मिलणी होंदी, माटी का तेल मिलणा होंदा, पिलसण मिलणी होंदी, पंचैत होंदी, या फैर बोट पड़ने होंदे या सांग होंदा। ओ सारा गाम

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सोनकेसी – पहाड़ी लोक-कथा

एक बार एक साहुकार था। उसके चार पुत्र थे ।चार में से बड़े तीन पुश्तैनी धन्धे के साथ अपना-अपना काम धन्धा  भी करते थे पर सबसे छोटा बेटा कोई काम-धाम नहीं करता था । उसकी इस आदत की वजह से साहुकार उससे नाराज रहने लगा । बोल-चाल भी बंद हो गई । बाकी के भाई भी उससे खिंचे-खिंचे से रहने

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चुराही पहेलियां (फड़ौणी)

चुराही (चंबा जिले के चुराह तहसील की पहाड़ी बोली) में पहेलियों को फड़ौणी कहा जाता है। जब बर्फ गिर रही होती है तो घर के सारे सदस्य रसोई में जमा रहता हैं। रसोई में लोहे का बड़ा चुल्हा होता है जिसे वह तंदूर कहते हैं वह पूरे कमरे को गर्म कर देता है। रसोई काफी बड़ी होती है। ठंड में

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आपणे की चोट

 राजकिशन नैन (राजकिशन नैन हरियाणवी संस्कृति के ज्ञाता हैं और बेजोड़ छायाकार हैं। साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में उनके चित्र प्रकाशित होते रहे हैं।) एक सुनार था। उसकी दुकान के धौरे एक लुहार की दकान बी थी। सुनार जिब काम करदा, तै उसकी दुकान म्हं कती कम खुड़का हुंदा, पर जिब लुहार काम करदा तै उसकी दुकान म्हं तैं कानां के परदे

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सुरेन्द्र पाल सिंह – एक सांड और गधे की मौत

लघु कथा बचपन में हमारे घर के बगल में एक रेलवे लाइन पर फाटक था जिसके पास एक जोहड़ था। शहर भर की गायें दिन भर उस जोहड़ पर कुछ पालियों के द्वारा आराम करने के लिए लायी जाती थी और स्वभाविक है कि उन गायों के झुण्ड में एक सांड भी होता था। एक बार ना जाने कहां से

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महादे-पारवती

लोक कथा एक बर की बात सै। पारबती महादे तैं बोल्ली – महाराज, धरती पै लोग्गाँ का क्यूकर गुजारा हो रह्या सै? मनै दिखा कै ल्याओ। महादे बोल्ले- पारबती, इन बात्ताँ मैं के धरया सै? अडै सुरग मैं रह, अर मोज लूट। धरती पै आदमी घणे दुखी सैं। तू किस-किस का दुख बाँटेगी। पारबती बोल्ली- महाराज, मैं नाँ मान्नू। मैं

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दुनिया जीण कोनी दींदी

 हरियाणवी लोक कथा एक बर एक जवान आपणी घरआळी नैं लेण गया। सवारी खातर उसनैं घोड़ी ले ली। वापसी म्हं दोनों घोड़ी पै सवार होकै चाल पड़े। रास्ते म्हं एक गाम तै लिकडऱे थे तो उननैं देख कै लोग बोल्ले, ‘रै देखो, जुल्म। माड़ी सी घोड़ी अर दो-दो सवारी।’ उनकी बात सुणकै जवान घोड़ी की लगाम पकड़ कै पैरें पैरें

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कौआ और चिड़िया

लोक कथा                 एक चिड़िया थी अर एक था कौआ। वै दोनों प्यार प्रेम तै रह्या करै थे। एक दिन कौआ चिड़िया तै कहण लाग्या अक् चिड़िया हम दोनों दाणे-दाणे खात्तर जंगलां म्हं फिरैं, जै हम दोनों सीर मैं खेती कर ल्यां तो आच्छा रैगा। चिड़िया भी इस बात पै राजी होग्यी। आगले दिन चिड़िया कौआ तै कहण लाग्यी अक्

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झोटा अर शेर

लोक कथा एक आदमी कैदो मैंस थी। उसका छोरा उननै चराण जाया करदा। दोनू मैंस ब्यागी। एक नै दिया काटड़ा अर दूसरी नै दी काटड़ी। वो काटड़ा घणा ऊत था। वो उस काटड़ी नै सारा दिन तंग करदा। काटड़ी नै आपणी मां तै शकैत करी पर काटड़ा तै उसनै तंग करण तै हटाए कोनी। सारा दिन उसकै टाक्कर मारदा। काटड़ी

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गादड़ का चौंतरा – लोक कथा

हरियाणवी लोक कथा एक गादड़ था, वो अपणा चौंतरा बणा कै, लीप-पोत कै, साफ-सुथरा राख्या करता। वो अपणा रोब भोत राख्या करता। वो न्यू जाणता के सारा जंगल तेरा कह्या मानै। एक दिन वो खूब सज-धज कै अपणे  चौंतरे पै जा बैठा। जो कोये आवे उसे त बूझे मैं किसा लागू सूं? सब न सराह दिया। बस फेर के था

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