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किसानी चेतना की एक रागनी और एक ग़ज़ल- मनजीत भोला

मनजीत भोला का जन्म सन 1976 में रोहतक जिला के बलम्भा गाँव में एक साधारण परिवार में हुआ. इनके पिता जी का नाम श्री रामकुमार एवं माता जी का नाम श्रीमती जगपति देवी है. इनका बचपन से लेकर युवावस्था तक का सफर इनकी नानी जी श्रीमती अनारो देवी के साथ गाँव धामड़ में बीता. नानी जी की छत्रछाया में इनके व्यक्तित्व, इनकी सोच का निर्माण हुआ. इन्होने हरियाणवी बोली में रागनी लेखन से शुरुआत की मगर बाद में ग़ज़ल विधा की और मुड़ गए. इनकी ग़ज़लों में किसान, मजदूर, दलित, स्त्री या हाशिये पर खड़े हर वर्ग का चित्रण बड़ी संजीदगी के साथ चित्रित होता है. वर्तमान में कुरुक्षेत्र में स्वास्थ्य निरीक्षक के पद पर कार्यरत हैं.

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त्योहारी कुण्डलियाँ- सत्यवीर नाहडिय़ा

सत्यवीर नाहडिय़ा- रेवाड़ी जिले के नाहड़ गांव में 15 फरवरी, 1971 को जन्म। एम.एस.सी और बी.एड. की उपाधि। “लोक-राग” नामक हरियाणवी रागनी-संग्रह प्रकाशित। चंडीगढ़ से “दैनिक ट्रिब्यून” में ‘बोल बखत के’ नाम से दैनिक-स्तंभ। हरियाणवी फिल्मों में संवाद-लेखन। रा.व.मा.व. बीकेपुर रेवाड़ी में रसायन शास्त्र के प्राध्यापक के पद पर सेवारत।

समुंद्र सिंह के दो हरियाणवी गीत

समुंद्र सिंह का जन्म बहलबा, रोहतक हरियाणा में हुआ। इनके यू ट्यूब पर अनेक भजन और गीत, अनेक पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं, गजल, गीत, भजन,लेख आदि प्रकाशित हुए हैं। अकाशवाणी और दूरदर्शन से भी भजन और गीत प्रसारित हुए हैं ।

लोक साहित्य : प्रतिरोध की चेतना ही उसकी समृद्धि है – डॉ. अमरनाथ

लोक साहित्य में लोक जीवन का यथार्थ है, पीड़ा है, दुख है, मगर उस दुख और पीड़ा से जूझने का संकल्प भी है, मुठभेड़ करने का साहस भी है. यहां सादगी है, प्रेम है, निष्ठा है, ईमानदारी है और सुसंस्कार है. हमारे लोक साहित्य में लोक का जो उदात्त चरित्र चित्रित है वह शिष्ट साहित्य में दुर्लभ है. शिष्ट साहित्य और लोक साहित्य के बीच का फासला वस्तुत: दो वर्गों के बीच का फासला है.

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बराबरी की मांग करता है रविदास का साहित्य – डॉ. सुभाष चन्द्र

Post Views: 244 गुरू रविदास की जयंती के अवसर पर देस हरियाणा पत्रिका और सत्यशोधक फाउंडेशन की ओर से सावित्रीबाई-जोतिबा फुले पुस्तकालय, सैनी समाज भवन, कुरूक्षेत्र में एक विचार गोष्ठी…

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‘तीज रंगीली री सासड़ पींग रंगीली’ – प्रो. राजेंद्र गौतम

Post Views: 423 हरियाणवी कवि लखमीचन्द की कविता की कला को जितनी-जितनी बार निरखा जाता है, उसकी सुंदरता की उतनी-उतनी नई परतें खुलती चली जाती हैं। वह साधारण में असाधारणता…

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हरियाणा में रागनी की परम्परा और जनवादी रागनी की शुरुआत – डा. ओमप्रकाश ग्रेवाल

रागनी की असली जान, ठेठ लोकभाषा के मुहावरों में सीधी-सादी लय अपनाने में और ऐसे मर्म-स्पर्शी कथा प्रसंगों के चुनाव में होती हैं ” जो लोगों के मन में रच-बस गये हों। इन सबके सहारे ही रागनी लोगों की भावनाओं को, उनकी पीड़ाओं तथा दबी हुई अभिलाषाओं को सुगम और सरल ढंग से प्रस्तुत करने में सफल होती हैं।

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आबादी को उसकी भाषा से वंचित कर देना तो जुल्म है – डा. नवमीत नव

लेकिन अब एमबीबीएस के बाद ढाई साल के अध्यापन और फिर एमडी के तीन साल और अब एक साल से फिर अध्यापन के अनुभव से मुझे एक चीज पता चली कि आप किसी को पढ़ाना/ समझाना चाहें या किसी से पढ़ना/समझना चाहें तो यह काम सबसे बेहतर आपकी अपनी मातृभाषा में ही हो सकता है।

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नई रागनी के शिखर पुरुष पं. जगन्नाथ से संवाद – रोशन वर्मा 

नई रागनी के शिखर पुरुष पं. जगन्नाथ हमारे बीच नहीं रहे। देस हरियाणा की ओर से कलाकार को विनम्र श्रद्धांजलि। रचनाकार के स्वयं के बारे में जानना भी एक अनूठा अनुभव होता है। पं. जगन्नाथ जी के अवदान को याद करते हुए प्रस्तुत है  2013 में  रोशन वर्मा की पंडित जगन्नाथ से हुआ संवाद –