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मां के कंगन (लघुकथा) – विनोद वर्मा 'दुर्गेश

आशा मन ही मन उस ईश्वर का धन्यवाद कर रही थी कि उसे एक खुद्दार पति मिला है। वह अपनी खुशी को भुलाकर रजत के साथ मां के कंगन और झुमके देने चल पड़ी।

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   रत्नकुमार सांभरिया की लघु कथाएं

Post Views: 230 लघु-कथा धर्म-धंधा             मोहल्ले का मंदिर एक अर्से से अर्द्धनिर्माण पड़ा हुआ था। दीवारें बन चुकी थीं, छत की दरकार थी। मूर्तियां प्राण-प्रतिष्ठित थीं, अतः श्रद्धालुओं की…