Category Archives: आधी दुनिया

मुनाजात-ए-बेवा

अल्ताफ़ हुसैन हाली पानीपती   मुनाजात-ए-बेवा (1884) ए सब से अव्वल1 और आखिर2 जहाँ-तहाँ हाजि़र और नाजि़र3 ए सब दानाओं से दाना4 सारे तवानाओं से तवाना5 ए बाला हर बाला6 तर से चाँद से सूरज से अम्बर से ए समझे बूझे बिन सूझे जाने पहचाने बिन बूझे सब से अनोखे सब से निराले आँख से ओझल दिल के उजाले ए

Read more

सावित्रीबाई फुले : जीवन जिस पर अमल किया जाना चाहिए

7 जनवरी को दलित शोषण मुक्ति मंच (DSMM), दिल्ली ने भारत की पहली महिला शिक्षक सावित्रीबाई फुले की 187वें जन्मदिवस पर एक कार्यक्रम का आयोजन किया न्यूज़क्लिक प्रोडक्शन 09 Jan 2018 7 जनवरी को दलित शोषण मुक्ति मंच (DSMM), दिल्ली ने भारत की पहली महिला शिक्षक सावित्रीबाई फुले की 187वें जन्मदिवस पर एक कार्यक्रम का आयोजन किया I इस कार्यक्रम

Read more

सावित्रीबाई फुले: आधुनिक भारत की प्रथम शिक्षिका

प्रमोद दीक्षित ‘मलय‘ .भारतवर्ष में 19वीं शताब्दी का उत्तरार्ध शैक्षिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक आंदोलनों एवं समाज में व्याप्त अस्पृश्यता, बाल विवाह, सती प्रथा, कन्या भ्रूण हत्या एवं अशिक्षा के विरुद्ध लड़ाई का स्वर्णिम काल था। आज देश में शिक्षा का स्तर बढ़ा है, सबके लिए विकास के समान अवसर उपलब्ध हैं पर डेढ़ सौ साल पहले यह कल्पना करना भी

Read more

बेटियों की निस्बत

अल्ताफ़ हुसैन हाली पानीपती   ज़ाहलियत के ज़माने में ये थी रस्मे अरब के किसी घर में अगर होती थी पैदा दुख़्तर1 संग दिल2 बाप उसे गोद से लेकर माँ की गाड़ देता था ज़मीं में कहीं जि़न्दा जाकर रस्म अब भी यही दुनिया में है जारी लेकिन जो के अन्धे हैं हिय्ये के नही कुछ उनको ख़बर लोग बेटी

Read more

दुपट्टा एक लड़की के गले का फंदा है

हरमन दिनेश जिस मुल्क में बेटियों की भ्रूण हत्या को रोकने के लिए बेटी बचाओ जैसा कैंपेन चलाना पड़े उस देस में बेटियाँ कितनी सशक्त होंगी यह सहज अनुमान लगाया जा सकता है, जिन बेटियों को कैंपेन चला कर, कानूनी धाराएं लगा कर बचाया गया है उनका भविष्य कहाँ तक सुरक्षित है और वे लड़कियाँ कितनी स्वतंत्र होंगी अपने फैसला

Read more

दलित स्त्री के जीवन की महागाथा – ‘दाई’

अनिता भारती भारत की सत्तर प्रतिशत आबादी गांव में निवास करती है। इस आबादी के पास शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं का नितांत अभाव है।  अशिक्षा, गरीबी और अज्ञानता के साथ-साथ मौलिक सुविधाओं के अभाव में ग्रामीण समाज ने जीने खाने और रहने के अपने तौर तरीकों का विकास अपने तरीकों से कर लिया है। ऐसे ही तौर

Read more

मनुष्य की नई प्रजाति

सहीराम  हम मनुष्य की नई प्रजाति हैं। हमारी खासियत यह है कि हम अपने बच्चों को खा जाते हैं। हम सांप नहीं हैं, हम कोई ऐसे बनैले जीव भी नहीं हैं, जो अपने बच्चों को खा जाते हैं। हम मनुष्य ही हैं। ऐसा नहीं है कि हम भूख के मारे अपने बच्चों को खाते हैं। यह सही है कि मनुष्यों

Read more

लिंग-संवेदी भाषा की ओर एक कदम

डा. सुभाष चंद्र अपने अल्फ़ाज पर नज़र रक्खो, इतनी बेबाक ग़ुफ्तगू न करो, जिनकी क़ायम है झूठ पर अज़मत, सच कभी उनके रूबरू न करो। – बलबीर सिंह राठी आजकल संवेदनशील स्वतंत्रचेता नागरिक ये महसूस कर रहे हैं कि समाज का ध्रुवीकरण और घोर विभाजन हो रहा है। व्यक्तियों की पसंद-नापसंद और राजनीतिक दलों के प्रति पक्षधरता कट्टरता का रूप लेती जा

Read more

जीना इसी का नाम है

गीता पाल           जैसे ही मैंने क्लास में कदम रखा और पूछा, मॉनीटर कौन है? लड़कों की तरफ से आवाज आई – जी चन्दा। बहुत ही साधारण, पतली, छोटा कद, सांवली, एकदम मरियल लड़की मेरे सामने खड़ी थी। चंदा 11वीं कक्षा में पढ़ रही थी, लेकिन देखने में किसी भी सूरत में 8वीं कक्षा से ज्यादा नहीं

Read more

एक गांव दो चेहरे

सहीराम कोई दो महीने पहले यह गांव पहली बार तब चर्चा में आया था,जब बीजिंग ओलंपिक में इस गांव के बेटे विजेंद्र ने मुक्केबाजी में कांस्य पदक जीत कर अपने देश और अपने गांव का नाम रौशन किया था। जी हां, हम हरियाणा के भिवानी जिले के गांव कालूवास की बात कर रहे हैं। आज यह गांव एक बार फिर

Read more
« Older Entries