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रामकथा के प्रथम अन्वेषक फादर कामिल बुल्के – अमरनाथ

फादर बुल्के का विश्वास था कि ज्ञान- विज्ञान के किसी भी विषय की संपूर्ण अभिव्यक्ति हिन्दी में संभव है और अंग्रेजी पर आश्रित बने रहने की धारणा निरर्थक है. उनका दृढ़ विश्वास था कि हिन्दी निकट भविष्य में ही समस्त भारत की सर्वप्रमुख भाषा बन जाएगी.

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मीडिया समीक्षा का मार्क्सवादी आदर्श : जवरीमल्ल पारख – अमरनाथ

जवरीमल्ल पारख इंदिरागांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय के मानविकी संकाय के निदेशक पद से अवकाश ग्रहण करने के बाद मीडिया के पूर्णकालिक समीक्षक के रूप में सक्रिय हैं और उनसे अभी बहुत मूल्यवान प्राप्त होने की उम्मीद है. हम प्रो. जवरीमल्ल पारख को उनके जन्मदिन के अवसर पर हिन्दी मीडिया, सिनेमा और साहित्य की समीक्षा के क्षेत्र में किए गए व्यापक अवदान का स्मरण करते हैं, उन्हें जन्मदिन की बधाई देते हैं और उनके सुस्वास्थ्य और सतत सक्रियता की कामना करते हैं.

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Post Views: 13 प्रश्न-“आपके यहाँ इतनी अधिक भाषाएँ, इतनी अधिक जातियाँ हैं कि उनका पूरा गड़बड़झाला है। आप एक-दूसरे को किस तरह से समझ पाते हैं?”  अबूतालिब का जवाब-“जो भाषाएँ…

समाज की धड़कनों को पढ़ लेता है रचनाकार – टी. आर. कुण्डू

समाज व्यक्तियों का घर नहीं है, समूह नहीं, ये एक संवेदनशील सामूहिकता है। जिसका एक मिजाज है, जिसकी एक अंतरात्मा है, जो हमें बुरे-भले की समझ का बोध कराते हैं। मूलत: यह एक नैतिकता में ही बसी हुई है। इसी के बलबूते हम आगे बढ़े हैं। कोई भी संरचना अंतिम नहीं है। उसके बाह्य व भीतरी समीकरण है जो बदलते रहते हैं। हर बदलाव के कुछ दबाव होते हैं। कुछ तनाव होते हैं। कुछ पीड़ाएं होती हैं। सबसे पहले इसकी आहट आप रचनाकारों को मिलती है।

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हिन्दुस्तान की जातीय भाषा के अन्वेषक जॉन गिलक्रिस्ट – अमर नाथ

जॉन बोर्थविक गिलक्रिस्ट ( जन्म- 19.6.1759 ) ऐसे पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने हिन्दुस्तान की जातीय भाषा की सबसे पहले पहचान की, उसके महत्व को रेखांकित किया, भारत में उसके अध्ययन की नींव रखी, उसका व्याकरण बनाया और इंग्लिश- हिन्दुस्तानी डिक्शनरी बनाकर अध्ययन करने वालों के लिए रास्ता आसान कर दिया. एडिनबरा में जन्म लेने वाले जॉन गिलक्रिस्ट वास्तव में एक डॉक्टर थे और ईस्ट इंडिया कम्पनी में सर्जन बनकर 1783 ई. में भारत आए.

लोक साहित्य : प्रतिरोध की चेतना ही उसकी समृद्धि है – डॉ. अमरनाथ

लोक साहित्य में लोक जीवन का यथार्थ है, पीड़ा है, दुख है, मगर उस दुख और पीड़ा से जूझने का संकल्प भी है, मुठभेड़ करने का साहस भी है. यहां सादगी है, प्रेम है, निष्ठा है, ईमानदारी है और सुसंस्कार है. हमारे लोक साहित्य में लोक का जो उदात्त चरित्र चित्रित है वह शिष्ट साहित्य में दुर्लभ है. शिष्ट साहित्य और लोक साहित्य के बीच का फासला वस्तुत: दो वर्गों के बीच का फासला है.

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हिन्दी में शोध का धंधा – डॉ. अमरनाथ

वैश्वीकरण के बाद अनुसंधान के क्षेत्र में और भी तेजी से गिरावट आई है. अब तो हमारे देश की पहली श्रेणी की प्रतिभाएं मोटी रकम कमाने के चक्कर में मैनेजर, डॉक्टर और इंजीनियर बनना चाहती हैं और जल्दी से जल्दी विदेश उड़ जाना चाहती हैं. किसी ट्रेडिशनल विषय में पोस्टग्रेजुएट करके शोध करना उन्हें नहीं भाता. जो डॉक्टर या इंजीनियर नहीं बन पाते वे ही अब मजबूरी में शोध का क्षेत्र चुन रहे हैं. वैश्वीकरण और बाजारवाद ने नयी प्रतिभाओं का चरित्र ही बदल दिया है.

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हिन्दी आलोचना में विसंगतियाँ – डॉ. अमरनाथ

हिन्दी आलोचना का इतिहास विसंगतियों से भरा हुआ है और हमारा हिन्दी समाज अब उसके दुष्परिणाम भी झेल रहा है किन्तु हमारे वरिष्ठ आलोचकों की नजर भी उन विसंगतियों की ओर नहीं पड़ रही है. हम उनमें से कुछ विसंगतियों की ओर पाठको का ध्यान आकृष्ट करने की कोशिश करेंगे.

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जीवन के विविध रंगों जीवन-दृष्टि देता रंगमंच – अरुण कुमार कैहरबा

थियेटर या रंगमंच जीवन के विविध रंगों को मंच पर प्रस्तुत करने की जीवंत विधा है। रंगमंच सही गलत के भेद को बारीकी से चित्रित करता है। रंगमंच सवाल खड़े करता है। रंगमंच समाज का आईना ही नहीं है, बल्कि परिवर्तन का सशक्त औजार भी है।

साहित्य की महत्ता – आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी (1864–1938) हिन्दी के महान साहित्यकार, पत्रकार एवं युगप्रवर्तक थे। हिंदी साहित्य की अविस्मरणीय सेवा की और अपने युग की साहित्यिक और सांस्कृतिक चेतना को दिशा और दृष्टि प्रदान की। 17 वर्ष तक हिन्दी की प्रसिद्ध पत्रिका सरस्वती का सम्पादन किया।