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तब इरफान बोले थे – तनहाई से घबराता हूं और पैसों से ऊब जाता हूं

Post Views: 18 बॉलिवुड के बेहतरीन ऐक्टर इरफान भले ही इस दुनिया से चले गए हों मगर फैन्स के दिलों में वह हमेशा जिंदा रहेंगे। इरफान को गुजरे पूरा एक…

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उत्तर-दक्षिण भाषा-सेतु के वास्तुकार: मोटूरि सत्यनारायण – प्रो. अमरनाथ

Post Views: 79 आजादी के आन्दोलन के दौरान गाँधी जी के साथ हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में विकसित करने का जिन लोगों ने सपना देखा और उसके लिए आजीवन…

सरकारी सेवाओं से मातृभाषाओं की बिदाई – डॉ. अमरनाथ

Post Views: 99 यूपी बोर्ड की परीक्षा में आठ लाख विद्यार्थियों का हिन्दी में फेल होने का समाचार 2020 में सुर्खियों में था. कुछ दिन बाद जब यूपीपीएससी का रेजल्ट…

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विज्ञान को हिन्दी में सुलभ कराने वाले हिंदी के अप्रतिम योद्धा : गुणाकर मुले – प्रो. अमरनाथ

(लेखक कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं.)

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हिन्दी की गांधीवादी आलोचना -प्रो. अमरनाथ

गांधी जी के अनुसार सच्चा प्रजातंत्र कभी भी हिंसा और दंड-विधान के बल पर कायम नहीं किया जा सकता. व्यक्ति के पूर्ण और स्वतंत्र विकास के लिए जनतांत्रिक समाज को परस्पर सहयोग और सद्भाव, प्रेम और विश्वास पर आधारित रहना चाहिए. मानवता का विकास इन्हीं सिद्धांतों के आधार पर आज तक हुआ है और आगे भी होगा. (लेख से)

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मीडिया समीक्षा का मार्क्सवादी आदर्श : जवरीमल्ल पारख – अमरनाथ

जवरीमल्ल पारख इंदिरागांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय के मानविकी संकाय के निदेशक पद से अवकाश ग्रहण करने के बाद मीडिया के पूर्णकालिक समीक्षक के रूप में सक्रिय हैं और उनसे अभी बहुत मूल्यवान प्राप्त होने की उम्मीद है. हम प्रो. जवरीमल्ल पारख को उनके जन्मदिन के अवसर पर हिन्दी मीडिया, सिनेमा और साहित्य की समीक्षा के क्षेत्र में किए गए व्यापक अवदान का स्मरण करते हैं, उन्हें जन्मदिन की बधाई देते हैं और उनके सुस्वास्थ्य और सतत सक्रियता की कामना करते हैं.

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Post Views: 23 प्रश्न-“आपके यहाँ इतनी अधिक भाषाएँ, इतनी अधिक जातियाँ हैं कि उनका पूरा गड़बड़झाला है। आप एक-दूसरे को किस तरह से समझ पाते हैं?”  अबूतालिब का जवाब-“जो भाषाएँ…

समाज की धड़कनों को पढ़ लेता है रचनाकार – टी. आर. कुण्डू

समाज व्यक्तियों का घर नहीं है, समूह नहीं, ये एक संवेदनशील सामूहिकता है। जिसका एक मिजाज है, जिसकी एक अंतरात्मा है, जो हमें बुरे-भले की समझ का बोध कराते हैं। मूलत: यह एक नैतिकता में ही बसी हुई है। इसी के बलबूते हम आगे बढ़े हैं। कोई भी संरचना अंतिम नहीं है। उसके बाह्य व भीतरी समीकरण है जो बदलते रहते हैं। हर बदलाव के कुछ दबाव होते हैं। कुछ तनाव होते हैं। कुछ पीड़ाएं होती हैं। सबसे पहले इसकी आहट आप रचनाकारों को मिलती है।