Category Archives: भाषा/संस्कृति/सिनेमा

हरियाणा का आर्थिक विकास और सांस्कृतिक पिछड़ापन

प्रोफेसर टी आर कुण्डू एक नवम्बर 2015 को कुरुक्षेत्र में ‘देस हरियाणा’ पत्रिका की ओर से हरियाणाः साहित्य समाज और संस्कृति विषय पर सेमिनार का आयोजन किया। जिसमें अर्थशास्त्री प्रो. टी. आर. कुण्डू, लोक संस्कृतिविद् डा. सुधीर शर्मा, डा. महासिंह पुनिया ने अपने विचार रखे। प्रख्यात उपन्यासकार भगवानदास मोरवाल ने इस सेमिनार की अध्यक्षता की। अमन वशिष्ठ, प्र्रोफेसर जोगा सिंह,

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विश्व की समस्त भाषाओं के बारे में सार्वभौमिक सत्य

प्रोफेसर सुभाष चंद्र, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र जब लोग इकट्ठे होते हैं तो बात ही करते हैं। जब वे खेलते हैं, प्यार करते हैं। हम भाषा की दुनिया में रहते हैं। हम अपने दोस्तों से, अपने सहयोगियों से, अपनी पत्नियों से, पतियों से, प्रेमियों से, शिक्षकों से, मां-बाप से, अपने प्रतिद्वंद्वियों से यहां तक कि अपने दुश्मनों से भी बात करते

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डा. नवमीत नव – आबादी को उसकी भाषा से वंचित कर देना तो जुल्म है

मेरे कुछ साथी डॉक्टर रहे हैं जो रूस से पढ़कर आये हैं। वे बताते हैं कि वहां मेडिकल की पढ़ाई रूसी भाषा में होती है। और बहुत अच्छी होती है। या फिर चीन में, फ्रांस में या जर्मनी में। सब अच्छे से होता है। सिर्फ हमारे यहां ही एलियन भाषा को थोपा जाता है। हमें डॉक्टर बनाने हैं, अंग्रेजी के

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भारत के विकास के लिए भारतीय भाषाऐं जरूरी क्यों

 विज्ञान की शिक्षा में चोटी पर रहने वाले देश: 2012 में विज्ञान की सकूल स्तर की शिक्षा में पहले 50 स्थान हासिल करने वाले देशों में अंग्रेजी में शिक्षा देने वाले देशों के स्थान तीसरा (सिंगापुर), दसवां (कनाडा), चौहदवां (आयरलैंड) सोहलवां (आस्ट्रेलिया), अठाहरवां (न्यूजीलैंड) और अठाईसवां (अमेरिका) थे. इन अंग्रेजी भाषी देशों में भी शिक्षा अंग्रेजी के साथ-साथ दूसरी मातृ

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विपिन सुनेजा – खेतों में लहलहाता संगीत

संगीत हमारे देश की मिट्टी में बसा है। इस मिट्टी में अन्न उगाने वाले कि सान के जीवन में अनेक ऐसे क्षण आते हैं, जब वह भाव-विभोर होकर गाने लगता है। ग्राम्य जीवन पर आधारित अनेक फिल्मों में किसान के मनोभावों को व्यक्त करते हुए गीत रखे जाते रहे हैं, जिनका दृश्यांकन भी ऐसा रहा है कि वे दर्शकों के

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आंगण बीच कूई राजा (लोकगीत)

आंगण बीच कूई राजा डूब क: मरूंगी तू मत डरिए मैं तो औरां न: डराऊंगी जेठ लड़ैगा पाछा फेर क: लडूंगी आजा री जिठानी तेरे धान से छडूंगी धान से छडूंगी तेरी घाणी सी भरूंगी मत डरिए मैं त: औरां न: डराऊंगी देवर लड़ैगा हंस खेल क: लडूंगी आजा री द्योराणी तेरे धान से छडूंगी धान से छडूंगी तेरी घाणी

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डा. हरविन्द्र सिंह – हरियाणा में पंजाबी भाषा

भाषा विमर्श ‘पंजाबी’ शब्द से तात्पर्य पंजाब का निवासी होने से भी है और यह पंजाब-वासियों की भाषा भी है। पंजाब की यह उत्तम भाषा ‘गुरमुखी’ लिपि में लिखी जाती है।1 पंजाबी भाषा की वर्णमाला जो शारदा और टांकरी से निकली है इसमें गुरुओं के मुख-वाक्य गुरमुखों ने लिखे, जिस कारण नाम ‘गुरमुखी’ प्रसिद्ध हुआ। पंजाब प्रदेश की शुद्ध भाषा

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गुरनाम कैहरबा – हरियाणा में उभरता रंगमंच

रंगमंच आर्थिक रूप से समृद्ध माने जाने वाले हरियाणा प्रदेश में नाटक-रंगमंच व कला का क्षेत्र लगातार उपेक्षित रहा है। जिस वजह से यहां पर कलात्मक पिछड़ापन देखा जा सकता है। हरियाणा में कोई समृद्ध परम्परा नही रही। मगर वर्तमान में  हरियाणा में रंगमंच के नए अंकुर फुट रहे हैं जो हरियाणा में बड़े सांस्कृतिक बदलाव का संकेतक है। समकालीन

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उस्ताद धुलिया खान

रोशन वर्मा  हम बहुत से बड़े-बड़े नाम और काम से ख्यातिनाम लोगों को याद रखते हैं। मगर इन बड़े नामों को नायक बनाने और ख्याति के मुकाम पर ला खड़ा करने में किन लोगों का योगदान रहा, यह हम बहुत कम जानते हैं। यहां हम बात करने रहे हैं उस्ताद धुलिया खान जी की, जिन्होंने पं. लखमी चंद को सांग

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सुनील दत्त – हिन्दी सिनेमा में किसान-जीवन

सिनेमा माध्यम भारत में अपने सौ साल पूरे कर चुका है। सिनेमा ने भारतीय समाज को गहरे से प्रभावित किया है। बदलते हुए समाज को भी सिनेमा में देखा जा सकता है। भारत की अधिकांश आबादी खेती-किसानी से जुड़ी है।  पिछले कुछ समय से खेती-किसानी पर गहरा संकट है, लेकिन सिनेमा जगत में किसानी के संकट को व्यापकता और गंभीरता

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