Category: दलित विमर्श

Savi Savarkar, ‘Untouchables’

पाँच कविताएँ – विनोद कुमार

Post Views: 217 विनोद कुमार ने हाल ही में हिंदी साहित्य में अपना एम.ए. पूरा किया है। दलित साहित्य के पठन – लेखन में विशेष रूचि है। जाति व्यवस्था के

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डॉक्टर आंबेडकर से मेरी भेंट – -सन्तराम बी.ए.

Post Views: 66 किसी विद्वान का व्याख्यान सुनने से या उसकी पुस्तक पढ़ने से जितना फायदा होता है उससे कहीं ज्यादा उस के सत्संग से होता है इसलिए हमारे यहां

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वीरांगना फूलन देवी की जयंती पर विशेष

Post Views: 20 वीरांगना फूलन देवी, यह नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। लोग फूलन देवी को बेंडिट क्‍वीन के नाम से भी जानते हैं।चंबल के बीहड़ों में डकैतों

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संत रैदास : वाणी और मानव-मुक्ति – डॉ. सेवा सिंह

रविदास की मानव मुक्ति में न पौराणिक स्वर्गारोहण है और न ही किसी अदृश्य लोक में बैकुण्ठ वास। इस मुक्ति में कोई दुरूह ब्रह्म विद्या ज्ञान भी नहीं है। वे अपनी वाणी में अपने परिवेश की समस्याओं का आत्मनिष्ठरूप प्रतिपादित करते हुए व्यक्ति को एक उच्चभावपूर्ण स्थिति में ले जाना चाहते हैं जिसमें उसके समस्त बन्धनों का अस्तित्व बना नहीं रह सकता। (लेख से) … Continue readingसंत रैदास : वाणी और मानव-मुक्ति – डॉ. सेवा सिंह

प्रतिभा और आरक्षण – रजनी दिसोदिया

आजकल आरक्षण विरोध का जो मुद्दा गरमाया है उसमें भी बड़ा कंफ्यूजन है। क्या यह पूरी आरक्षण व्यवस्था का विरोध है या अन्य पिछड़ा वर्ग के 27% आरक्षण का विरोध है या यह पिछले सत्तर वर्षों से भीतर ही भीतर सुलगती उस खुन्नस का विस्फोट है जिसे इस ओ.बी.सी. आरक्षण ने और हवा दे दी है। … Continue readingप्रतिभा और आरक्षण – रजनी दिसोदिया

जाति-व्यवस्था का क्षय हो – ई. वी. रामासामी पेरियार

उच्च जाति के धूर्त व्यक्तियों ने अत्यन्त धूर्ततापूर्वक जाति और धर्म को आपस में जोड़ दिया; ताकि उनको अलग करना मुश्किल हो जाए। इसलिए, जब आप जाति को नष्ट करने का प्रयास करते हैं, तो आपको यह डर नहीं लगना चाहिए कि धर्म भी नष्ट हो जाएगा। … Continue readingजाति-व्यवस्था का क्षय हो – ई. वी. रामासामी पेरियार

ब्राह्मणों को आरक्षण से घृणा क्यों ? – पेरियार

पाठकों के समक्ष पेरियार के आरक्षण संबंधी विचारों को उद्घाटित करता उनका महत्वपूर्ण लेख। … Continue readingब्राह्मणों को आरक्षण से घृणा क्यों ? – पेरियार

जाति के बारे में – ई. वी. रामासामी पेरियार

भारत में जाति-व्यवस्था को मिथ्या और कोरी कल्पना साबित करता पेरियार का यह लेख। … Continue readingजाति के बारे में – ई. वी. रामासामी पेरियार

जाति व्यवस्था – पेरियार

ऐसे सूत्रों ने यह भी कहा कि हमारे देश में अनेक महत्त्वपूर्ण जातियाँ ऐसे ही आपसी मेलजोल से सामने आईं। उच्च जाति के लोग पथभ्रष्ट हुए इस और अपने नैतिक मानकों से डिगे, तो इसके परिणामस्वरूप पंचम जाति यानी सबसे पिछड़ी जाति अस्तित्व में आई । … Continue readingजाति व्यवस्था – पेरियार

पति-पत्नी नहीं, बनें एक-दूसरे के साथी – पेरियार

मैं ‘विवाह’ या ‘शादी’ जैसे शब्दों से सहमत नहीं हूँ। मैं इसे केवल जीवन में साहचर्य के लिए एक अनुबन्ध मानता हूँ । इस तरह के अनुबन्ध में मात्र एक वचन; और यदि आवश्यकता हो, तो अनुबन्ध के पंजीकरण के एक प्रमाण की जरूरत है। अन्य रस्मों-रिवाजों की कहाँ आवश्यकता है? इस लिहाज से मानसिक श्रम, समय, पैसे, उत्साह और ऊर्जा की बर्बादी क्यों? … Continue readingपति-पत्नी नहीं, बनें एक-दूसरे के साथी – पेरियार