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शब्द हमें बेसहारा नहीं होने देते: सुरजीत पातर

“होंदा सी इत्थे शख्स़ इक सच्चा जाणे किदर गया
जद दो दिलां नूं जोड़दी एक तार टुट गई-
जद दो दिलां नूं जोड़दी एक तार टुट गई,
साजिंदे पुछदे साज नूं नग़मा किदर गया,
सब नीर होए गंदले, शीशे होए धुंधले इस तरह
हर शख्स़ पुछदा हे, मेरा चेहरा किदर गया
सिक्खां, मुसलमाना ते हिंदुआं दी पीड़ विच
रब ढूंढदा फिरदा, मेरा बंदा किदर गया
दुःख दी ज़मीं नू पुछदा अल्लाह किदर गया
पातर नू जाण-जाण के पुछदी है आज हवा
रेतां ते तेरा नाम लिख्या सी, जाणे किदर गया   

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पत्र-पत्रिकाएं : साहित्यिक सरोकार एवं प्रसार

Post Views: 991 प्रस्तुति – गुंजन  कैहरबा सृजन उत्सव के दौरान 25 फरवरी को ‘पत्र-पत्रिकाएः साहित्यिक सरोकार एवं प्रसार’ विषय पर परिसंवाद का आयोजन हुआ। जिसमें ‘युवा संवाद’ पत्रिका के…

बुत गूंगे नहीं होते

Post Views: 566   कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास विभाग के सभागार में देस हरियाणा की तरफ वरिष्ठ कवि ओम प्रकाश करुणेश के हाल ही में प्रकाशित हुए काव्य संग्रह…

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आजादी के विचार पक्ष को जानना होगा – प्रो. जगमोहन

Post Views: 271 28 जुलाई 2016 को शहीद उधम सिंह राजकीय महाविद्यालय मटक माजरी में ‘स्वतंत्रता आंदोलन और उधम सिंह’ विषय पर एक सेमिनार का आयोजन किया गया। यह सेमिनार…