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हमारी रूह में शामिल था जि़न्दगी की तरह – दिनेश हरमन

Post Views: 607 ग़ज़ल हमारी रूह में शामिल था जि़न्दगी की तरह अभी जो शख्स गया है इक अजनबी की तरह किसी ने बनके समन्दर बिछा दिया खुद को मैं…

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देखने में बेदरो-दीवार सा मैं इक मकां हूं -आबिद आलमी

जो लिखते फिरते हैं एक-इक मकां पे नाम अपना
उन्हें बता दो कि इक दिन हिसाब भी होगा
रात का वक़्त है संभल के चलो
ख़ुद से आगे ज़रा निकल के चलो
गर बदल सकता है औरों की तरह चेहरा बदल ले
वरऩा इस बहरूपियों के शहर से फ़ौरन निकल ले

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बखत पड़े पै रोवै कौण -रिसाल जांगड़ा

Post Views: 184 हरियाणवी ग़ज़ल बखत पड़े पै रोवै कौण। करी कराई खोवै कौण। मशीन करैं सैं काम फटापट, डळे रात दिन ढोवै कौण। दुनिया हो रह्यी भागम भाग, नींद…

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जिनके दिल मैं भरग्ये खटके-रिसाल जांगड़ा

Post Views: 215 हरियाणवी ग़ज़ल जिनके दिल मैं भरग्ये खटके, अपणी मंजिल तै वैं भटके। देख बुढापा रोण पड़ग्या, याद आवैं जोबन के लटके। जिनके ऊंचे कर्म नहीं थे, वैं…

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जिम्मेदारी दुखी करै सै-रिसाल जांगड़ा

Post Views: 190 हरियाणवी ग़ज़ल जिम्मेदारी दुखी करै सै। दुनियादारी दुखी करै सै। कारीगर नै ऐन बखत पै, खुंडी आरी दुखी करै सै। पीछा चाहूं सूं छुटवाणा, मन अहंकारी दुखी…

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अपणा खोट छुपाणा सीख – मंगतराम शास्त्री

Post Views: 604 औरां कै सिर लाणा सीख, अपणा खोट छुपाणा सीख। खोट कर्या पछतावै ना, मंद-मंद मुस्काणा सीख। हाथ काम कै ला ना ला, बस फोए से लाणा सीख।…

दिनेश दधीचि की रचनाएं

बात करती हैं नज़र, होंठ हमारे चुप हैं.
यानि तूफ़ान तो भीतर हैं, किनारे चुप हैं.
उनकी चुप्पी का तो कारण था प्रलोभन कोई
और हम समझे कि वो ख़ौफ़ के मारे चुप हैं.
बोलना भी है ज़रूरी साँस लेने की तरह
उनको मालूम तो है, फिर भी वो सारे चुप हैं.
भोर की वेला में जंगल में परिंदे लाखों
है कोई खास वजह, सारे के सारे चुप हैं.
जो हुआ, औरों ने औरों से किया, हमको क्या?
इक यही सबको भरम जिसके सहारे चुप हैं.