Category Archives: गजल

एक मधुर सपना था, आख़िर टूट गया

महेन्द्र प्रताप ‘चांद’ (वरिष्ठ शायर महेंद्र प्रताप चांद अंबाला में रहते हैं। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में लंबे समय तक पुस्तकालय अध्यक्ष रहे। पचासों साल से अपनी लेखनी से उर्दू ग़ज़ल को समृद्ध कर रहे है।) गज़ल एक मधुर सपना था, आख़िर टूट गया तेरा दामन हाथ में आकर छूट गया! कितने मंज़र ओझल हुए निगाहों से बेटी से जब बाबुल

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सीली बाळ रात चान्दनी आए याद पिया

  कर्मचन्द ‘केसर’  ग़ज़ल सीळी बाळ रात चान्दनी आए याद पिया। चन्दा बिना चकौरी ज्यूँ मैं तड़फू सूँ पिया। तेरी याद की सूल चुभी नींद नहीं आई, करवट बदल-बदल कै मेरी बीती रात पिया। उर्वर धरती बंजर होज्या जोते बोये बिना, हरे धान सूखज्यां सैं बिन पाणी के पिया। साम्मण के म्हं बादल गरजैं बिजली लस्क रहयी, मद जोबण की

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रंग तो सबके लहू का लाल है

विक्रम राही रंग तो सबके लहू का लाल है हड्डियां भी वही हैं वही खाल है। कौम मजहब पर लाता है कौन समझ लीजिए किसकी चाल है । कठपुतली बने हो सदियों से तुम किन हाथों में है डोर ये सवाल है। तु हिन्दू वो मुसलमां ये सिख इसाई आदमी है समझ ये क्या जंजाल है । ओ मजहब के

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धरम घट्या अर बढ़ग्या पाप

  कर्मचन्द ‘केसर’  ग़ज़ल कलजुग के पहरे म्हं देक्खो, धरम घट्या अर बढ़ग्या पाप। समझण आला ए समझैगा, तीरथाँ तै बदध सैं माँ बाप। सारे चीब लिकड़ज्याँ पल म्हँ जिब उप्पर आला मारै थाप। औरत नैं क्यूँ समझैं हीणी, पंचैत चौंतरे अर यें खाप। भामाशाह सेठ होया सै, बीर होया राणा प्रताप। बहू नैं चिन्ता सै रोटी की, सासू कै

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हालात तै मजबूर सूं मैं

कर्मचन्द ‘केसर’  ग़ज़ल हालात तै मजबूर सूँ मैं। दुनियां का मजदूर सूँ मैं। गरीबी सै जागीर मेरी, राजपाट तै दूर सूँ मैं। कट्टर सरमायेदारी नैं। कर दिया चकनाचूर सूँ मैं। लीडर सेक रह्ये सैं रोटी, तपदा होया तन्दूर सूँ मैं। मेरे नाम पै खावैं लोग, आपणे हक तै दूर सूँ मैं। भोरा भी नां कदर सै मेरी, फाइलां म्हं मसहूर

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कर्मचन्द ‘केसर’-सादी भोली प्यारी माँ,

हरियाणवी ग़ज़ल सादी भोली प्यारी माँ, सै फुल्लां की क्यारी माँ। सबके चरण नवाऊं मैं, मेरी हो चै थारी माँ। सारी दुनियां भुल्ली जा, जाती नहीं बिसारी माँ। बालक नैं सूक्खे पावै, गीले पड़ै बिच्यारी माँ। हँस-हँस लाड लड़ावै सै, कोन्या बोलै खारी माँ। सारे जग का आग्गा ले ले, बच्चयाँ आग्गै हारी माँ। पाल-पोष कै बड़े करै, समझै जिम्मेदारी

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कर्मचन्द ‘केसर’-नफरत नै भी प्रीत समझ ले

हरियाणवी ग़ज़ल नफरत नै भी प्रीत समझ ले, सबनैं अपणा मीत समझ ले। लय, सुर, ताल सहीं हों जिसके, जिन्दगी नै वा गीत समझ ले। आदर तै मिले पाणी नैं भी, दूध मलाई सीत समझ ले। दुनियां खोट्टी, आप्पा आच्छा, यास इस जग की रीत समझ ले। गिरकै सवार होया करैं सैं, हार नैं अपणी जीत समझ ले। माणस जात

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महेन्द्र प्रताप ‘चांद’ – एक मधुर सपना था, आख़िर टूट गया

गज़ल महेन्द्र प्रताप ‘चांद’ एक मधुर सपना था, आख़िर टूट गया तेरा दामन हाथ में आकर छूट गया! कितने मंज़र ओझल हुए निगाहों से बेटी से जब बाबुल का घर छूट गया! इक आवारा भंवरा आया मधुबन में कोमल कलियों का जोबन रस लूट गया! ठेस लगी तो चीख़ उठी रूहें-एहसास ख़ार चुभे तो आबला दिल का फूट गया! तन्ज़

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कर्मचन्द ‘केसर’- गलती इतनी भारी नां कर

 हरियाणवी ग़ज़ल   गलती इतनी भारी नां कर। रुक्खां कान्नी आरी नां कर। मीठी यारी खारी नां कर, दोस्त गैल गद्दारी नां कर। नुमाइस की चीज नहीं सै, औरत नैं बाजारी नां कर। परोपकार के करले काम, ठग्गी-चोरी, जारी नां कर। लीडर सै तो कर जनसेवा, स्वारथ की सरदारी नां कर। फेर देस गुलाम हो ज्यागा, क्लम नैं दरबारी नां

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