Category Archives: खेती-बाड़ी

कृषि संकट को समझने के लिए – दो जरूरी किताबें

प्रवीन कुमार भारत के किसान लम्बे समय से एक भयावह और जानलेवा कृषि संकट की गिरफ्त में है। बड़े फार्मर और धनी किसान भले ही इस संकट से ज्यादा प्रभावित न हुए हों, लेकिन देश के कुल किसानों का 90 प्रतिशत- छोटे और मध्यम किसान इस संकट के कारण लाखों की संख्या में आत्महत्या करने को मजबूर हुए हैं। सरकारों

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कुलदीप सिंह ढींढसा – खेती को लाभकारी पेशा नहीं बना पाए

1966 में हमारे सामने अनेक चुनौतियां थी। मुझे याद है उस समय पंजाब  के एक नेता ने कहा था कि इनके पास खाने को तो अन्न है नहीं, ये हरियाणा बनाकर क्या करेंगे। हमारे कृषि वैज्ञानिकों और किसानों ने मिलकर फसलों की नयी किस्में तैयार की, खाद्य उत्पादन को बढ़ाया तथा हरित क्रांति के सफल प्रयोग किए। वक्त गवाह है

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सतीश त्यागी – किसान-संघर्ष से जन्मी सत्ताओं ने ही किसान को दुत्कारा

खेती-बाड़ी 1930 के दशक में चौधरी छोटूराम  हरियाणा के किसानों का आह्वान कर रहे थे कि वे अपने हकों के लिए संघर्ष का रास्ता अख्तियार करें। खुद छोटूराम पंजाब सरकार में मंत्री के रूप में किसानों की जिंदगी बेहतर बनाने के लिए संघर्षरत थे। उनके इस संघर्ष के सुखद परिणाम भी आये और देश के आजाद होते-होते किसान की माली

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सुधीर डांगी – सरकार से किसान को अपनापन नहीं मिलता

खेती-बाड़ी यह विडम्बना ही है कि कृषि-प्रधान देश में आज किसान किसी भी प्रकार से केंद्र में नही है। चाहे कोई भी सरकार हो, किसी भी सरकार से किसान को अपनापन नहीं मिलता। विशेषकर जब से भारत में भूमंडलीकरण और उदारीकरण का दौर शुरू हुआ है, किसान संरक्षण के दायरे से बाहर कर दिए गए हैं और छोटे किसान तो

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राजकुमार शेखुपुरिया – खेती में आए बदलाव

खेती-बाड़ी सिरसा जिला के उत्तर में पंजाब और पश्चिम और दक्षिण में राजस्थान है। यहां बोलचाल में पंजाबी, हिन्दी और बागड़ी भाषा का प्रयोग आमजन करते हैं। सिरसा के चारों ओर बड़े-बड़े धार्मिक डेरे हैं। यहां की जनसंख्या वर्तमान में 88.90 प्रतिशत हिन्दू, 9.01 सिक्ख और 1.26 प्रतिशत मुस्लिम हैं। पुरुष 54 प्रतिशत और महिलाएं 46 प्रतिशत हैं। हरियाणा गठन

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ललित यादव – हरियाणा में अन्नदाता पर आफत

किसानों के हितों के लिए केंन्द्र के साथ राज्य सरकार ने भी घोषणाएं करने में तो कोई कमी नहीं छोड़ी पर तस्वीर वैसी नहीं है जैसी आम और खास अवसरों पर दिखाई जाती है। किसानों की व्यथा यह है कि खेती उन्हें अब मुनाफे का सौदा नजर नहीं आती, इसके लिए कई कारण भी गिनाये जा रहे हैं। स्वामीनाथन आयोग

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डा. जोगिन्द्र सिंह मोर – बदलते हालात-पिछड़ती कृषि

                धरती की सदियों से इकट्ठी की हुई उत्पादन शक्ति को आधी सदी से भी कम समय में हमने  उसे निचोड़ कर रख दिया है। हमने धरती से निकाला ज्यादा है और उसे दिया कम है। अपनी खर्च हो चुकी उत्पादन शक्ति को खुद नये सिरे से पैदा करने की शक्ति धरती में जरूर है, परन्तु इसके लिए हम उसे

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राजकिशन नैन – सिमट रही है आज अंजरि मेंं उनकी धरा-किसानी

हरियाणवी अंचल के गांवों में वैश्वीकरण के दानवी पंजे ने सदियों से चले आ रहे लोकजीवन के ताने-बाने को पूरी तरह छिन्न-भिन्न कर दिया है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाले पुश्तैनी काम-धंधों का पूरा गणित एक बारगी ही बदल गया है। ग्राम्यांचलों में खान-पान और ओढने-पहनने के तौर-तरीके ही नहीं बदले, अपितु काम-धाम, रीति-रिवाज, तीज-त्यौहार, रहन-सहन और दिनचर्या आदि में आमूल-चूल परिवर्तन

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कमलेश चौधरी – हरित क्रान्ति और हरियाणा का विकास

लेख हरियाणा का नाम आते ही कृषि व किसान पर आधारित प्रदेश की छवि आँखों में उभर आती है। जो हरा भरा व सम्पन्न है, पर सच्चाईयाँ कुछ इससे इतर भी है। हरियाणा का निर्माण हुए 51 साल बीत गये हैं। इन वर्षों में कृषि में अभूतपूर्व परिवर्तन आया है। हरियाणा केे सन्दर्भ में इस कालखण्ड को तीन भागों में

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विनोद स्वामी – राजस्थान में किसान आंदोलन

बीजो ना इब बाजरी, बीजो हिवड़े आग। क्रांति फसलां काटस्यां, किस्सा काती लाग।। राजस्थानी साहित्यकार रामस्वरूप किसान ने जब यह दोहा लिखा, तब राजस्थान का किसान नई सदी राह पर विरासत में मिले अकाल की परम्परा को जेहन में लिए खड़ा था। राजस्थान का नाम जुबान पर आते ही दूर-दूर तक पसरी धोरां धरती का बिम्ब बनता है। एक मंथर

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