placeholder

यह मनुज- रामधारी सिंह दिनकर

Post Views: 27 यह मनुज, ब्रह्माण्ड का सबसे सुरम्य प्रकाश, कुछ छिपा सकते न जिससे भूमि या आकाश । यह मनुज, जिसकी शिखा उद्दाम । कर रहे जिसको चराचर भक्तियुक्त…

placeholder

कैदी और कोकिला – माखन लाल चतुर्वेदी

Post Views: 12 तुम रवि-किरणों से खेल, जगत को रोज़ जगाने वाली, कोकिल ! बोलो तो! क्यों अर्धरात्रि में विश्व जमाने आई हो ? मतवाली, कोकिल ! बोलो तो! दूबों…

placeholder

सुख-दुख- सुमित्रानंदन पंत

Post Views: 25 मैं नहीं चाहता चिर-सुख, चाहता नहीं अविरत दुख, सुख-दुख की आँख-मिचौनी खोले जीवन अपना मुख। सुख-दुख के मधुर मिलन से यह जीवन हो परिपूरन, फिर घन में…

placeholder

जागो फिर एक बार- सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

Post Views: 11 जागो फिर एक बार! प्यारे जगाते हुए हारे सब तारे तुम्हें अरुण-पंख तरुण-किरण खड़ी खोलती है द्वार जागो फिर एक बार! . आँखें अलियों-सी किस मधु की…

placeholder

बादल राग- सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला

Post Views: 6 तिरती है समीर-सागर पर अस्थिर सुख पर दुख की छाया जग के दग्ध हृदय पर निर्दय विप्लव की प्लावित माया यह तेरी रण-तरी भरी आकांक्षाओं से घन,…

placeholder

विधवा – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

Post Views: 25 विधवा वह इष्टदेव के मन्दिर की पूजा–सी वह दीप-शिखा-सी शान्त, भाव में लीन, वह क्रूर-काल-ताण्डव की स्मृति-रेखा-सी वह टूटे तरु की छुटी लता-सी दीन दलित भारत की…

placeholder

बीती विभावरी – जयशंकर प्रसाद

Post Views: 11 बीती विभावरी जाग री। अम्बर-पनघट पर डुबो रही तारा-घट ऊषा नागरी। खग कुल कुल-कुल-सा बोल रहा, किसलय का अंचल डोल रहा। लो यह लतिका भी भर लाई…

placeholder

अरुण यह मधुमय देश हमारा – जयशंकर प्रसाद

Post Views: 7 अरुण यह मधुमय देश हमारा! जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा । सरस तामरस गर्भ विभा पर-नाच रही तरुशिखा मनोहर। छिटका जीवन हरियाली पर-मंगल कुंकम…