Category Archives: कविता

जंगली कौन

विनोद सिल्ला कितना भाग्यशाली था आदिमानव तब न कोई अगड़ा था न कोई पिछड़ा था हिन्दू-मुसलमान का न कोई झगड़ा था छूत-अछूत का न कोई मसला था अभावग्रस्त जीवन चाहे लाख मजबूर था पर धरने-प्रदर्शनों से कोसों दूर था कन्या भ्रूण-हत्या का पाप नहीं था किसी ईश्वर-अल्लाह का जाप नहीं था न भेदभावकारी वर्ण-व्यवस्था थी मानव जीवन की वो मूल

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मुनाजात-ए-बेवा

अल्ताफ़ हुसैन हाली पानीपती   मुनाजात-ए-बेवा (1884) ए सब से अव्वल1 और आखिर2 जहाँ-तहाँ हाजि़र और नाजि़र3 ए सब दानाओं से दाना4 सारे तवानाओं से तवाना5 ए बाला हर बाला6 तर से चाँद से सूरज से अम्बर से ए समझे बूझे बिन सूझे जाने पहचाने बिन बूझे सब से अनोखे सब से निराले आँख से ओझल दिल के उजाले ए

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ए हिन्द-पाक के लोगो

अमृतलाल मदान (पिछले पचासों सालों से साहित्य सृजन में सक्रिय वरिष्ठ साहित्यकार अमृतलाल मदान हरियाणा के कैथल शहर के निवासी हैं। नाटक, कविता, उपन्यास, यात्रा आदि लगभग हर विधा में साहित्य रचना कर रहे हैं। प्रगतिशील मूल्य व चेतना इनके साहित्य का केंद्रीय सूत्र है। सांप्रदायिक शक्तियों के खिलाफ निरंतर संघर्ष करते रहे हैं।  – सं।) ऐ हिन्द-पाक के लोगो

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लजीज खाना

विनोद सिल्ला कविता मैं जब कई दिनों बाद गया गाँव माँ ने अपने हाथों से बनाई रोटी कद्दू की बनाई मसाले रहित सब्जी रोटी पर रखा मक्खन लस्सी का भर दिया गिलास खाने में जो मजा आया इसके सामने मुझे लगा किसी रैस्टोरैंट का शाही पनीर कुछ भी नहीं

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सूखा

डॉ. निधि अग्रवाल ( गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश)  में जन्म। बचपन से पढने और लिखने का शौक। एम बी बी एस के बाद पैथोलॉजी में परास्नातक की शिक्षा। वर्तमान में झांसी (उत्तर ) में निजी रूप से कार्यरत। कविताएँ, कहनियाँ और सामाजिक विषयों पर ब्लॉग आदि का लेखन) सूखा सूख गए सब नदियाँ-पोखर नैना बरसे बन परनाले इस बरस भी न

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गाँवन की भिनसार

डॉ. निधि अग्रवाल ( गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश)  में जन्म। बचपन से पढने और लिखने का शौक। एम बी बी एस के बाद पैथोलॉजी में परास्नातक की शिक्षा। वर्तमान में झांसी (उत्तर ) में निजी रूप से कार्यरत। कविताएँ, कहनियाँ और सामाजिक विषयों पर ब्लॉग आदि का लेखन)   नहीं लड़ती घड़ी की सुइयों से गाँवन की भिनसार चिरैया की चिचयान

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अदालत जारी है …

कर्मजीत कौर किशांवल  पंजाबी से अनुवाद परमानंद शास्त्री                                       (कर्मजीत कौर किंशावल पंजाबी की कवयित्री हैं, गगन दमामे दी ताल कविता संग्रह प्रकाशित हुआ है। इनकी कविताएं दलित जीवन के यथार्थपरक चित्र उकेरती हुई सामाजिक न्याय के संघर्ष का पक्ष निर्माण कर रही हैं। पंजाबी से अनुवाद किया है परमानंद शास्त्री जी ने। उन्होंने पंजाबी से हिंदी में गुरदियाल सिंह

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आओ करें स्वागत सर्दी का

शमशेर कैंदल  हमसफीर   छोटे दिन और लंबी रातें, मोटे मोटे अब वस्त्रा भाते, काम चले नहीं वर्दी का, आओ करें स्वागत सर्दी का। छोड़ा जाए ना अब बिस्तर, कब तक पहुंचेंगे हम दफ्तर, भय ठंडी हवा विचरती का, आओ करें स्वागत सर्दी का। आंगन में चाय की चुस्की, पढ़कर खबरें इसकी उसकी, लो आनंद धूप बिखरती का, आओं करें स्वागत

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आज का कन्हैया

कर्मजीत कौर किशांवल  पंजाबी से अनुवाद परमानंद शास्त्री                                       (कर्मजीत कौर किंशावल पंजाबी की कवयित्री हैं, गगन दमामे दी ताल कविता संग्रह प्रकाशित हुआ है। इनकी कविताएं दलित जीवन के यथार्थपरक चित्र उकेरती हुई सामाजिक न्याय के संघर्ष का पक्ष निर्माण कर रही हैं। पंजाबी से अनुवाद किया है परमानंद शास्त्री जी ने। उन्होंने पंजाबी से हिंदी में गुरदियाल सिंह

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