Category Archives: कविता

एक विद्रोही स्त्री – आलोक श्रीवास्तव

इस समाज में शोषण की बुनियाद पर टिके संबंध भी प्रेम शब्द से अभिहित किये जाते हैं एक स्त्री तैयार है मन-प्राण से घर संभालने, खाना बनाने कपड़ा धोने और झाड़ू-बुहारी के लिये मुस्तैद है पुरुष उसके भरण-पोषण में हां, बिचौलियों के जरिये नहीं, एक-दूसरे को उन्होंने ख़ुद खोजा है और इसे वे प्यार कहते हैं और मुझे वेरा याद

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” झुकना मत “

” झुकना मत “ जैसे ही डाक्टर ने कहा झुकना मत। अब और झुकने की गुंजाइश नही… सुनते ही उसे.. हँसी और रोना , एक साथ आ गया। ज़िंदगी में पहली बार वह किसी के मुँह से सुन रही थी ये शब्द …..।। बचपन से ही वह घर के बड़े, बूढ़ों माता-पिता, चाची, ताई, फूफी,मौसी.. अड़ोस पड़ोस, अलाने-फलाने, और समाज

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खतरनाक औरत

खतरनाक औरत यह कविता देस हरियाणा द्वारा आयोजित तीसरे हरियाणा सृजन उत्सव में 9 फरवरी 2019 को राष्ट्रीय बहुभाषी कवि सम्मेलन में सुनाई गयी थी। रचनाकार और आवाज – नीतू अरोड़ा देस हरियाणा youtube चैनल को सबस्क्राईब जरुर करें   Des Haryana  

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दायरे

विनोद सिल्ला कविता कर लिए कायम दायरे सबने अपने-अपने हो गए आदि तंग दायरों के कितना सीमित कर लिया खुद को सबने नहीं देखा कभी दायरों को तोड़ कर अगर देख लेता तोड़ कर इनको तो हो जाता उन्मुक्त पक्षियों की तरह जिन्हें नहीं रोक पाते छोटे-बड़े दायरे नहीं कर पाती सीमित इनकी उड़ान को देशों-प्रदेशों की या अन्य प्रकार

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सुनो – कविता वर्मा

कविता सुनो!  मुठ्ठी भर रंग घोल दो  , जिंदगी में । नही देखे रंग और रौशनी के त्यौहार । एक उमर और जी लूं , हवाँए नई साँसों में घोल दो। सुनो, फीके सा ज़ायका है ढलते से दिनों का , कोई सूरज चमका दो कहीं। सुनो मुठ्ठी भर रंग घोल दो, बहती उमर में , ओढनी तो ओढ लूँ,

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अवसरवादी मुस्टंडा

महावीर शर्मा एक नन्हा सा अवसरवादी मुस्टंडा जो मेरे जन्म के वक़्त किसी काली सुरंग से भीतर घुस आया था जवान हो गया है एक जहरीले नाग की तरह । जब वह मचलता है तो फुंकारता है उसकी चिरी हुई जीभ मेरे नथुनों में लपलपाती है मेरा सांस लेना दूभर हो जाता है और एक कंपकंपी दौड़ जाती है मेरे

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धुनकर-बुनकर

डा. श्रेणिक बिम्बिसार तुक-तुक तांय-तांय शब्दों को रूई सा धुनें आओ कविता बुनें चौपाईयों सी लय थाप हो गज़ल के काफिए सी दोहों की सुगमता में भर जाए कबीर सी क्रांति रसों के तानों-बानों में उलझें रुपक कुछ ऐसे चुनें आओ कविता बुनें छंदों की धड़कन में चर्खे सी चाल हो स्वतःस्फूर्त आंदोलन से दमक उठे कविता का तार-तार निर्वस्त्र

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जंगली कौन

विनोद सिल्ला कितना भाग्यशाली था आदिमानव तब न कोई अगड़ा था न कोई पिछड़ा था हिन्दू-मुसलमान का न कोई झगड़ा था छूत-अछूत का न कोई मसला था अभावग्रस्त जीवन चाहे लाख मजबूर था पर धरने-प्रदर्शनों से कोसों दूर था कन्या भ्रूण-हत्या का पाप नहीं था किसी ईश्वर-अल्लाह का जाप नहीं था न भेदभावकारी वर्ण-व्यवस्था थी मानव जीवन की वो मूल

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