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किसान- गौहर रज़ा

गौहर रज़ा (जन्म 17 अगस्त 1956) पेशे से एक भारतीय वैज्ञानिक हैं, और एक प्रमुख उर्दू कवि, सामाजिक कार्यकर्ता और वृत्तचित्र फिल्म निर्माता, जो आम जनता के बीच विज्ञान की समझ को लोकप्रिय बनाने के लिए काम कर रहे हैं.
प्रस्तुत है किसान संघर्ष से प्रेरित गौहर रज़ा की एक नज़्म ‘किसान’

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मजदूर-किसान: कुछ कविताएं- जयपाल

जयपाल अपनी कविताओं में हमारे समय के यथार्थ के विभिन्न पक्षों को बहुत विश्वसनीय ढंग से प्रस्तुत करते हैं। सामाजिक-शक्तियों के बीच चल रहे संघर्षों का वर्णन करती ये कविताएं जनता के पक्ष को मजबूत करने के लिए समाज में मौजूद प्रचलित धारणाओं को तोड़ती हैं। जनता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता कविताओं में सीधे तौर पर मौजूद है। जनता के संघर्ष व आन्दोलन कविताओं का विषय नहीं है, लेकिन विचाराधारात्मक परिप्रेक्ष्य शोषित-वंचित वर्ग का है।- प्रो. सुभाष चन्द्र

मंगलेश डबराल की पांच कविताएं

एक बड़ा रचनाकार उत्तरोतर प्रासंगिक होता जाता है. मंगलेश डबराल अब इस दुनिया में नहीं हैं, उनके बाद उनकी कविताएँ विरासत के रूप में हमारे पास हैं. प्रस्तुत हैं एक फूल की तरह नाजुक और पवित्र कवि (आलोक धन्वा के शब्दों में) की पांच ऐसी कविताएँ जो उसकी प्रासंगिकता का सशक्त प्रमाण हैं-

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अंतिम बेला में- रविंद्रनाथ ठाकुर, अनुवाद- योगेश शर्मा

योगेश शर्मा कुरुक्षेत्र विश्विद्यालय में हिंदी स्नातकोत्तर के अंतिम वर्ष के छात्र और देस हरियाणा की प्रबन्धन टीम का हिस्सा हैं

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देवेश पथ सारिया की दो कविताएं

हंस, वागर्थ, कथादेश, कथाक्रम, पाखी, आजकल, कादंबिनी, परिकथा, समयांतर, अकार, रेतपथ, बया, बनास जन, जनपथ, समावर्तन, नया पथ, आधारशिला, प्रगतिशील वसुधा आदि पत्रिकाओं सहित राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, दि सन्डे पोस्ट समाचार पत्रों में प्रकाशन.
वेब प्रकाशन: सदानीरा, जानकीपुल, अनुनाद, बिजूका, समकालीन जनमत, पोषमपा, हिंदीनेस्ट, शब्दांकन, कारवां, अथाई, हिन्दीनामा, लिटरेचर पॉइंट
सम्प्रति: ताइवान में खगोल शास्त्र में पोस्ट डाक्टरल शोधार्थी। मूल रूप से राजस्थान के राजगढ़ (अलवर) से सम्बन्ध।

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5 कविताएं- डॉ. पूनम तुषामड़

हिन्दी साहित्य में दलित साहित्य की प्रतिनिधि डॉ. पूनम तुषामड़ का जन्म दिल्ली में एक निम्न आयवर्गीय परिवार में हुआ।दलित कविता की नई पीढ़ी के जिन रचनाकारों ने समकालीन साहित्य को प्रभावित किया है, उनमें डॉ. तुषामड़ का नाम उल्लेखनीय है। उनकी रचनाओं को हिन्दी जगह में व्यापक स्तर पर सराहा गया है। हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा चयनित काव्य संग्रह “माँ मुझे मत दो” से उन्हें विशेष ख्याति मिली। उनकी कविताओं में नए संदर्भों के साथ दलित चेतना का विकसित रूप अपनी विशिष्टता के साथ अभिव्यक्त हुआ है। “राइटर्स एंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन” द्वारा सम्मानित एवं “सम्यक प्रकाशन” द्वारा प्रकाशित कहानी संग्रह “मेले में लड़की’ने भी पाठकों को खासा प्रभावित किया। वर्ष 2004 में हिन्दी अकादमी, दिल्ली का नवोदित लेखक पुरस्कार उनके कविता संग्रह “माँ मुझे मत दो” के लिए तथा 2010 में हिन्दी कविता कोश सम्मान-2010 व ”हम साथ-साथ हैं पत्रिका” द्वारा प्राप्त युवा रचनाकार सम्मान आदि शामिल हैं।

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धर्म में लिपटी वतनपरस्ती क्या-क्या स्वांग रचाएगी – गौहर रज़ा

‘देस हरियाणा’ और ‘सत्यशोधक फाउंडेशन’ द्वारा 14-15 मार्च 2020 को कुरुक्षेत्र स्थित सैनी धर्मशाला में आयोजित ‘हरियाणा सृजन उत्सव-4’ में दोनों दिन सवाल उठाने और चेतना पैदा करने वाली कविताएं गूंजती रही। देश के जाने-माने वैज्ञानिक एवं शायर गौहर रज़ा के कविता पाठ के लिए विशेष सत्र आयोजित किया गया। सत्र का संचालन रेतपथ के संपादक डॉ. अमित मनोज ने किया। पत्रकार गुंजन कैहरबा ने इसे लिपिबद्ध करके यहाँ प्रस्तुत किया है – सं.

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हरभगवान चावला की दस कविताएं

हरभगवान चावला सिरसा में रहते हैं। हरियाणा सरकार के विभिन्न महाविद्यालयों में कई दशकों तक हिंदी साहित्य का अध्यापन किया। प्राचार्य पद से सेवानिवृत हुए। तीन कविता संग्रह प्रकाशित हुए और एक कहानी संग्रह। हरभगवान चावला की रचनाएं अपने समय के राजनीतिक-सामाजिक यथार्थ का जीवंत दस्तावेज हैं। सत्ता चाहे राजनीतिक हो या सामाजिक-सांस्कृतिक उसके चरित्र का उद्घाटन करते हुए पाठक का आलोचनात्मक विवेक जगाकर प्रतिरोध का नैतिक साहस पैदा करना इनकी रचनाओं की खूबी है। हाल ही में हरभगवान चावला को मैथिलीशरण गुप्त श्रेष्ठ कृति पुरस्कार से सम्मानित किए जाने की घोषणा हुई है। प्रस्तुत हैं उनकी कविताएं-