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तुलसी की लोकप्रियता का रहस्य- अमरनाथ

सारा अभियान अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध है और समता और न्याय पर आधारित समाज की स्थापना के लिए है.  उन्होंने एक आदर्श राज्य – रामराज की परिकल्पना की है जो हमारे युग के महानतम व्यक्ति गांधी का भी सपना बन गया. (लेख से)

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दलित विमर्श के अंतर्विरोध- अमरनाथ

दलित आन्दोलन का उद्देश्य क्या होना चाहिए ? –एक ऐसे समाज की स्थापना जिसमें सामाजिक –आर्थिक विषमता न हो, जो ऊंच-नीच की अवधारणा से रहित हो और जो सामाजिक समानता पर आधारित हो. किसी भी सिद्धांत को परखने की कसौटी उसका व्यवहार है. (लेख से)

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माटी के दर्द को वाणी देती पानीदार ग़ज़लें – भागिनाथ वाकले

उदयभानु हंस ने मिथकीय पात्रों को मौजूदा समय की विसंगतियों और नैतिक पतन से जोड़कर यथार्थ रचना की है। डॉ रामजी तिवारी मिथकों के विषय में कहते हैं कि “मिथक जनमानस में पहले से बैठे रहते हैं, उनका आधार लेने से रचना की संप्रेषणीयता ज्यादा हो जाती है।“ इस हेतु ग़ज़लकार ने मिथकों का प्रयोग अपनी रचनाओं में किया है। (लेख से )

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लोकगाथा का सामाजिक-सांस्कृतिक सन्दर्भ – कमलानंद झा

रचनाकारों को काव्य रचना के नए-नए विषय ढूंढें नहीं मिलते, वहीं इन लोकगाथाओं में विषय-विविधता और उसकी नवीनता चमत्कृत करती है।

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महाकवि चतुर्मुख स्वयंभू – राहुल सांकृत्यायन

मैं समझता हूं कि वह समय जल्दी आयेगा, जब हमारे साहित्यिकों के लिए स्वयंभू का पढ़ना अनिवार्य हो जायेगां। मैंने अपनी “हिन्दी काव्यधारा” में स्वयंभू के काफी उद्धरण दिये हैं। लेकिन हिन्दी वालों का उचित योग होगा-यदि वे स्वयंभू की “रामायण” और हरिवंश पुराण (कृष्णचरित) को पूरा देखना चाहें। (लेख से)

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प्रेमचंद : हिन्दी के जातीय स्वरूप के सच्चे पारखी – अमरनाथ

Post Views: 15 जन्मदिन पर विशेष  प्रेमचंद का भाषा- चिन्तन जितना तार्किक और पुष्ट है उतना किसी भी भारतीय लेखक का नहीं है. ‘साहित्य का उद्देश्य’ नाम की उनकी पुस्तक…

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नामवर सिंह : हिंदी आलोचना के ‘मेहतर’- प्रो. सुभाष चन्द्र

नामवर सिंह ने जब हिन्दी समीक्षा में पदार्पण किया तो वह समय न केवल हिन्दी रचना व आलोचना के लिए महत्त्वपूर्ण था, बल्कि दर्शन व साहित्य के क्षेत्र में पूरी दुनिया में गर्मागर्म बहस छिड़ी हुई थी। नामवर सिंह को उस परम्परा में भी संघर्ष करना पड़ा, जिसको वे आगे बढ़ाना चाहते थे और इसके विरोधियों से तो टक्कर लेने के लिए वे मैदान में उतरे ही थे। (लेख से )

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श्री भगवान सिंह : गाँधीवादी आलोचक – डॉ. अमरनाथ

“हिंदी के आलोचक” शृंखला में कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष डा. अमरनाथ ने 50 से अधिक हिंदी-आलोचकों के अवदान को रेखांकित करते हुए उनकी आलोचना दृष्टि के विशिष्ट बिंदुओं को उद्घाटित किया है। इन आलोचकों पर यह अद्भुत सामग्री यहां प्रस्तुत है। इस शृंखला को आप यहां पढ़ सकते हैं।

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धीरेन्द्र वर्मा : अध्यापन और अनुसंधान के पथ प्रदर्शक – डॉ. अमरनाथ

“हिंदी के आलोचक” शृंखला में कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष डा. अमरनाथ ने 50 से अधिक हिंदी-आलोचकों के अवदान को रेखांकित करते हुए उनकी आलोचना दृष्टि के विशिष्ट बिंदुओं को उद्घाटित किया है। इन आलोचकों पर यह अद्भुत सामग्री यहां प्रस्तुत है। इस शृंखला को आप यहां पढ़ सकते हैं।

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डॉ. नगेन्द्र : शुक्लोत्तर आलोचना के प्रमुख स्तंभ – डॉ. अमरनाथ

“हिंदी के आलोचक” शृंखला में कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष डा. अमरनाथ ने 50 से अधिक हिंदी-आलोचकों के अवदान को रेखांकित करते हुए उनकी आलोचना दृष्टि के विशिष्ट बिंदुओं को उद्घाटित किया है। इन आलोचकों पर यह अद्भुत सामग्री यहां प्रस्तुत है। इस शृंखला को आप यहां पढ़ सकते हैं।