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महात्मा जोतिबा फुले के भाषणों की आधुनिकता – डॉ. अमरनाथ

Post Views: 18 महात्मा जोतिबा फुले के भाषणों पर जब मैं यह प्रतिक्रिया लिख रहा हूँ तो दूसरी ओर नूपुर शर्मा नाम की एक भाजपा प्रवक्ता द्वारा पैगंबर मुहम्मद पर…

आम जन के संघर्षों के साथ खड़ी ‘उजाले हर तरफ होंगे’ की गज़लें – अरुण कुमार कैहरबा

Post Views: 5 आशिक, माशूक, हुस्न, इश्क, साकी और शराब जैसे विषयों तक महदूद रहने वाली गज़ल आज सामाजिक विसंगतियों और विद्रूपताओं को प्रकट करके वंचित और शोषित वर्ग के…

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भारतमाता – सुमित्रानंदन पंत

Post Views: 15 कविता भारत माताग्रामवासिनी।खेतों में फैला है श्यामलधूल भरा मैला सा आँचल,गंगा यमुना में आँसू जल,मिट्टी कि प्रतिमाउदासिनी। दैन्य जड़ित अपलक नत चितवन,अधरों में चिर नीरव रोदन,युग युग…

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जाति व्यवस्था – पेरियार

ऐसे सूत्रों ने यह भी कहा कि हमारे देश में अनेक महत्त्वपूर्ण जातियाँ ऐसे ही आपसी मेलजोल से सामने आईं। उच्च जाति के लोग पथभ्रष्ट हुए इस और अपने नैतिक मानकों से डिगे, तो इसके परिणामस्वरूप पंचम जाति यानी सबसे पिछड़ी जाति अस्तित्व में आई ।

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सूफीवाद की सार्थकता और प्रासंगिकता -प्रेम सिंह

Post Views: 16 (1) मानव सभ्यता के साथ किसी न किसी रूप में धर्म जुड़ा रहा है। आधुनिक काल से पूर्व युगों में सृष्टि की रचना एवं संचालन की परम-सत्ता…

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महिलाओं के अधिकार – पेरियार

पुरुष के लिए एक महिला उसकी रसोइया, उसके घर की नौकरानी, उसके परिवार या वंश को आगे बढ़ाने के लिए प्रजनन का साधन है और उसके सौन्दर्यबोध को सन्तुष्ट करने के लिए एक सुन्दर ढंग से सजी गुड़िया है। पता कीजिए, क्या इनके अलावा उनका उपयोग अन्य कार्यों के लिए भी हुआ है ?

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जाति और वर्ण इतिहास पर पर्दा क्यों ? – रजनी दिसोदिया

भारत की सामाजिक व्यवस्था को समझने के लिए उपयोगी लेख है। जाति का उद्भव कैसे हुआ और जाति के निर्माण का आधार क्या है? इस मुद्दे पर भी लेखिक ने विस्तारपूर्वक विचार किया है।

हिंदी में विश्व कविता – हरिमोहन शर्मा

विश्व के प्रसिद्ध कवियों की कविताएँ हिंदी में लाने का अनूठा काम ‘तनाव’ पत्रिका के माध्यम से वंशी माहेश्वरी पिछले पचास वर्षों से यह काम बखूबी कर रहे हैं। खुशी की बात है कि यह पत्रिका मात्र दस रुपये में अब भी छप रही है। संभावना प्रकाशन हापुड़ से इनका यह काम तीन खंडों में छप कर आगया है। इसमें 33 देशों के 103 कवियों की कविताएँ संकलित हैं। प्रस्तुत है यहां इसका संक्षिप्त परिचय- हरिमोहन शर्मा )

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एक दलित का दुख और इस के निहितार्थ – कैलाश दहिया

पिछले दिनों एक दलित लेखक ने अपनी फेसबुक वॉल पर एक संक्षिप्त पोस्ट डाली, जिसमें उन्होंने लिखा- “मुझे आज तक यह पता नहीं चल पाया कि मेरे हिंदू पड़ोसी वसुंधरा, गाजियाबाद जैसी पॉश कॉलोनी में भी मुझसे क्यों नफरत करते हैं?”

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पेरियार ई.वी.रामासामी : उसूलों पर अडिग महातार्किक – अमरनाथ

वर्ण व्यवस्था का अंत कर देना, जिसके कारण समाज ऊँच और नीच जातियों में बाँटा गया है। ब्राह्मण हमें अंधविश्वास में निष्ठा रखने के लिए तैयार करता है। वह खुद आरामदायक जीवन जी रहा है। तुम्हे अछूत कहकर निंदा करता है। मैं आपको सावधान करता हूँ कि उनका विश्वास मत करो।