Category: आलोचना

साबिर की कविताओं में बुल्लेशाह-फरीद की गूंज सुनाई देती है-अरुण कुमार कैहरबा

Post Views: 32 पश्चिमी पंजाब के प्रसिद्ध शायर व कवि साबिर अली साबिर भारत और पाकिस्तान के दोनों पंजाब में समान रूप से जाना-माना नाम है। उनकी रचनाएं बहुत ही

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देवताओं के विरुद्ध कविता – योगेश

Post Views: 184 कविता,क्या तुम नहीं जानती कि मैं कभी तुमसे अलग नहीं हो सकता? क्या मैं अपने अंतर में जन्म लेने वाली सभी खुशियों, सभी आंसुओं से अलग हो

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मध्यकालीन कविता में सांस्कृतिक समन्वय – प्रो. सुभाष चन्द्र

Post Views: 64 संस्कृति जड़ वस्तु नहीं होती और न यह स्थिर रहती है, बल्कि यह हमेशा परिवर्तनशील है। संस्कृतियों के मिलन से नए बदलाव होते हैं, जिससे किसी देश या समुदाय

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मनुष्यत्व की कवायद करती सपना भट्ट की कविताएँ – योगेश

Post Views: 216 सारी नदियाँ अगर हैं मीठी तो समंदर कहाँ से लाता है अपना नमक? -पाब्लो नेरुदा सपना भट्ट की कविता पहाड़ के भाषागत स्पंदन से लबरेज है। “भाषा

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ओ मेरी कविता कहाँ हैं तेरे श्रोता ? – राजेश जोशी

Post Views: 33 ओ मेरी कविता कहाँ हैं तेरे श्रोता? कमरे में कुल बारह लोग और आठ खाली कुर्सियाँ- चलो अब शुरू करते हैं यह सांस्कृतिक कार्यक्रम कुछ लोग और

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हिंदी कथा साहित्य के आईने में विकलांग विमर्श- डॉ. सुनील कुमार

Post Views: 251 साहित्य व समाजशास्स्त्री ,दलित और जनजाति विमर्श के बाद 21वीं सदी के प्रथम दशक की दस्तक के रूप में विकलांग विमर्श स्थापित हो रहा है । वैश्विक

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थर्ड जेंडर विमर्श : एक पड़ताल- डॉ. सुनील दत्त

वर्तमान दौर में दलित विमर्श, वृद्ध विमर्श, किसान विमर्श, स्त्री विमर्श, और थर्ड जेंडर विमर्श की खूब चर्चा रही है। प्रत्येक विमर्श मानव अधिकारों की मांग करता है और समाज से अपना मानव होने के हक की मांग करता है। इन्हीं विमर्शों में थर्ड जेंडर विमर्श भी मानव से मानव अधिकारों की मांग करता है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने भी इनकी मांगों को उचित मानते हुए थर्ड जेंडर की मान्यता दी है। थर्ड जेंडर ने सौंपे  गए दायित्वों को भी बखूबी से निभाया है। यह इस बात का प्रमाण है कि थर्ड जेंडर किसी भी दृष्टि से अन्य वर्ग से प्रतिभा में रत्ती भर भी कम नहीं है। शबनम मौसी, कमला जान, मधु किन्नर, लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी, आशा देवी आदि थर्ड जेंडर इसके उदाहरण हैं। अब आवश्यकता है समाज के सकारात्मक दृष्टिकोण की जिससे थर्ड जेंडर को मानव जीवन के अधिकारों से वंचित होने से बचाया जा सके। प्रस्तुत है डॉ. सुनील दत्त का लेख- … Continue readingथर्ड जेंडर विमर्श : एक पड़ताल- डॉ. सुनील दत्त

प्रेमचंद ने पूछा था- “बिगाड़ के डर से क्या ईमान की बात न कहोगे ?”- डॉ. कृष्ण कुमार

डॉ. कृष्ण कुमार हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले के पलवल गाँव के राजकीय महाविद्यालय में हिंदी-अध्यापन में कर्यरत हैं। विशेष रूचि आलोचना में है। अपने इर्द गिर्द की साहित्यिक गतिविधियों में निरन्तर सक्रीय रहते हैं। … Continue readingप्रेमचंद ने पूछा था- “बिगाड़ के डर से क्या ईमान की बात न कहोगे ?”- डॉ. कृष्ण कुमार

समकालीन हिंदी उपन्यासों में अभिव्यक्त किन्नर संघर्ष-रामेश्वर महादेव वाढेकर

रामेश्वर महादेव वाढेकर का जन्म 20 मई, 1991 को महाराष्ट्र के जिला बीड के ग्राम सादोळा में हुआ। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में इनके शोधपरक आलेख निरंतर प्रकाशित होते रहते हैं। हाल फिलहाल हिंदी विषय में पीएच.डी. कर रहे हैं और साथ ही साथ सहायक प्राध्यापक के पद पर कार्यरत हैं। निचे दिए गए फोन नम्बर और ईमेल पते के जारी उनसे सम्पर्क किया जा सकता है-
फोन-9022561824
ईमेल:-rvadhekar@gmail.com
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सही मायनों में रचनाओं का मूल्यांकन होना अभी भी बाकी – अशोक भाटिया

अशोक भाटिया ने लम्बे समय तक हरियाणा के करनाल जिले के कॉलेज में हिंदी का अध्ययन- अध्यापन का काम किया। वर्तमान में सेवानिवृत हैं और हिंदी कविता, कहानी और आलोचना के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होनें इधर की हिंदी लघुकथा को विकसित-प्रचारित और प्रसारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस सम्बन्ध में इनकी कई महत्वपूर्ण पुस्तकें हाल-फिलहाल में प्रकाशित हुई हैं। … Continue readingसही मायनों में रचनाओं का मूल्यांकन होना अभी भी बाकी – अशोक भाटिया