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ओबरा -विपिन चौधरी

Post Views: 232 हरियाणवी कविता जद ताती-ताती लू चालैं नासां तैं चाली नकसीर ओबरे म्हं जा शरण लेंदे सिरहानै धरा कोरा घड़ा ल्हासी-राबड़ी पी कीं काळजे म्हं पड़दी ठंड एक…

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डाब के खेत – विपिन चौधरी

Post Views: 237 हरियाणवी कविता डाब कै म्हारे खेतां म्हं मूंग, मोठ लहरावे सै काचर, सिरटे और मतीरे धापली कै मन भावै सै रै देखो टिब्बे तळै क्यूकर झूमी बाजरी…

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मेरा सादा गाम – विपिन चौधरी

Post Views: 155  हरियाणवी कविता म्हारी बुग्गी गाड्डी के पहिये लोहे के सैं जमां चपटे बिना हवा के जूए कै सेतीं जुड़ रहे सैं मण हामी इसे म्हं बैठ उरै…

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टूम ठेकरी – विपिन चौधरी

Post Views: 116 हरियाणवी कविता जी करै सै आज दादी की तिजोरी मैं तै काढ़ ल्याऊं सिर की सार,धूमर अर डांडे नाक की नाथ, पोलरा कान की बुजली, कोकरू अर…

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माई डीयर डैडी – विपिन चौधरी

Post Views: 566 कहानी बचपन पूरे जीवन का माई-बाप होता है। बचपन के बाद अपना कद निकालता हुआ जीवन इसी बचपन की जुबान से ही बोलता-बतियाता है। इसके बावजूद इस…