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कटते हुए दरख्त की चीखें -सुरेश बरनवाल

Post Views: 237 कविता तुम्हें पूरा हक है खुद के खिलाफ युद्ध छेड़ देने का दरख्तों की हत्या करने का। कटे हुए इन दरख्त की चीखें अमानत होंगी तुम्हारे भविष्य…

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आग -सुरेश बरनवाल

Post Views: 222 कविता यह घटना थी या वारदात या युद्ध। बहुत कुछ जला था तब हरियाणा में दुकानें, इन्सानियत मासूमियत स्कूल, किताबें। जिन्होंने दुकानें जलाईं वह नहीं हो सकते…

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युद्ध और प्रेम -सुरेश बरनवाल

Post Views: 141 कविता युद्ध के दौर में विद्रोह, क्रोध, हिंसा बारूद, बन्दूक और शरीर के चिथड़े मिल जाते थे हर राह टूटे भग्नावशेष कब्रगाह बन गए थे इन्सानी सभ्यता…

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सवालों का जंगल -सुरेश बरनवाल

Post Views: 132 कविता तुमने फिर वही किया सवाल जो उठा था उसे वहीं छोड़ दिया/अनुत्तरित हालांकि वह पथरीली सड़क है पर सवाल के बीज को उगना है प्रश्न-प्रतिप्रश्न बनना…

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स्त्री-स्त्री-स्त्री -सुरेश बरनवाल

Post Views: 207 कविता स्त्री-स्त्री-स्त्री स्त्री अगर पत्नी है तो स्त्री है या फिर बेटी, मां, बहन जो भी। जब तक वह समाज की परिभाषाओं से बंधी रहती है स्त्री…