जरा सोचिए 

पिछले दशक में हरियाणा प्रेम-विवाह करने वाले नवयुवक-नवयुवतियों की उनके परिजनों द्वारा हत्या के लिए खासा बदनाम हुआ। इस तरह का माहोल बनाने में काफी बड़ी भूमिका समाज के ठेकेदारों-खाप पंचायतियों की भी रही।

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हरियाणा का पचासवां साल, पूछै कई सवाल- डा. सुभाष चंद्र

Post Views: 521 हरियाणा राज्य का पचासवां साल हैं। हरियाणा की बहुत सी उपलब्धियां हैं और विभिन्न क्षेत्रों में कई कीर्तिमान भी स्थापित किए हैं। यह साल हरियाणा के लिए…

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सांचि कहौं तो मारन धावै – डा. सुभाष चंद्र

Post Views: 748 आलेख कबीर दास मध्यकालीन भारत के प्रसिद्घ संत हैं, जिन्होंने अपनी रचनाओं में हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रयास किया तथा ब्राह्मणवादी धार्मिक आडम्बरों की आलोचना की। इनकी प्रसिद्घ…

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देख कबिरा रोया…डा. सुभाष चंद्र

Post Views: 259 सुखिया सब संसार है, खावै और सोवैदुखिया दास कबीर है जागै और रोवै कबीर ने झूठ के घटाटोप को भेदकर सच्चाई को पा लिया था, इसलिए उनको…

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आरक्षण:  पृष्ठभूमि और विवाद

बहुत से लोग इन आंदोलनों से हुए नुक्सान को देखकर यह भी कहने लगे हैं कि आरक्षण ही समस्या की जड़ है इसे समाप्त कर देना चाहिए। लेकिन यह विचार सामाजिक न्याय के बिल्कुल खिलाफ है। आरक्षण को तब तक समाप्त न किया जाए जब तक कि जब तक ये वर्ग खुली प्रतिस्पर्धा करने के लिए सक्षम न हो जाएं और अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और पिछड़े वर्गों का केंद्रीय और राज्य सरकार की सेवाओं के सभी कैडर में उनका प्रतिनिधित्व उनकी जनसंख्या के अनुपात के बराबर न पहुंच जाए।

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लोक-रंग की आंच में पकाया हबीब ने अपना रंग-लोक -डा. सुभाष चंद्र

Post Views: 994 लोक-रंग की आंच में पकाया हबीब ने अपना रंग-लोक सुभाष चंद्र रंगमंच की दुनिया में हबीब तनवीर एक ऐसा नाम है जो पिछले साठ साल से कलाकारों…

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उच्च शिक्षा : अपेक्षाएं और चुनौतियां – डा. सुभाष चंद्र

शिक्षा सांस्कृतिक प्रक्रिया है, समाजीकरण का माध्यम, शक्ति का स्रोत और शोषण से मुक्ति का मार्ग है। शिक्षा का व्यक्ति और समाज के विकास से गहरा रिश्ता है, विशेषकर आज की ज्ञान केन्द्रित व नियन्त्रित दौर में। समाज के विकास और बदलाव के साथ साथ शिक्षा व ज्ञान का चरित्र भी बदला है। शिक्षा-विमर्श के मुद्दे भी बदले हैं।

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धर्मनिरपेक्षता की चुनौतियां – सुभाष चन्द्र

Post Views: 6,461 धर्मनिरपेक्षता धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है कि राज्य के मामलों में, राजनीति के मामलों में और अन्य गैर-धार्मिक मामलों से धर्म को दूर रखा जाए और सरकारें-प्रशासन धर्म…

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वास्तविक रचनाकार दूर खड़ा तमाशा नहीं देख रहा

कभी दरों से कभी खिड़कियों से बोलेंगे
सड़क पे रोकोगे तो हम घरों से बोलेंगे
कटी  ज़बाँ  तो   इशारे  करेंगे  आँखों  से
जो सर कटे तो हम अपनी धड़ों से बोलेंगे
भारतीय समाज की विडंबना ही है कि अत्यधिक तकनीकी युग में भी शासन-सत्ताओं के लिए जन-आक्रोश की दिशा भ्रमित करने के लिए साम्प्रदायिकता तुरप का पत्ता साबित हो रहा है। शासन-सत्ताएं साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करने का हर हथकण्डा अपना रही हैं। गुड़गांव में नमाज अता करते लोगों पर हमला करना, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में 80 साल से दीवार पर टंगे मोहम्मद अली जिन्ना के चित्र पर बवाल काटना साम्प्रदायिक विभाजन की परियोजना के अंग ही तो हैं। सामूहिक चेतना का साम्प्रदायिकरण भारतीय समाज के बहुलतावादी ढांचे, सामाजिक शांति, साम्प्रदायिक भाईचारे और आपसी विश्वास को बरबाद कर देगा। सांस्कृतिक-धार्मिक बहुलता व विविधता भारतीय समाज का गहना है।