Author: जयपाल

वे जाति नहीं पूछते – जयपाल

Post Views: 44 वह औरत क्या कहे वह क्या कहे उस गांव को जो सबका है पर उसका नहीं उन गांव के कुत्तों को जो उसे ही देखकर भौंकते हैं

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आम्बेडकर और रविदास – जयपाल

Post Views: 282 अधिकारी महोदयतुम चाहे जिस भी जाति से होंहम अपनी बेटी की शादी तुम्हारे बेटे से कर सकते हैंपर हमारी भी एक प्रार्थना हैसगाई से पूर्व तुम्हें अपने

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खाली हाथ – जयपाल

Post Views: 118 वे दिन भर शहर की सूरत संवारते हैंऔर अपनी सूरत बिगाड़ते हैंदिन ढलने परसिर नीचा करमुंह लटकाएचल पड़ते हैं वापिसअपने घरों की तरफहताश-निराशजैसे शमशान से लौटते हैं

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जाले – जयपाल

Post Views: 114 जाले हर युग के होते हैंहर युग बुन लेता है अपने जालेहर युग चुन लेता है अपने जालेधूल मिट्टी से सने प्राचीन जालेमोती से चमकते नवीन जालेसमय

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पाखण्डी – जयपाल

Post Views: 105 वे आर्थिक सुधार करेंगेमरने को मजबूर कर देंगेवे रोजगार की बात करेंगेरोटी छीन लेंगेवे शिक्षा की बात करेंगेव्यापार के केन्द्र खोल देंगेवे शान्ति की अपील करेंगेजंग का

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एक चुप्पी -जयपाल

Post Views: 179 सवेरे-सवेरेएक हाथ में टोकरीदूसरे में झाडूवह निकल पड़ती है घर सेजाती है एक घर से दूसरे घरएक मोहल्ले से दूसरे मोहल्लेकुछ दौड़ती हैकुछ भागती हैकुछ हंसती हैकुछ

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बहिष्कृत औरत – जयपाल

Post Views: 119 शहर से बाहर सेएक औरत शहर के अंदर आती हैघरों पर से मिट्टी झाड़ती हैफर्श चमकाती हैगलियों को बुहारती हैपी जाती है नालियों की सारी दुर्गंधगली-मुहल्लों को

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उनका सवाल – जयपाल

Post Views: 185 वे पूछते हैं –आज भी उनके सिर पर गंदगी का टोकरा क्यों रखा हैउनकी बस्ती शहर या गांवों से बाहर ही क्यों होती हैउनके मंदिरों-गुरुद्वारों में दूसरे

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