लाहौर के सिखों के लिए संदेश-गांधी का भारत

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               अकाली लोगों का यह दल विशुद्धिवादियों का एक भारी दल है। गुरुद्वारों में जो बुराइयां घर कर गई हैं, उन्हें दूर करने के लिए बहुत ही बेताब है। सभी गुरुद्वारों में एक ढंग की उपासना हो, उस पर उनका बड़ा जोर है। यह आंदोलन कई साल से चल रहा है। असहयोग आंदोलन के समय से ही, सहयोग करने वाले और असहयोग करने वाले, दोनों तरह के सिख ही, कम से कम गुरुद्वारों के इस आंदोलन में तो एक होकर काम करते आए हैं। और आखिर में जाकर अगर यह पता चला कि अकाली दल ने एक ऐसे महंत को गद्दी से उतारने के लिए जोर-जबरदस्ती का सहारा ले ननकाना साहब पर चढ़ाई की थी, जिसने अपनी महंती से बेजा फायदा उठाया था, तब भी इतिहास इस बलिदान को शहादत का ही नाम देगा और उसे तारीफ ही मिलेगी।…

               पर इस शहादत की सही कीमत आंकने का वक्त अभी नहीं आया है। अभी तो इस पर विचार करना ज्यादा जरूरी है कि अभी फौरन क्या कदम उठाए जाएं। मैं तो इस दुखद घटना पर भारतीय राष्ट्रीयता के दृष्टिकोण से ही विचार कर सकता हूं। इस काम में जो बहादुरी दिखलाई गई, उसके लिए तारीफ सिर्फ सिखों को ही नहीं, बल्कि समूचे राष्ट्र को मिलनी चाहिए। और इसलिए, अपने सिख दोस्तों को मैं तो यही सलाह दूंगा कि अपने अगले कदमों के बारे में फैसला करते वक्त वे राष्ट्र की जरूरत को ही अपने सामने रखें। हत्यारों के खिलाफ न्याय की मांग करने का सबसे अधिक निर्मल तरीका तो यह है कि यह मांग की ही न जाए। जिन्होंने यह कृत्य किया वे हमारे देशवासी ही हैं, चाहे वे सिख हों, अथवा पठान या हिंदू। उन्हें सजा दिला देने से मरे हुए जी नहीं जाएंगे। जिन लोगों के दिल घायल हुए हैं। उनसे में तो यही कहूंगा कि वे उन्हें माफ कर दें, किसी कमजोरी की वजह से नहीं-क्योंकि वह हर तरह से उन्हें सजा दिला सकने की स्थिति में हैं-बल्कि इसलिए कि उनकी ताकत बेहिसाब है, जिसमें ताकत है वही माफ कर सकता है। अपने प्यारों की शहादत में आप चार चांद लगा देंगे। अगर आप बदला लेने से इंकार कर दें।

साभार-गांधी का भारत : भिन्नता में एकता, अनु.-सुमंगल प्रकाश, पृ.-5.

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