हिमाचल प्रदेश – वन अधिकार कानून का महत्व

अर्शदीप

सुप्रीम कोर्ट में 13 जनवरी को वाइल्ड लाइफ फ्रस्ट व रिटायर वन अधिकारियों द्वारा दायर की गई याचिका पर सुनाई ने देश के 20 लाख से ज्यादा आदिवासियों पर विस्थापन की तलवार लटका दी है। इस से हिमाचल प्रदेश भी अछूता नहीं रहने वाला।

हालांकि हिमाचल प्रदेश सरकार शुरू से ही इस कानून के खिलाफ रही है। इस ने इस कानून का लागू करने से लगातार आनाकानी की है। इस कारण 2010 में केंद्र सरकार ने हिमाचल प्रदेश में आदिवासी मंत्रालय के आदेश पर एक आयोग भी भेजा था जिसने हिमाचल सरकार को लताड़ लगाई थी कि इस कानून के तहत जनता से दावे आमंत्रित किए जाएं। इस के बाद कुल मिला कर प्रदेश में 2131 ST दाव व और 92 OTFD  प्राप्त हुए। लेकिन सरकार ने इन को जमीनें नहीं दी। अब प्रदेश के दावा करने वाले लोगों पर ही नहीं वनों व पहाड़ों पर निवासरत अन्य लोगों पर भी विस्थापन की तलवार लटक गई है।

जनता लंबे समय से हिमाचल में वन अधिकार कानून लागू करने की मांग करती रही है


पहाड़ी प्रदेश होने के कारण यहां कृषि योग्य समतल भूमि की उपलब्धता कम है। विकास की जरूरतों, शहरीकरण, खनन, उद्योगों, पन बिजली परियोजनाओं व बांधों ने भी कृषि भूमि को कब्जा लिया है। परिणाम स्वरूप आज वास्तव में 9 प्रतिशत के लगभग कृषि भूमि किसानों के पास बची रह गई है। रोजगारों व आजीविका के दूसरे विकल्पों की कमी के कारण कृषि व वन भूमि पर और दबाव बढ़ता जा रहे हैं। यह भी मान्य तथ्य है कि पहाड़ में किसानी वन भूमि के उपयोग पर निर्भर होती है। वनों के बिना यहाँ खेती करना और परिवार की आजीविका चलना संभव नहीं हो सकता है। स्थानीय कृषक समुदायों के साथ-साथ घुमन्तू पशु पालक (गद्दी, गुजर समुदाय) भी सदियों से अपनी आजीविका के लिए वन भूमि का उपयोग करते आए हैं। प्रदेश में किसान परिवार की आजीविका, खेती व बागवानी के साथ-साथ पशुपालन, जंगल से मिलने वाले खाद्य पदार्थ, पशु चारा व पशु चराई, जलावन की लकड़ी, जड़ी-बूटियाँ, घर बनाने के लिए ईमारती लकड़ी, पत्थर, रेत, घास, मिट्टी व बजरी तथा जल संसाधनों इत्यादि पर चलती है। स्थानीय निवासियों के वनों पर सामाजिक, धार्मिक व सांस्कृतिक दखल व उपयोग भी हैं।

पिछले दिनों हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में हिम नीति अभियान, जागोरी जैसे 25 से अधिक सामाजिक संगठनों ने मिलकर 2 दिनों तक इस कानून पर चर्चा की थी और राज्य में लागू करने की मांग की थी। लगता है सब धरा का धरा रह जाएगा। हिमाचल विधानसभा के शीतकालिन सत्र  में भी यह मामला गूंजा था। प्रदेश के किन्नोर, लाहुल सप्ति, कांगड़ा, मंडी, चंबा आदि जिलों में लगातार इस पर प्रदर्शन होते रहे हैं।

1980 से पहले सरकार ने बड़े पैमाने पर प्रदेश में वनों का व्यावसायिक दोहन कर के प्राकृतिक व मिश्रित वनों का विनाश किया। आज भी वन निगम को कुछ हद तक वन विनाश का कारक माना जा सकता है। दूसरे, विकास की जरूरतों, शहरीकरण, खनन, उद्योगों, पन बिजली परियोजनाओं व बांधों ने भी कृषि व वन भूमि कब्जा ने के साथ-साथ वनों का भरी विनाश किया। जिसका नुकसान स्थानीय किसानों की आजीविका तथा प्रदेश के पर्यावरण को बड़े पैमाने पर हुआ है।

वन भूमि जनता को देने की बजाए हिमाचल सरकार सिमेंट उद्योग, पन बिजली परियोजनाओं और बांधों के लिए सस्ते भाव जमीन दे रही है। प्रदेश में कई सिमेंट उद्योग और बाँध प्रस्तावित है जिनसे हिमाचल के पर्यावरण को ही नहीं बल्कि पूरे देश को खतरा है।

हिमाचल का कुल क्षेत्रफल 55673 वर्ग किलोमीटर है जिस का 67 प्रतिशत भू-भाग वन भूमि है। जबकि प्रदेश की 13,90,704 हेक्टर वन भूमि पर परंपरागत रूप से स्थानीय लोगों का दखल/बर्तनदारी रही है, जिसका वन व राजस्व दस्तावेजों व बंदोबस्तों में भी बर्तनदारी अधिकार के रूप में उल्लेख किया गया है। ऐसे में प्रदेश इस एक तिहाई भू-भाग पर वन अधिकार कानून लागू होता है, चाहे वन विभाग द्वारा इन्हें नेश्नल पार्क, सेंचुरी, संरक्षित वन आदि घोषित कर रखा हो। इन बर्तनदारी वनों पर क्षेत्र के आदिवासी व अन्य परंपरागत वन निवासियों के वन अधिकार को मान्यता देना कानूनी बाध्यता है। खास कर प्रदेश के सभी किसान परिवार, चाहे वे आदिवासी हों या गैर आदिवासी समुदायों से संबन्धित हों, वन अधिकार कानून के तहत वन निवासी की श्रेणी में आते हैं।

आदिवासी मंत्रालय के अनुसार हिमाचल प्रदेश में 2131 ST दावों और 92 OTFD  दावे लंबित हैं, जिसमें से 68 दावे सामुदायिक वन अधिकार के दावे पेश हुए, जिन में से 53 निजी व 7 सामुदायिक दावे मान्य किए गए। निजी दावों को कितनी भूमि दी गई, को नहीं दर्शाया गया है, जबकि सामुदायिक वन अधिकार के सात दावों को 4670 एकड़ वन भूमि का अधिकार दिया गया। जबकि पूरे देश में जुलाई 2017 तक 17,37,467 निजी दावेदारों को 41,07,745 एकड़ तथा 63071 सामुदायिक दावेदारों को 97,12,783 एकड़ वन भूमि के अधिकार पत्र दे दिए जा चुके हैं।

हिमाचल प्रदेश के 100 से ज्यादा गांव ने सामुदायिक वन अधिकार के लिए वन अधिकार कानून 2006 के लिए आवेदन दिए हुए हैं। लेकिन सरकार के सूर में सूर मिलाते हुए अप्रैल 2015 में हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने आदेश जारी कर सरकार से कहा था कि राज्य के वनों से किसी भी तरह के कब्जों को 6 महीने में हटा दे। ध्यान देने योग्य बात यह है कि प्रदेश में 10 बीघे से कम (एक एकड़ से कम) कब्जे के केश 9612 हैं, सबसे ज्यादा मार गांव के आम किसानों पर ही पड़नी है जबकि परियोजनाओं के लिए ली गयी हजारों एकड़ जमीन पर से किसी तरह के कब्जे नहीं हटाए जाने।

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जबकि प्रदेश के वन विभाग के अनुसार बहुत सारी विकास परियोजनाओं, पन बिजली परियोजना, खनन, रोड निर्माण, नगरपालिका विकास आदि के लिए अब तक 25000 एकड़ वन भूमि दी जा चुकी है। इन में से सबसे ज्यादा जमीन (62 प्रतिशत) बिजली परियोजनाओं के ली दी गयी है।

फारेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया के अनुसार हिमाचल प्रदेश का 55 हजार वर्ग किलोमीटर (38 प्रतिशत) इलाका वन भूमि के तहत आता है। जबकि पहले यह आंकड़ा 67 प्रतिशत होता था।

अगर प्रदेश की दलित, आदिवासी, भूमिहीन, गरीब किसानों को अगर वन अधिकार कानून के तहत वन अधिकार मिल जाएं तो जनता का जीवन स्तर बहुत ऊँचा उठ सकता है। वह अपने विकास कार्य अपने हाथ में ले सकती है। प्रदेश में गोंद, ब्रोजा, बांस, चाय, सेब, अंगूर के बगान आदि से किसान भारी आमदनी हासिल कर सकते हैं। पहाड़ की जवानी को प्रदेशों में धक्के खाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

 

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