पंजाब के किसान का भविष्य – सर छोटू राम

चौ. छोटूराम

अनुवाद-हरि सिंह

संसार परिवर्तनशील है। परिवर्तन प्रकृति का नियम है और इस समय तो दुनिया में परिवर्तन का तूफान बड़ी तेजी से आया हुआ है। भारत भी इस तूफान की लहर से बचा नहीं है। जिस प्रकार भारत के अन्य प्रांत इस परिवर्तन की लहर से प्रभावित हैं, वैसे ही पंजाब भी प्रभावित हुआ है। प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने लाभ की चिंता में व्यस्त है, पंजाब की दूसरी कौमें तो बड़ी तेजी से दौड़ती दिखाई देती है। पता नहीं किसान की मंदबुद्धि में अभी अपनी लड़ाई का विचार पैदा हुआ है या नहीं। पता नहीं इसका सीना उन्नति की बिजली से गर्म हुआ है या अभी तक बर्फ का ठेला ही बना पड़ा है। किसी को पता नहीं। परन्तु अब तन्त है। यह नाजुक समय है। जो इस समय लंबी तान कर सोता रहेगा, उसके घर में चोर पाड़ दे जाएंगे। जो इस समय चेतना, ज्ञान, बुद्धि, इस्तकलाल अडिगता और हौंसले से काम लेगा, वह कुछ ले रहेगा। क्या कुछ ले रहेगा? यह उसकी चेतना, दृढ़ता और उत्साह पर निर्भर है।

अब तक किसान खाट में पड़ा है। यार लोगों ने इसके घर को घड़ी-घड़ी करके लूटा है। अब इस समय किसान पूर्णतः सोया हुआ तो नहीं है। परन्तु बिस्तर पर करवटें जरूर बदल रहा है। नहीं के आलस्य ने अभी तक इसके शरीर को छोड़ा नहीं है, अंगड़ाई ले रहा है। मैं चेतावनी देता हूं कि तूने पलंग की सवारी बहुत कर ली। अब पांव पलंग के नीचे रख। कार्य-क्षेत्र में कूद पड़। पर अभी तक किसान को यह पता नहीं कि यह काम का निमंत्रण देने वाला कौन है। यह उसका सच्चा शुभ-चिन्तक है। कोई पागल है? जोर-जोर से आवाज दे रहा हूं, क्योंकि मुझे संदेह है कि कहीं मेरे आहवान की आवाज मेरे भाई के कानोकं तक न पहुंची हो। दूसरे लोग जो अपने स्वार्थ के लिए अफीम और पोस्त की पुड़ियों और नुस्खों से मेरे भाई का ध्यान खींचते रहे हैं, कहते हैं कि यह जोर-जोर से चिल्लाने वाला कौन पागल है? अभी तो सूरज भी नहीं निकला है। सोने का समय है। जब जगाने का समय होगा, तब हम खुदी जा देंगे। मगर किसान भई सुन। बहुत देर तक तू मेरी आवाज की मरूमृमि की गूंज समझता रहा है। अब मेरी आवाज पर ध्यान दे। मैं तेरा सच्चा हितैषी हूं। पागल नहीं हूं। केवल तेरे प्यार में चिंतित हूं। मेरी आवाज की तेजी और ऊंचाई का रहस्य भी यही है कि तुझसे प्यार है और इस प्यार के कारण मैं यह जोखिम उठाने के लिए तैयार नहीं कि मेरी आवाज तुझ तक न पहुंचे। चल उठ शीघ्र उठ। मैं बहुत प्रतीक्षा कर चुका। बहुत सब कर चुका। अब इससे अधिक प्रतीक्षा और संतोष करने की गुंजाइश नहीं रही। यदि अब तूने उठने में गलती की तो याद रख तेरी टांग पकड़ कर पलंग से नीचे गिरा दूंगा, अब तक तो में ऐसा करने से रुका रहा, इसका कारण केवल यह है कि कहीं तू अपनी बेवकूफी से मेरे इस काम को अपने मित्रों के वेष में शत्रुओं द्वारा मुझ पर पागलपन के आरोप को प्रमाण समझ बैठे। ऐ किसान, ऐ कुम्भकरण् की नींद सोने वाले! तेरे चमन में आग लगी हुई है तेरे खलिहान पर बिजली गिर गई है, पन्तु अभी तक तेरी नींद का नशा नहीं उतरा है। देख यह सोने का समय नहीं है। उठने का समय है चलने-फिरने का समय है। काम करने का अवसर है घर को संभाल। अपनी बागवाड़ी की खबर ले। अपने खलिहान की सुध ले तेरी जहालत चोर डाकू की तरह तेरा विनाश कर रही है। तेरी लापरवाही तेरे चमन में आग का काम कर रही है। तेरी असावधानी तेरे खलिहान के लिए बिजली का काम कर रही है और कमाल की बात यह है कि तुझे इसकी खबर तक नहीं। इस पर गजब यह कि तू अपने चैकीदार की आवाज पर भी काम नहीं धरता।

ऐ किसान भाई! क्या तुझे यह पता है कि मैं यह सब सिर दर्दी क्यों उठा रहा हूं। तेरी खातिर सरकार से लड़ता हूं और कहता हूं कि मेरे भाई के सिर पर करों का अधिक भार है। इसको जरा हल्का करने का कोई प्रबंध कीजिए। मैं तेरी खातिर साहूकार से लड़ता हूं और कहता हूं कि श्रीमान जो अपने सूद दर सूद का फंदा लगाकर मेरे भाई का गला घोंट रखा है। अब इस फंदे को ढीला करिये। तेरी खातिर शहरियों से जंग कर रहा हूं और तेरी खातिर गैर जमींदारों से जूझ रहा हूं। तेरी खातिर भ्रष्ट अफसरों से ले दे पड़ी रहती है। देख, कान खोल कर सुन ले मुझे यह पक्का विश्वास है कि पंजाब के जमींदार के हाथ में भारत की आवाज की कुंजी है। भारत की आजादी हिन्दू मुस्लिम एकता पर निर्भर है और पंजाब का किसान ऐसी हस्ती का मालिक है जो हिन्दू मुस्लिम सिख एकता करा सकता है। इसलिए पंजाब के किसान को सौभाग्यशाली और प्रतिष्ठित देखना चाहता हूं। इसी तड़प् के कारण मैं पंजाब के किसान को जागृत कर अपने पांवों पर खडा हुआ संघर्ष में रत और पूर्णतः सुसंगठित देखने का इच्छुक हूं।

ऐ किसान! ईश्वर ने तेरे भाग्य में पंजाब का ताज लिखा है। पर इसकी एक शर्त भी लगा दी है। यदि तू इस शर्त को पूरा करेगा तो पंजाब का ताज तेरे सिर की शोभा बढ़ाएगा, पंजाब का तख्त तेरे पांव चूमेगा। वस्तुतः तेरा इकबाल जबरदस्त है और तेरा भविष्य उज्जवल है। मगर इसी शर्त के लिए देवदत्त तेरे लिए चंवर और छत्र लिए हुए खड़े हैं। केवल आपके आदेश की प्रतीक्षा है। ज्यों ही हुक्म होगा, वह छत्र का साया तेरे सिर पर कर देंगे और तेरे सिर पर चंवर झेलने लगेंगे। पर वह आदेश कब होगा, यह स्वयं तेरी अपनी हिम्मत, तेरी अपनी बुद्धिमानी, चतुराई और तेरी अपनी दूरदर्शिता पर निर्भर करता है।

यह शर्त क्या है? जिससे तुझे पंजाब का राज मिलेगा? सुन, यह शर्त दोहरी है। इस शर्त का एक परत यह है कि तू अपना संगठन बना लने। दूसरा परत यह है कि तू खालिस पवित्र दिल से यह पक्का इरादा कर ले कि सत्ता प्राप्त कर लेने के बाद तू सब के साथ न्याय करेगा। किसी का अधिकार न दबाएगा। जिन वर्गों को आसमान के चक्रों ने, समाज के अत्याचारों ने, इतिहास की दुर्घटनाओं ने, बेबस और लाचार, बोगस और निस्सहाय तथा दीन हीन बना दिया है, उनको छाती से लगाएगा। जिन्होंने तेरे उपर जुल्म अत्याचार किए हैं, उनको भी किसी दुव्र्यवहार की शिकायत का मौका न देगा, यह दोहरी शर्त पूरी कर और अपने इकबाल का तमाशा देख। मुझे विश्वास है कि तू इस दोहरी शर्त को पूरा करेगा अैर परवरदिगार पवित्र भगवान के अनन्त आशीष से भाग्यशालनी बनेगा।

अब प्रश्न यह उठता है कि वह शानदार भविश्य कब शानदार वर्तमान में बदलेगा। यह कहना कठिन है। वह भविष्य जबकि तेरा दबदबा तेरे मित्रों की आंखों सुख और कलेजे को ठंडक पहुंचाएगा तेरी हिम्मत से निकट लाया जा सकता है। वह भविष्य जबकि तेरा तेज तेरे शत्रुओं को धूल पर सुला देगा, तेरी कर्मशक्ति से गिने दिनों में बहुत शीघ्र वर्तमान का रूप धारण कर सकता है। लेकिन हे खुदा के बंदे! तू जरा यह तो बता कि करवटें बदलना कब छोड़ेगा? आंख मलनी कब बंद करेगा? अंगड़ाईयों से मुक्ति कब पाएगा? और जमीन को अपने पांव कब चूमने देगा?

यदि तू आज्ञा दे तो मैं तुझे यह बताना चाहता हूं कि तंजीम (संगठन) की शर्त किस प्रकार पूरी हो सकती है और इसके रास्ते में क्या-क्या बाधाएं आ सकती हैं। पहले बाधाओं को गिना दूं, क्योंकि किसी को बाधाओं का पता चल जाए और उनको हटाने का मार्ग मिल जाए, तो फिर संगठन इतना कठिन नहीं। सदियों से तुझे लोक और परलोक का कोई होश नहीं। तू सोया हुआ है और भिन्न-भिन्न जमायतें और व्यक्ति तेरे घर की लुटाई में लगे हुए थे। तेरे लिए तुझे सबसे अधिक सुलाने वाला नुस्खा मजहब का है। पहले भी इस नुस्खेू के प्रयोग से तुझे गहरी निद्रा में रखा गया है। अब तेरी आंख खुलने लगी है? तो वे लोग तेरी तरफ लपकेंगे और इन फोहों के जहरीले फव्वारों से फिर तुझको सुलाने की कोशिश करेंगे। मजहब के सत्त को शरबत में घोल कर तुझे पिला देंगे ताकि तू एक गिलास शराब पी कर अपने होश खो बैठे। इसी मजहब को गोलियां बनाकर तुझे खिलाई जाएंगी और तुझे खिलाकर फिर बेहोशी की नींद में फंसाने का प्रयत्न करेंगे। कोई कहेगा सिखी का बेड़ा गरक होगा, कोई कहेगा इस्लाम का बेड़ा गरक होगा, कोई कहेगा हिन्दू का बेड़ा गरक हुआ। लेकिन याद रख तेरे संगठन से सिखी, इस्लाम या हिन्दू धर्म का बेड़ा गरक नहीं होता। बेड़ा गरक केवल इन स्वार्थी लोगों का होता है जो मजहब के नाम पर घृणा व शत्रुता, ईष्र्या व द्वेष फैलाकर अपनी हंडिया पकाना चाहते हैं।

क्या कोई धंधा ऐसा है, जिसका संगठन मजहब की लिहाज को छोड़ कर न हुआ हो? स्वयं अपने प्रांत में तो इसके ही कई उदाहरण देखे जा सकते हैं। इंजीनियर, डाक्टर, हकीम, वैद्य, सौदागर और वकील सबने अपनी-अपनी सभाएं और संगठन बिला लिहाज मजहब बना रखी हैं। आश्चर्य की बात है कि जब दुनिया के सबसे बड़े और सबसे पुराने धंधे का संगठन बिला लिहाज मजहब होने लगता है तो पंडित, मौलवी, ग्रंथी, उपदेशक, मुल्ला, ज्ञानी, वकील, पत्रकार, दुकानदार, सबके पेट में दर्द होने लगता है। क्या तू नहीं समझता कि इसमें कुछ भेद है? वह भेद यही है कि तेरे जागने से और तेरे संगठित होने से इनकी रोजी-रोटी और लीडरी मारी जाती है। यदि तू इनका गुलाम रहना स्वीकार कर ले, तू इनको अपना नेता मान ले, इनका पिछलग्गू बन जाए और चन्दा इक्ट्ठा करके इसकी झोली भर दे, तो फिर ये तेरा संगठन खड़ा करने को तैयार हैं देख, स्वयं कांग्रेस वालों ने लाहौर जिले में किसान सभाएं बनाई हैं। लेकिन जब किसान स्वयं की मातहती में संगठित होने लगता है तो गैर जमींदार के पांवों के तले की जमीन खिसकने लगती है। क्यों? केवल इसलिए कि वे किसान की नकेल और किसान की थैली अपने हाथ में रखना चाहते हैं।

सरकार भी किसान के संगठन को वक्र दृष्टि से देखती है। वह यह नहीं समझती कि किसान के संगठन का समय आ गया है। यह संगठन किसी भी प्रकार अब रुक नहीं सकता प्रश्न केवल यह है कि क्या यह संगठन किसान के हाथों और किसान के अंतग्रत हो या कांग्रेस और कांग्रेस से अधिक चरमसीमा अतिवादी एजेंसियासें व संस्थाओं की देख-रेख पथ-प्रदर्शन और नेतृत्व में हो। इस बारे बहस में पड़ना नहीं चाहता। परन्तु इस बाधा की ओर संकेत करना आवश्यक समझता हूं।

साहूकार भी किसान के संगठन में जानबूझ कर बाधा डालता है क्योंकि किसान के संगठन में साहूकार अपनी हानि देखता है।

भ्रष्ट अफसर विशेषकर भ्रष्ट पटवारी किसान के संगठन से बहुत ही घबराता है। और यदि वह अफसर और पटवारी गैर जमींदार हो तो उनके तन बदन में और भी तेज आग लग जाती है। यह भी देखने में आया है कि गैर जमींदार अधिकारी चाहे वह रिश्वती न भी हों, तो भी किसान को प्लेग से भी बुरा समझते हैं, स्पष्ट है कि इनको इनके वर्गीय हित किसान के संगठन का विरोध करने पर विवश करते हैं। ये लोग झूठे आरोप लगाकर भी किसान के संगठन व आंदोलन को बदनाम करके दबाना चाहते हैं।

यदि किसी आंदोलन की कठिनाइयों को समझने की कोशिष न की जाए तो वह आंदोलन सफल नहीं हो सकता, इसलिएण् मैंने बड़ी-बड़ी बाधाओं का जिक्र ऊपर किया है, ताकि तू भली प्रकार जान ले स्वायत शासन की दृष्टि से संभव है कि सरकार के रोष में कुछ फरक पड़ जाए। परन्तु ऐसे किसी विषय के बारे में भविष्यवाणी करना बहुत कठिन है। ऐ किसान! तेरे संगठन का एक ही रूप है एक शक्तिशाली और प्रभावशाली केंद्रीय जमींदार लीग हो। इसके अधीन हर जिले और प्रत्येक तहसील में जिला और तहसील जमींदार लीग की शाखाएं खोली जाएं। कम से कम एक दैनिक अंग्रेजी का समाचार पत्र हो। कई उर्दू हिन्दी और पंजाबी में निकलने वाले दैनिक अखबार हों प्रत्येक जिले में एक साप्ताहिक अखबार हो। हर जिले और हर तहसील में जमींदारी लीग के स्थाई कार्यालय हों। जो जमींदार लीग के सिद्धांतों, नीतियों और प्रोग्राम का प्रचार करें। ईमानदार सच्चे कार्यकत्र्ता तैयार करने हैं

ऐ किसान! यदि तू यह दोहरी शर्त पूरी कर दे तो पंजाब का राज तुझे भेंट करने के लिए खुदा के फरिश्ते स्वयं तेरे पास आएंगे। तू हिम्मत रख। निरूत्साहित न हो। साहस से काम ले। यह न समझ कि यह काम कठिन है। तू अपनी वर्तमान स्थिति को देखकर यह ख्याल न कर कि तू सदा ऐसा ही था और भविष्य में भी ऐसा ही रहेगा। सच्चे बादशाह ईश्वर पर भरोसा रख अपनी भुजा-बल को समझ। अपनी हिम्मत पर विश्वास कर। अपने इकबाल पर तू यकीन कर। अपने अंदर दृढ़ संकल्प और महानता का निश्चय पैदा कर। यह समझ कि राज तेरा है। अगर तू ऐसा करने की तौकीफ रखता है तो जिस दिन नई स्कीम लागू होगी तू अपने-आपको पंजाब का राजा या मालिक पाएगा। यदि तू इस शर्त को पूरा करने के अयोग्य सिद्ध हुआ तो गुलामी, गरीबी, तंगदस्ती, भुखमरी, जिल्लत, अनादर और उपेक्षा अपने पुराने शिकार की प्रतीक्षा कर रही है। क्यों इनके फंदे में अपनी गर्दन फंसाए रखेगा? क्या इनके मजे के लिए इनका खाजा बना रहेगा? सावधान!

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Author: सर छोटू राम

जन्म: 24 नवम्बर 1881, दिल्ली-रोहतक मार्ग पर गांव गढ़ी-सांपला, रोहतक (हरियाणा-तत्कालीन पंजाब सूबा) में       चौधरी सुखीराम एवं श्रीमती सिरयां देवी के घर। 1893 में झज्जर के गांव खेड़ी जट में चौधरी नान्हा राम की सुपुत्राी ज्ञानो देवी से 5 जून को बाल विवाह। शिक्षा: प्राइमरी सांपला से 1895 में झज्जर से 1899 में, मैट्रिक, एफए, बीए सेन्ट स्टीफेन कॉलेज दिल्ली से 1899-1905। कालाकांकर में राजा के पास नौकरी 1905-1909। आगरा से वकालत 1911, जाट स्कूल रोहतक की स्थापना 1913, जाट गजहट (उर्दू साप्ताहिक) 1916, रोहतक जिला कांग्र्रेस कमेटी के प्रथम अध्यक्ष 1916-1920, सर फजले हुसैन के साथ नेशनल यूनियनिस्ट पार्टी (जमींदार लोग) की स्थापना 1923, डायरकी में मंत्राी 1924-1926, लेजिस्लेटिव काउंसिल में विरोधी दल के नेता 1926-1935 व अध्यक्ष 1936, सर की उपाधि 1937, प्रोविन्सियल अटॉनमी में मंत्री 1937-1945, किसानों द्वारा रहबरे आजम की उपाधि से 6 अप्रैल 1944 को विभूषित, भाखड़ा बांध योजना पर हस्ताक्षर 8 जनवरी 1945। निधन: शक्ति भवन (निवास), लाहौर-9 जनवरी 1945। 1923 से 1944 के बीच किसानों के हित में कर्जा बिल, मंडी बिल, बेनामी एक्ट आदि सुनहरे कानूनों के बनाने में प्रमुख भूमिका। 1944 में मोहम्मद अली जिन्ना की पंजाब में साम्प्रदायिक घुसपैठ से भरपूर टक्कर। एक मार्च 1942 को अपनी हीरक जयंती पर उन्होंने घोषणा की-‘मैं मजहब को राजनीति से दूर करके शोषित किसान वर्ग और उपेक्षित ग्रामीण समाज कीसेवा में अपना जीवन खपा रहा हूं।’ भारत विभाजन के घोर विरोधी रहे। 15 अगस्त 1944 को विभाजन के राजाजी फॉर्मुले के खिलाफ गांधी जी को ऐतिहासिक पत्र लिखा।

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