खूए शेर या खूए मेष (सिंह-वृत्ति या भेड़-वृत्ति) – चौधरी छोटू राम

चौ. छोटूराम

चौधरी छोटू राम, अनुवाद-हरि सिंह

जब युद्ध के नगारे पर चोट पड़ती है और किसान का सिपाही बेटा सजकर शत्रु के मुकाबले के लिए प्रस्थान करता है तो उसके अंदर वे सब गुण जाग उठते हैं, जो शेर में पाए जाते हैं। अब तोप की गरज इसको डरा नहीं सकती और तलवार की चमक इसको दहला नहीं सकती। संगीन की नोक फिर जंगल के कांटे से अधिक डरावनी नहीं लगती। बम का धमाका उसके दिल को नहीं हिला सकता। गोलियों की बौछार को वह वर्षा की झड़ी से अधिक नहीं समझता। शेर की भांति सीधे गोली पर जाता है। जब उसकी लड़ाई उसके भाई से होती है तो अपने भाई का सिर तरबूज की तरह फांक-फांक करने में जरा भी नहीं डरता। परन्तु इसकी बहादुरी और सिंह-वृत्ति केवल समरांगण में और भाई-भाई की लड़ाई तक ही सीमित है। इन दो स्थानों और इन दो अवसरों को छोड़कर अन्य सब जगह जमींदार की दहाड़ सिंह वाली दहाड़ नहीं, बल्कि भेड़ वाली म्यां-म्यां है। वस्तुतः यह सिंह-वृत्ति नहीं रखता, बल्कि भेड़-वृत्ति रखता है। यह सिंह की भांति नहीं, बल्कि भेड़ की भांति व्यवहार करता है। वह सिंह नहीं रहता, बल्कि भेड़ बन जाता है। इसकी वह तमाम वृत्तियां जो संस्कृत में राजसिक वृत्तियां कहलाती हैं, गायब हो गई हैं या कमजोर पड़ गई हैं।
मैं किसान से पूछता हूं कि वह शेर की तरह रहना चाहता है या भेड़ की तरह। उसे कौन-सी वृत्ति पसंद है, वह कौन-सी वृत्ति का पुजारी बनना चाहता है, वह कौन-सी वृत्ति की भक्ति करना चाहता है? ऐ किसान यदि तू मुझसे पूछे तो मैं बिना संकोच यह कहूंगा कि सिंह-वृत्ति अपना। भेड़-वृत्ति पर लानत भेज, उसकी निंदा कर, उसे रद्द कर दे। सिंह-वृत्ति में मैं वे सब गुण दाखिल करना चाहता हूं, जिसका संस्कृत में सामूहिक नाम बड़ा अच्छा मौजूद है। यानी राजसिक वृत्तियां। संभव है महानता के गुण के शब्द राजसिक वृत्तियों के अर्थ को प्रकट करते हों, परन्तु मैं पूरे विश्वास के साथ नहीं रह सकता कि वीरता, जलाल स्वाभिमान, कार्य-शक्ति, इच्छा-शक्ति, संघर्ष, रुचि, उच्च दृष्टि, ऊंचे विचार आदि तमाम ऐसे गुण हैं, जिनका संबंध जीवन के सक्रिय सिद्धांत अर्था गति व हलचल, कार्यशक्ति और पुरुषार्थ से है, इन सब गुणों को मैं सिंह-वृत्ति का नाम देता हूं। जो वृत्तियां, रुचियां, झुकाव व भाव इसके विरोधी हैं वे सब भेड़वृत्ति में आती हैं।
ऐ किसान तू भीगी बिल्ली न बन, भयानक खौफ शेर बन। डरपोक न बन, डरावना बन। कायर बन, जवांमर्द बन। दुर्बलता का विचार दिल में न आने दे। जोर आवरी और ताकतवरी का गुमान अपने दिल में रख। तू अपने-आप को किसी से कम और हीन मत समझ। बल्कि ऊंचा प्रतिष्ठित, मान्य गौरवशाली, महत्वपूर्ण प्रतापी आदरणीय समझ। कभ अपनी बेइज्जती, तिरस्कार, अनादर, अपमान और मान भंग को सहन न कर। स्वयं अपना आदर कर और दूसरों से करवा। आलस्य को छोड़ दे और चुस्ती को अपना। फुर्ती, दृढ़ता, स्थिरता और कार्यशील चपलता को अपना। निराशा का शिकार न बन। हिम्मत रख और आशा के घोड़े पर सवार रह। यह मत समझ कि तू कुछ नहीं कर सकता, तू अपने-आप को शक्ति का भंडार समझ। पुरुषार्थी बन। हिम्मत हार कर अपनी कार्य शक्ति से काम लेना बंद न कर। उपयोगी बन। गंभीर बन और मजबूती से कार्य में जुटा रह संतोषी, धैर्यवान और सहनशील रहना अपनी पुरुषार्थ शक्ति को दुर्बल करना है। सीने में आकांक्षाओं की आग सुलगा। दिमाग को संघर्ष और चिंतन में डुबो दे। दिल को शौक चाव की ज्वाला से प्रकाशित रख। पृथ्वी पर नीची दृष्टि क्यों डालता है? आकाश की ऊंचाइयों को अपनी निगाह का निशाना बना। समुद्र की गहराई पर और पाताल पर ख्याल जमाए क्यों बैठा है? अपने विचारों के पक्षी की उड़ान का रुख पर्वत की चोटियों की ओर फेर।
भाई किसान! तनिक विचार करके देख। क्या आज तक किसी कायर व्यक्ति ने कोई नाम पैदा किया? किसी साहसहीन व्यक्ति ने कोई मैदान मारा है? क्या इतिहास में कोई स्मरणीय ऐतिहासिक कार्य किसी साहसहीन पस्त-हिम्मत व्यक्ति से जहूर में आया है? वे कौन लोग हैं, जो मर कर भी जिंदा हैं? वही, जिनमें शक्ति जवांमर्दी थी, पौरुष था। तख्त व ताज, राज-पाट किन-किन लोगों ने जीते? केवल उन्होंने जो सिर पर कफन बांधकर अपने घर से निकल पड़े। बाबर ने भारत पर चार बार आक्रमण किया, परन्तु निराश लौटा। इस पर भी उसने हिम्मत का दामन नहीं छोड़ा। पांचवीं बार आया और ऐसे साम्राज्य की नींव डाली जो 300 वर्षों तक उसके बेटे पोतों के नीचे रहा। अंग्रेज सात समुद्र पार से आए और भारत पर छा गए।
परन्तु जिन्होंने सुस्ती और आलस्य अपनाया वे अपने पुरखों द्वारा प्राप्त किए हुए तख्त व ताज भी खो बैठे। इब्राहिम लोदी और सराजुद्दौला ने ऐसे ही तो अपने राज खोए।
ऐ किसान? जरा दूसरी तरफ नजर डाल। जंगल का राजा कौन है? शेर या गीदड़? वायु का राजा कौन है? बाज या चिड़िया? आकाश का राजा कौन है सूर्य या चांद? क्या तू इनसे पाठ सीखना नहीं चाहता?
शेर शिकार मारता है। उसके बचे-खुचे को गीदड़ खाता है। चिड़िया बाज का खाजा है। परन्तु मुर्दा चिड़िया को बाज कभी जमीन से उठाकर नहीं खाता। सूरज प्रकाश देता है, चांद सूर्य से प्रकाश लेता है। तू बता तुझे कौन सी हैसियत पसंद है? शेर या गीदड़ की? बाज की या चिड़िया की? सूर्य की या चांद की?
सांप से सारा जमाना डरता है। मगरमच्छ से सब भयभीत रहते हैं। नदी के जिस भाग में मगरमच्छ होते हैं, वहां लोग पानी में पैर रखते हुए घबराते हैं। जहां मगरमच्छ न हो, वहां स्त्री-पुरुष छोटे-बड़े सब पानी को छड़ डालते हैं। सांप जब मर जाते हैं, तो बच्चे उसे पांव की ठोकर से इधर-उधर ठुकराते फिरते हैं। इससे क्या नतीजा निकला? यही कि जब तक इसमें तेज है, तब तक उसके प्रति दूसरों के दिल में आदर की भावना रहती है, रौब कायम रहता है। जब इन गुणों का अस्तित्व मिट जाता है, तो इज्जत और रौब भी उनके साथ ही कूच कर जाते हैं।
सम्राट के सामने सिर झुकाते हैं। सरकारी अफसरों का सब आदर करते हैं। क्यों? क्योंकि वे सब शेर के गुण रखते हैं। क्या तूने वह कहावत सुनी है? उतरा आसान मरदक नाम (आसन से उतरते ही मुर्दा कहलाता है।) ज्यूं ही किसी व्यक्ति की सिंह-वृत्ति खत्म होती है, त्यों ही उसकी इज्जत भी चली जाती है।
ऐ किसान तू सिंह वृत्ति प्राप्त करना चाहता है तो तुझे अपने स्वभाव का स्वरूप बदलना पड़ेगा। अब तो तू डरता है, दुबकता है, संकुचित रहता है। खतरे से घबराता है। मामूली सी दुर्घटना से, खौफ से तू हिल जाता है। जरा सी हानि से तेरी रूह कांप उठती है, इसका यह अर्थ हुआ कि तेरी भेड़ वृत्ति है यदि तू शेर बनने का इच्छुक है, तो भय को दिल से निकल कर फेंक दे। यह समझ ले कि भय का कोई अस्तित्व ही नहीं है। अंदेशा कोई चीज नहीं है। खतरा एक बहम है। यदि खौफ, अंदेशा और खतरा कहीं है तो इनको निमंत्रण दे, इन से लड़ और उनसे विजय प्राप्त कर। उनके बीच रहकर जी।
अगर ख्वाही अरूयाद अन्छी खतरजनों
(यदि जीने की इच्छा है, तो खतरे से न डर)
देख कोई भी चीज जोखिम उठाए बिना प्राप्त नहीं हुआ करती। जब तक तू डरा-डरा रहेगा, तुझे कुछ भी नहीं मिल सकता। तू मोतियों की झोली भरना चाहता है और पानी में कदम रखने से घबराता है। भला दोनों बातें एक साथ कैसे चलेंगी?
बदरिया दर मुनाफा बेशुमार अस्त।
दिगर ख्वाही सलामत बरकिनार अस्त।।
यदि मोती चाहता है तो नदी में गोता लगा। पर यदि जान को संकट में नहीं डालना चाहता तो किनारे पर खड़ा रहे और मोतियों का विचार दिल से निकाल दे।
धन, आदर-सत्कार, शान व शौकत ऊंचा पद आदि कोई चीज ऐसी नहीं जो भेड़-वृत्ति से प्राप्त हो सके? यदि तू ये चीजें चाहता है तो सिंह वृत्ति अपना लें। यदि तू ये चीजें नहीं चाहता है तो संसार से मिट जा। तेरे जीवित रहने की आवश्यकता नहीं है। तू पृथ्वी पर एक बेकार सा बोझ है। इस हालत में तेरा कोई अस्तित्व नहीं।
परन्तु ऐ किसान मैं तुझ पुरुष प्रधान हस्ती को शोषकों के हाथों-जलीलों-ख़्वार अपमानित व दलित होता देखकर सहन नहीं कर सकता। मैं तेरे अस्तित्व को कायम रखने का इच्छुक हूं। मैं आपके वजूद को शान व इज्जत के साथ बंधा हुआ देखना चाहता हूं। परन्तु इन सब बातों के लिए सिंह-वृत्ति की जरूरत है। भेड़-वृत्ति इनमें बड़ी बाधा डालती है। परन्तु इस समय तुझ पर भेड़-वृत्ति हावी है। तुझे भेड़-वृत्ति ने दबा लिया है। तेरी सिंह-वृत्ति दबी पड़ी है। मैं तेरे अंदर सिंह-वृत्ति का साम्राज्य चाहता हूं। इसलिए मैं ईमानदारी सच्चाई निष्कपटता और दिल की तड़प् के साथ सलाह देता हूं कि तू आजजी गिड़गिड़ाना छोड़कर सरकारी रुनत और वर्ग अपना ले। किसी के सामने अपनी जरूरत पूरा करने के लिए मत गिड़गिड़ा। अपने स्वाभिमान को वरीयता दे। नरमी लाड़-प्यार को छोड़ दे। घास न बन, घोड़ा बन। शिकार न बन, शिकारी बन। मजलूम न बन, जालिम बन। मजबूर न बन, जामिर बन।
ऐ किसान अंत में एक बात और सुन। इस संसार में दुर्बलता व कमजोरी बहुत बड़ा पाप है। शक्ति के सामने सारा संसार सिर झुकाता है। वर्तमान युग में न्याय और अन्याय का फर्क केवल ताकत, शक्ति और बर्बरता के कांटे पर तुलता है। वर्तमान सभ्यता में सत्य और झुठ की पहचान और उसकी नाप शक्ति है। देख अलामा इकबाल भी कहते है:
ज़िन्दगी किश्त अस्तो-हासिल कुव्वत अस्त।
शरहे-रमजे हक्को-बातिल कुव्वत अस्त।।
मुद्दई गर मायादार अज कुव्वत अस्त।
दावाए ओ बेनियाज अज हुज्जत अस्त।।
(जीवन खेती है और इसकी पूर्ण उपलब्धि शक्ति है। सत्य (हक) क्या है और झूठ क्या है? इसका रहस्य भी शक्ति में छिपा हुआ है। यदि वादी शक्तिशाली है, तो उसके मुकद्दमें को किसी दलील बहस की जरूरत नहीं।)

Avatar photo

Author: सर छोटू राम

जन्म: 24 नवम्बर 1881, दिल्ली-रोहतक मार्ग पर गांव गढ़ी-सांपला, रोहतक (हरियाणा-तत्कालीन पंजाब सूबा) में       चौधरी सुखीराम एवं श्रीमती सिरयां देवी के घर। 1893 में झज्जर के गांव खेड़ी जट में चौधरी नान्हा राम की सुपुत्राी ज्ञानो देवी से 5 जून को बाल विवाह। शिक्षा: प्राइमरी सांपला से 1895 में झज्जर से 1899 में, मैट्रिक, एफए, बीए सेन्ट स्टीफेन कॉलेज दिल्ली से 1899-1905। कालाकांकर में राजा के पास नौकरी 1905-1909। आगरा से वकालत 1911, जाट स्कूल रोहतक की स्थापना 1913, जाट गजहट (उर्दू साप्ताहिक) 1916, रोहतक जिला कांग्र्रेस कमेटी के प्रथम अध्यक्ष 1916-1920, सर फजले हुसैन के साथ नेशनल यूनियनिस्ट पार्टी (जमींदार लोग) की स्थापना 1923, डायरकी में मंत्राी 1924-1926, लेजिस्लेटिव काउंसिल में विरोधी दल के नेता 1926-1935 व अध्यक्ष 1936, सर की उपाधि 1937, प्रोविन्सियल अटॉनमी में मंत्री 1937-1945, किसानों द्वारा रहबरे आजम की उपाधि से 6 अप्रैल 1944 को विभूषित, भाखड़ा बांध योजना पर हस्ताक्षर 8 जनवरी 1945। निधन: शक्ति भवन (निवास), लाहौर-9 जनवरी 1945। 1923 से 1944 के बीच किसानों के हित में कर्जा बिल, मंडी बिल, बेनामी एक्ट आदि सुनहरे कानूनों के बनाने में प्रमुख भूमिका। 1944 में मोहम्मद अली जिन्ना की पंजाब में साम्प्रदायिक घुसपैठ से भरपूर टक्कर। एक मार्च 1942 को अपनी हीरक जयंती पर उन्होंने घोषणा की-‘मैं मजहब को राजनीति से दूर करके शोषित किसान वर्ग और उपेक्षित ग्रामीण समाज कीसेवा में अपना जीवन खपा रहा हूं।’ भारत विभाजन के घोर विरोधी रहे। 15 अगस्त 1944 को विभाजन के राजाजी फॉर्मुले के खिलाफ गांधी जी को ऐतिहासिक पत्र लिखा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *