चौ. छोटूराम

खूए हरकत या खूए सकून (रजोगुण  या तमोगुण) – चौधरी छोटू राम

चौ. छोटूराम

चौधरी छोटू राम, अनुवाद-हरि सिंह

ऐ जमींदार! तेरी खातिर मैंने सारी दुनिया से जंग मोल ले रखी है। तेरे लिए ही जमाने भर को नाराज कर लिया है। इसलिए मुझे नैतिक अधिकार है कि तुझे बुरा भला कहूं। तुझे लताड़ लगाऊं, तेरी कमियों को बयान करूं। तेरा दोष बता बताऊं। तेरी कमियां, तेरा दोष और तेरी कोताहियां जतलाऊं। तेरे खोट गिनाऊं। अभी चंद दिन हुए तू परमात्मा से पूछ रहा था, मेरी कमी बता। मैं तेरा पड़ोसी हूं, तेरे घर का भेदी हूं। खुदा बताए या न बताए, मैं बताता हूं कि तेरी कमी क्या है। खुदा के बातने के ढंग तो ऐसे हैं कि वह शायद तेरे समझ में ही न आए। मैं तेरा भाई हूं। मेरी बोली को तू समझता है। मेरे तरीके मेरे समझ में आ सकेंगे। ले, सुन। तैयार हो जा। अपना कान और अपना ध्यान मेरी ओर लगा।

तेरे अंदर तमोगुणी बातें भर गई हैं। तमोगुण ने तेरे दिल और दिमाग पर कब्जा कर लिया है। तमोगुण ने बल्कि तेरे गुणों को नष्ट कर दिया है या इन पर ऐसा गालिब पा लिया है कि किसी को उनका अस्तित्व दिखाई नहीं देता है। यह आम निष्क्रियता की प्रधानता तेरे विनाश का कारण है। जरा विचार कर कि तू किस प्रकार हर एक बात में दूसरों पर निर्भर हो गया है। तुझे हर बात में दूसरों का सहारा लेना पड़ता है। तेरे तमोगुण के कारण तेरे सिर पर कर्जा चढ़ गया है और इतना बढ़ गया है कि जब तू कहता है कि इसको उतार नहीं सकता, तब सरकार से प्रार्थना करता है कि ऐसा कोई कानून बना कि यह कर्जा अपने आप उतर जाए, ब्याज लगना बंद हो जाए या कम हो जाए। इजराए डिग्री की कार्यवाही में तैरी कैद न हो और तेरी सम्पति नीलाम न हो। यदि सरकार इन बातों में कुछ करना भी चाहे तो तू इसकी मदद नहीं करता है। यदि सरकार तेरे लिए कोई कानून पास भी कर दे तो साहूकार और उसके सहायकगण आकाश को सिर उठा लेते हैं। और कहते हैं कि ऐसा कानून सरासर अन्यायपूर्ण और अत्याचार से भरा है। मगर तू क्या करता है? कुछ भी नहीं। घर से हिलता नहीं, जुबान से बोलता नहीं। तू तो यह चाहता है कि कोई हलवा बनाए और लुकमे तेरे मुंह में डाल दे। और अगर संभव हो तो ये लुकमे भी अपने-आप तेरे हलक से नीचे उतर जाएं। तू चाहता है कि जमीन का कर और आबियाना स्थाई रूप से घट जाए और जब फसल में खराबी हो जाए तो मुझे माफी भी दिला जाया करे। तुरंत सरकार आकाश से रुपए की वर्षा नहीं कर सकती। सरकार प्रशासन चलाने के लिए लंदन से रुपया नहीं मंगा सकती। औ तू अब आय के नए साधन सरकार को बतलाता नहीं। यदि सरकार कोई नया कर गैर-जमींदार पर लगाने का प्रस्ताव रखे तो समस्त प्रैस और प्लेटफार्म दुहाई-दुहाई के शोर से गूंजने लगेंगे और तू ऐसा नपूंसक है कि सरकार को तुझसे कोई मदद नहीं मिल सकती। यहां तक कि पान और सोडे पर कर लगाने का सुझाव हो तो भी तेरे प्रतिनिधि बगले झांकने लगते है। यह बिल्कुल अनावश्यक और फिजूल शौक की चीजें हैं यदि इन पर कर लगे तो बहुत अच्छी बात है। सरकार की आय बढ़ेगी और इस कर का भार साधारण तौर पर गैर-जमींदारों और समृद्ध शहरी आबादी पर पड़ेगा और संभव है कि यह कर इस प्रकार के अन्य कर तेरे बोझ से कमी होने की संभावना उत्पन्न कर दे। परन्तु नहीं, यहां तेरे प्रतिनिधि शहरी प्रतिनिधियों से मिल जाते हैं। यदि सरकार के इंतजाम का व्यय घटाने का कोई प्रस्ताव आए तो इनकी कृपा दृष्टि सरकार पर जा डटती है।

ऐसी परिस्थिति में क्या हो? तू नपुंसक है। तू केवल हिजड़ा है-नामर्द है। तुझसे न मित्र को आशा है, न शत्रु को कोई भय है, तू लंगड़ा है, तू लूला है, अपाहिज है, विकलांग है। तेरे जीवन के तमाम स्रोत सूख गए हैं। तेरे शरीर में हरकत नहीं रही। तेरे दिमाग में चिंतन नहीं रहा। तेरे विचार में उड़ान नहीं। तेरी जबान में बातचीत करने की शक्ति नहीं। तेरी आंखों की रोशनी जा चुकी है। तेरे कानों की श्रवण शक्ति खत्म हो चुकी है। तेरे बाजुओं की ताकत गई। कौन कहता है कि तू जीवित है? तू तो मुर्दा है, मुर्दे से भी गया गुजरा है, तू नंग-धडंग है। तुझे कोई शर्म लिहाज नहीं रहा। तू जमीन पर बोझ है। पता नहीं कब्र भी तेरी लाश को स्वीकार करेगी या नहीं। पता नहीं, अग्नि भी तेरी लाश को जलाने के लिए तैयार होगी या नहीं।

इन हालात से विवश होकर और तेरी दुर्दशा से अति क्रुद्ध, दुखी व तंग होकर यह रोना शुरू किया है। हो सकता है कि कोई इसे सुने और तेरी मदद करने के लिए तैयार हो जाए। भगवान दया करे। खुदा रहम करे। सरकार तरस खाए। किसी पड़ोसी का दिल पिघल उठे या तेरा पुराना खून ही तरारा खा उठे। साहूकार, शहरी, गैर-जमींदार या सरकार की शिकायत करना मेरा उद्देश्य नहीं है। उनकी शिकायत तो राह चलती है। ये सब प्रकृति के नियम के अनुसार चल रहे हैं और हर दर्जे का इंसान खुशी से अपने लाभ को नहीं छोड़ता, चाहे वह दूसरों को अनुचित हानि पहुंचाने से ही प्राप्त क्यों न होता हो। प्रत्येक सरकार सबसे सरल और आराम के मार्ग पर चला करती है। जिस मार्ग पर चलने में विरोध की संभावना हो, उस पर चलने से हरेक सरकार जहां तक संभव हो, वहां तक चलने से परहेज करती है। तेरी सहायता का जो रास्ता है, वह सुगम नहीं है। वह कांटों से भरा पड़ा है और तू इन कांटों को साफ करने में कोई मदद देने के योग्य नहीं या सहायता देने के लिए तैयार नहीं। मेरे समस्त ताने व रोदन व आजजीत का वास्तविक उद्देश्य तेरे अंदर जीवन की चिंगारी जागृत करने का है, जिससे तेरा वर्तमान निर्जीव जीवन पुनः जीवित हो उठे। तू अपने पांव पर खड़ा हो जाए और मित्रों के लिए प्रेरणा का स्रोत और शत्रुओं के लिए डरावना बन जाए, सरकार के लिए मार्ग सुगम बना सके। जिस पर चलकर वह तेरी सहायता कर सके साहूकार के दिल में न्याय करने की इच्छा जगा सके। अपनी आय बढ़ाने के साधन इतने विशाल बना सके कि कर्जे के वर्तमान फंदे से निकल सके और भविष्य में इस भयानक संकट में फंसने की संभावना कम हो जाए।

ऐ किसान! तनिक विचार करके देख, तेरी यह दुर्दशा क्यों हुई? मैंने इस लेख माला के शुरू में ही यह बयान कर दिया था कि तेरी बर्बादी का सही कारण तेरी मूर्खता है। खुदा ने शुरू में रजोगुण की वृत्तियां तेरे सीने में धरोहर के रूप में भरी थी। जब तक यह रजोगुण पूरी शान से तेरे अंदर रहे, तब तक तूने दुनिया में हुकूमत की, जब इन गुणो की शक्ति और शान जाती रही और तू तमोगुण का शिकार हो गया, तो तेरा पतन आवश्यक हो गया। तेरी यह दुर्गति ठीक प्राकृतिक नियम के अनुसार है। प्रकृति स्वयं शक्ति है, जीवन बूटी है। इसलिए प्रकृति शक्ति और हयात की सहायता किया करती है। तूने अपनी शक्ति खो दी है। तू जीवन शक्ति से खाली हो गया है। अब प्रकृति तेरी कैसे सहायता करे? तमोगुण को छोड़, रजोगुण से लगन लगा। फिर देख प्रकृति तेरी सुंदर ढंग से सहायक होती है। ऐ जमींदार! याद रख हरकत में ताकत है। हरकत में ही जिंदगी है। हरकत की ताजगी और जीवन शक्ति का रहस्य है। गतिशीलता स्वास्थ्य वर्द्धक है। चलती का नाम गाड़ी है। सकून दुर्बलता का नाम है और मौत की निशानी है। खालीपन रोग को बुलावा है। निरा स्वाद जीवन का शत्रु है। फिर तू गतिशीलता को छोड़कर और आराम का सहारा लेकर किस प्रकार फलने-फूलने की आशा रखता है? बहता पानी पाक व साफ होता है। बंद पानी बदबू देने लगता है। बंद पानी में कीड़े पड़ जाते हैं, जब तक कि दिल धड़कता है, मनुष्य जीवित है। दिल की धड़कन बंद होते ही जीवन विदा हो जाता है। जब इंजन चलता है, तो रेलगाड़ी में लाखों मन बोझ ले जाने की शक्ति आ जाती है। इंजन का चलना बंद होते ही यह शक्ति समाप्त हो जाती है। जब तक बाल-कमाणी गतिशील है। घड़ी चलती रहती है और समय बताती है। बाल-कमानी की हरकत बंद होते ही घड़ी बेकार हो जाती है।

हवा चलती है तो हवा, हवा है। हर प्राणी को अच्छी जीवन-दायिनी लगती है। जब हवा बंद हो जाती है, तो प्रत्येक जीव के प्राण निकलने लगते हैं, दम घुटने लगता है।

गति में क्या शक्ति है। इसको तनिक और खोलकर लिख दूं ताकि तेरे ठस्स दिमाग में मंद बुद्धि में आसानी से आ सके। जब समुद्र ठाठे मारने लगता है, तो बड़े-बड़े जहाजों को डुबा देता है। ये समुद्र की लहरें क्या हैं? केवल गतिशीलता का एक प्रदर्शन है। इसी प्रकार जब आंधी आती है, तो बड़े-बड़े वृक्षों को जड़ से उखाड़ फैंकती है। यह आंधी क्या है? यह भी गतिशीलता का एक तमाशा है। जब बाढ़ आती है, तो एकदम बल्लियों पर पानी चढ़ जाता है और सब कुछ बहा ले जाता है। गांव के गांव लुप्त हो जाते हैं। यह बाढ़ क्या चीज है? यह भी गतिशीलता का एक जादू है। नदी का वेग क्या है? केवल गतिशीलता का एक मंत्र है। कूदता, फांदता, उछलता, नाचता पानी है। सूर्य का प्रकाश और उष्णता क्या है? यह भी गतिशीलता का एक प्रमाण है। गति में आया हुआ प्रकाश नाचता है और गर्मी तथा रोशनी देने वाले शोले फेंकता है। बिजली क्या चीज है? यह भी हरकत का परिणाम है। कुदरती बिजली के तेज कोड़ों का नाम बिजली है। केवल सोरश व जलन की दलील है, आकाश की तड़पन है, बादल की तिलमिलाहट है। बादल की गरज क्या चीज है? केवल गतिशीलता का एक मशवरा है। आकाश में तेज गतियों की टकराहट का नाम गरज है।

गतिशीलता के गुण और जड़ता के दोष तो मैं बहुत बता चुका। अब मैं तुझसे पूछता हूं कि बता तूने सकून में क्या खूबी देखी? मुझे तो कोई खूबी नजर नहीं आती। यदि अभी तक सकून की तमाम खराबियों का पूरा पता तुझे नहीं लगा, तो मैं चंद घरेलू उदाहरण और सुना देता हूं।

तेरे गांव में तालाब का पानी रुका पड़ा है। इसमें काई हो जाती है। पर तूने बहते पानी में कभी काई देखी है? हरगिज नहीं यह केवल सकून में है हरकत में नहीं। जब तक पानी बहता रहता है, तब तक ताजा रहता है। इसको एक जगह पड़ा रहने दो, वह सड़ उठता है। घोड़े को टहलाते रहे, खूब सवारी देगा। परन्तु चंद दिन उसे खड़ा रखो, बिगड़ने अड़ने लगेगा। यह भी सकून और हरकत का फर्क है। रोटी को आग में फेरते रहो, पक जाएगी और जलेगी नहीं, न फेरो तो जल जाएगी और बदमजा व बे स्वाद होकर खाने के योग्य न रहेगी। यह भी सकून और हरकत का ही फर्क है। खेत की मिट्टी अदलते-बदलते रहो, निलाई और बहाई करते रहो, मिट्टी को ऊपर-नीचे करते रहो, तो अच्छी पैदावार देगी। मिट्टी को हिलाओ मत, इसमें हल मत चलाओ, इसमें तो फसल कमजोर और रोगली होगी और पैदावार बहुत कम होगी। यह अंतर भी गतिशील और जड़ता का ही है।

मैंने तुझे समझाने की बेहद कोशिश की है। अगर तू अब भी नहीं समझा तो खुदा भी नहीं समझा सकता है। अरे भोले बंदे और कुछ नहीं तो मुझ पर विश्वास ही कर ले। आखिर तेरी भलाई तो इसी में ही है, क्योंकि मैं तुझसे कोई ऐसी बात नहीं कह सकता, जिसमें तेरी भलाई न हो।

हरकत और सकून में वही फर्क है, जो जमीन और मृत्यु में है, जो शक्ति और दुर्बलता में है, स्वास्थ्य और रुग्णता में है। विजय और हार में है। स्वामित्व और दासत्व में है, अमीरी और गरीबी में है। गति और जीवन का रहस्य छिपा हुआ है। विराम में मृत्यु का रहस्य है। हरकत में इज्जत है, सकून में जिल्लत है। हरकत में हुकूमत है, सकून में गुलामी है। हरकत में तख्त है, सकून में मुर्दे की अर्थी है।

ऐ जमींदार! अब बोल तुझे कौन-सी चीज पसंद है? कमर बांधकर हरकत से मित्रता करने और भविष्य में प्रगति करने के लिए इससे हाथ मिलाना या शिथिलता की कैद काटते रहना। हरकत का संबंध जान लड़ाकर पुरुषार्थ करने का है। सकून का संबंध आलस्य, विलासिता, बेकारी और ढीलापन के साथ है। हरकत की मंजिल जीवन, इकबाल, इकतदार, इज्जत और धन है। सकून की मंजिल कब्र, जिल्लत, बदनामी, रुसवाई, इकतदार, नादानी और हीन अवस्था की है। मेरी राय में तो तू हरकत की शराब का एक भरपूर प्याला पी जा। फिर देखना हरकत की शराब तेरे अंदर क्या परिवर्तन लाती है। इसी परिवर्तन का सही चित्र खींचने के लिए मैं फिर अलामा इकबाल से प्रार्थना करता हूं। अलामा इकबाल फरमाते हैं:

  1. एतबारे कोह बख्शद काहरा।
    कुव्वते-शेरा-दहद रूवाहरा।।
    (अमल घास के तिनके को पहाड़-तुल्य बना देती है। साहस लोमड़ी को भी शेर शेर की शक्ति प्रदान कर देता है।)
  1. खाक रा ओजे शुर्रया में दहद।
    कतराए रा ब पिन्हाए दरिया दहद।।
    (गति धूल को सातवें आसमान पर पहुंचा देती है। गति पानी की एक बूंद को नदी की पाट बना देती है।)
  1. खामुशी रा शोरसे महशर कुनद।
    पाए कुबक अज खूने बाज अहमर कुनूद।।
    (गति खामोशी के अंदर प्रलय का शोर पैदा करती है। गति ही चकोर को वह शक्ति देती है  कि वह बाज का शिकार करे और बाज के खून से अपने पंजों को लाल कर ले।)

सर छोटू राम

जन्म: 24 नवम्बर 1881, दिल्ली-रोहतक मार्ग पर गांव गढ़ी-सांपला, रोहतक (हरियाणा-तत्कालीन पंजाब सूबा) में       चौधरी सुखीराम एवं श्रीमती सिरयां देवी के घर। 1893 में झज्जर के गांव खेड़ी जट में चौधरी नान्हा राम की सुपुत्राी ज्ञानो देवी से 5 जून को बाल विवाह। शिक्षा: प्राइमरी सांपला से 1895 में झज्जर से 1899 में, मैट्रिक, एफए, बीए सेन्ट स्टीफेन कॉलेज दिल्ली से 1899-1905। कालाकांकर में राजा के पास नौकरी 1905-1909। आगरा से वकालत 1911, जाट स्कूल रोहतक की स्थापना 1913, जाट गजहट (उर्दू साप्ताहिक) 1916, रोहतक जिला कांग्र्रेस कमेटी के प्रथम अध्यक्ष 1916-1920, सर फजले हुसैन के साथ नेशनल यूनियनिस्ट पार्टी (जमींदार लोग) की स्थापना 1923, डायरकी में मंत्राी 1924-1926, लेजिस्लेटिव काउंसिल में विरोधी दल के नेता 1926-1935 व अध्यक्ष 1936, सर की उपाधि 1937, प्रोविन्सियल अटॉनमी में मंत्री 1937-1945, किसानों द्वारा रहबरे आजम की उपाधि से 6 अप्रैल 1944 को विभूषित, भाखड़ा बांध योजना पर हस्ताक्षर 8 जनवरी 1945। निधन: शक्ति भवन (निवास), लाहौर-9 जनवरी 1945। 1923 से 1944 के बीच किसानों के हित में कर्जा बिल, मंडी बिल, बेनामी एक्ट आदि सुनहरे कानूनों के बनाने में प्रमुख भूमिका। 1944 में मोहम्मद अली जिन्ना की पंजाब में साम्प्रदायिक घुसपैठ से भरपूर टक्कर। एक मार्च 1942 को अपनी हीरक जयंती पर उन्होंने घोषणा की-‘मैं मजहब को राजनीति से दूर करके शोषित किसान वर्ग और उपेक्षित ग्रामीण समाज कीसेवा में अपना जीवन खपा रहा हूं।’ भारत विभाजन के घोर विरोधी रहे। 15 अगस्त 1944 को विभाजन के राजाजी फॉर्मुले के खिलाफ गांधी जी को ऐतिहासिक पत्र लिखा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *