नया उपदेश – चौधरी छोटू राम

चौ. छोटूराम

चौधरी छोटू राम, अनुवाद-हरि सिंह

इन्सान आदत का गुलाम है और अपने समय में प्रचलित विचारों का पुजारी है। कुछ जमाने की मुसीबतों से, कुछ आसपास के हालात से, कुछ अनभिज्ञता और जहालत से, कुछ गलत शिक्षा व विश्वास के कारण जमींदार की मनोवृत्ति ऐसी बन गई है कि वह वर्तमान युग के संघर्ष व खींचातानी का मुकाबला नहीं कर सकता। उसके मस्तिष्क में ऐसे विचार घुस गए हैं और उसकी विचार शक्ति को ऐसे वातावरण में उड़ने की आदत पड़ गई है कि वह कभी मंजिल पर पहुंचने का रास्ता नहीं पकड़ सकता। आवश्यकता इस बात की है कि जमींदार को इनके बाबा आदम के जमाने के विचारों से मुक्त कराया जाए। इन पुरानी आदतों को छुड़ाया जाए। इसलिए में जमींदार की सेवा में एक नया उपदेश पेश करता हूं। असल में देखा जाए तो यह उपदेश की याद ताजा करता हूं, जिसको किसान वर्ग भूल चुका है। फिर भी हर प्रकार से इस नए उपदेश में या पुराने उपदेश को नए सिरे से बताने में में किसान की प्रगति का रहस्य सोचता हूं। किसान से सौ बार विनम्र प्रार्थना करता हूं कि वह इस उपदेश को पूरे ध्यान से सुनें।

हिन्दुओं ने जीवन को चार भागों में बांटा है। पहला भाग ब्रह्मचर्य आश्रम के नाम से प्रसिद्ध है। यह समय पूरी शिक्षा पाने और शारीरिक तथा मानसिक शक्तियों को पूरे कमाल पर पहुंचाने से है। ताकि मनुष्य जीवन संघर्ष के लिए पूरी तरह से तैयार हो सके। दूसरा भाग गृहस्थ आश्रम कहलाता है। इसका संबंध घर चलाने का है। इस आश्रम से मनुष्य को हिदायत है कि वह संतान पैदा करे, धन कमाए, इज्जत बढ़ाए और ऊंचा पद प्राप्त करे। पहला आश्रम तैयारी का जमाना है। दूसरा आश्रम तमाम मानवीय शक्तियों को कार्यों में लगाकर न्याय और सत्य के साथ सांसारिक जरूरतों की तथा आराम की चीजों को अधिक से अधिक जोड़ने का है। तीसरा हिस्सा वानप्रस्थ आश्रम के नाम से पुकारा जाता है। यह आश्रम दुनिया और दुनियादारी की चिंताओं से स्वतंत्रता प्राप्त करके पर्वतों व वनों के एकांत में पहले दो आश्रमों से प्रापत की गई शिक्षा और अनुभव पर विचार करके पवित्र दिल से ईश्वर की याद और भजन में व्यस्त होकर आध्यात्मिक पवित्रता और आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त करने के लिए है। चैथा हिस्सा सन्यास आश्रम के नाम से जाना जाता है जो पहले तीनों आश्रमों के प्राप्त किए गुणों के प्रकाश से प्रकाशित होकर और सांसारिक दुर्बलताओं से स्वतंत्र और उनसे ऊपर उठकर मनुष्य को अपने जीवन का अंतिम भाग ईश्वर के पैदा किए हुए लोगों की निष्काम सेवा में लगने का मौका देता है।

किसान के दिल और दिमाग पर जिस शिक्षा का प्रभाव है। वह अधिकतर तीसरे और चौथे आश्रमों के साथ संबंधित है। इसको टूटी-फूटी शिक्षा अर्धशिक्षित पंडितों, मौलवियों, साधु-संतों और फकीरों से मिलती है। इस शिक्षा के देने वालों की आत्मा इतनी शुद्ध और उनके दिमाग इतने जागृत नहीं होते कि वे खोलकर यह समझा दें कि उनके उपदेश व नसीहत के किन भागों का संबंध चिंतन है और किनका संबंध सेवा से है। असल में यह उपदेश जीवन के भिन्न-भिन्न भागों का लिहाज रखते हैं। यह उपदेश अधिकतर जीवन में तीसरे और चौथे भागों से संबंधित है। मैं यह उपदेश देना चाहता हूं जिसको अब तक भुलाया गया है।

ऐ दहकान! अब तक मुझको सब्र व संतोष का पाठ सिखाया गया है। मैं तुझको असंतोष का पाठ पढ़ाना चाहता हूं। सबर व संतोष तो पुरुषार्थ का शत्रु हैं। मैं तुझको पुरुषार्थ में सरगरम देखना चाहता हूं। तकदीर पर संतुष्ट रहने की शिक्षा गलत है। मैं कहता हूं कि तकदीर की शिकायत कर। अगर तुझसे बाहर और तेरे कार्यों की उपेक्षा करके तेरी तकदीर बनाने वाली कोई शक्ति है तो उससे भी शिकायत कर, तकदीर से भी लड़ और तकदीर बनाने वाली शक्ति से भी लड़। अगर तू तकदीर के भरोसे पर बैठा रहा तो तू कोई उन्नति नहीं कर सकता। उन्नति वही मनुष्य कर सकता है और अपनी वर्तमान स्थिति से असंतुष्ट और क्रुद्ध है। जो मनुष्य अपने भाग्य पर संतुष्ट है उसके दिल में उन्नति का विचार घुस नहीं सकता। तुझे शांति की शिक्षा दी गई है। मैं तुझे अशांति के गुणों पर लट्टू करना चाहता हूं। जो कुछ है हलचल में है, हरकत में है, जंबिश में है, हलचल जीवन की निशानी है। हरकत जीवन का प्रमाण है। जन्बुश जिंदगी का नाम है। शांति मौत है। आराम बेजान लाश की विशेषता है। शांति मृत्यु का दूसरा नाम है। सुकून को छोड़ दे। करार को खैरबाद विदा कर दे। शांति को प्रणाम करके विदा कर दे। देख, जब तक पानी चलता रहा है, साफ रहता है ‘बू फिसाद की है बंद पानी में’ रुका हुआ पानी सड़ उठता है।

गलत मार्गदर्शकों ने तुझे खामोशी सिखाई। मैं तुझे शोर व संघर्ष की शिक्षा देना चाहता हूं। खामोशी कब्रिस्तान (श्मशान) में होती है। जीवित आदमियों की बस्ती में खामोशी कैसी? शमशान सुनसान होता है। इंसानों की आबादी सुनसान नहीं हो सकती है। अगर ऐ जमींदार! तू जीवित है और जीवित रहते हुए बेजान होना या मुर्दा बनना नहीं चाहता तो शांति का जादू तोड़ दे। सिर से पैर तक आवाज बन जा। अपनी आवाज उठा। अपने अंदर नदी का शोर पैदा कर। समुद्र का खरोश दिखा। शेर की दहाड़ सीख। अपने जंगल की रक्षा कर और इसका बादशाह बन कर रह। ऊंची दृष्टि रख। धूल की तरफ नीचे मत देख। आसमान से नजर लड़। गुर्गे सरा की भंति खाक नशीन न बन। मुर्गे हवा की तरह आकाश में उड़ान ले। ऊंचे आदर्श अपने सामने रख। यदि तेरी दृष्टि का क्षेत्र संकीर्ण है तो तू तरक्की क्या करेगा? यदि तेरी दृष्टि फर्श पर है तो छत पर कैसे चढ़ सकता है? कुछ मुजायका नहीं, अगर तेरे पांव पर जमीन है और नजर (दृष्टि) सातवें आसमान पर होनी चाहिए। ऊंचा ही ऊंचा उठ। ऊपर ही ऊपर चढ़।

लोग कहते हैं कि तू बहादुर है। मगर जमींदार भाई क्षमा कर। मैं तुझे बहादुर नहीं समझता। तेरी वीरता शारीरिक वीरता तक सीमित है और वह भी युद्ध भूमि में प्रकट होती है। या तेरी लाठी तेरे भाई की चांद को चूमने के लिए लालायित रहती है। तू मजदूर को देखकर कांपता है। पुलिस के सिपाही से तेरी रूह कब्ज हो जाती है। एक बंदूकधारी सारे गांव को कूट देता है और अनुचित मांगें करता है और किसी की यह हिम्मत नहीं होती कि इन अनुचित मांगों के विरुद्ध आपत्ति उठाए और इन अनुचित मांगों को अनुचित प्रकट करे। कोंसिल में प्रतिदिन देखता हूं। गवर्नमेंट का बनिया विरोध करता है। खत्री अड़ बैठता है। अरोड़ा लिया नहीं पड़ता। परन्तु किसान सिंह होता हुआ भी गीदड़ बन बैठा है। कभी रेवन्यू मेंबर के संकेत तो ताकता है। कभी फाइनेंस मेंबर की निगाह को भांपता है। कभी चीफ सेक्रेटरी की नजर से शगुन लेता है। ये सब बातें क्या जाहिर करती हैं, यही कि किसान शारीरिक वीरता की दृष्टि से असाधारण भले ही हो, फिर भी नैतिक वीरता का इसमें अंश भी नहीं। संभव है कोई अजीज बिगड़े कि मैंने जमींदार की कायरता को बढ़ा-चढ़ाकर चित्रित किया। परन्तु किसान को और कौंसिल के जमींदार मेंबरों को कोड़े की आवश्यकता है और मैं अपने कोड़े को कांटेदार बनाना चाहता हूं।

जमींदार को कुछ ऐसी शिक्षा दी गई है जिससे इसकी राजसिक वृत्तियां मंद पड़ गई हैं। विनम्रता, आजजी जरूरत से ज्यादा इसके अंदर आ गई है। मैं चाहता हूं कि आजजी की जगह बड़प्पन, गर्व और बेपरवाही पैदा हो जाए। हीनभावना की जगह स्वाभिमान ले ले। मैं किसान को पूरा राजा देखना चाहता हूं। इसलिए गुलामी की मनोवृत्ति इसमें से निकालना चाहता हूं। जमींदार की बेजा अनुचित विनम्रता, अनुचित सहनशीलता और बेजा संतोष की शिक्षा ने जमींदार को उत्साहहीन और नीची दृष्टि का बना दिया है। इसने अब हजारों नए खुदा पैदा कर दिए हैं। इसलिए मैं कहता हूं ‘ऐ जमींदार! पैदा करने वाले मालिक को छोड़कर किसी दूसरी हस्ती का पुजारी बन। किसी और की इबादत न कर। गुलाम न बन, मालिक बन। मकहूम न बन, हाकित बन। अगर किसी का गुलाम बनना चाहता है, तो उसका बन जो देानों, गरीबों और कमजोरों की मदद करता है। अगर किसी का खादिम (सेवक) बनना है तो उसका बन, जो खुदा के बन्दों की सेवा में व्यस्त रहता है, क्योंकि ऐसे मानव खादिम या गुलाम बनने से तेरी खुदी (स्वाभिमान) को कोई ठेस नहीं पहुंचती।’

लोग खुद-परस्ती (अपनी पूजा आप करना) को बहुत बुरा समझते हैं, इसी तरह मेरा जमींदार भाई भी बुरा समझता होगा और दिल में यह कहता होगा कि ‘आज छोटू राम को क्या हो गया है? यह क्या कहने लगा है?’ लेकिन जमींदार के अंदर दूसरे की पूजा करने की वृत्ति इस हद तक पैदा हो गई है कि इससे छुटकारा खुद-परस्ती (आपापूजा) की तालीम के सिवा और कुछ नहीं। इसलिए मैं तो इकबाल के शब्दों में यही कहूंगाः

गुलामे-हिम्मते-आं खुद परस्तम

कि बानूरे-खुदी बेनंद खुदारा

(ऐ ईश्वर के बन्दे! तू अपने साहस का स्वयं पुजारी बन जा, क्योंकि प्रकाश देने वाले स्वाभिमान से तो भगवान भी प्रसन्न रहता है)।

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Author: सर छोटू राम

जन्म: 24 नवम्बर 1881, दिल्ली-रोहतक मार्ग पर गांव गढ़ी-सांपला, रोहतक (हरियाणा-तत्कालीन पंजाब सूबा) में       चौधरी सुखीराम एवं श्रीमती सिरयां देवी के घर। 1893 में झज्जर के गांव खेड़ी जट में चौधरी नान्हा राम की सुपुत्राी ज्ञानो देवी से 5 जून को बाल विवाह। शिक्षा: प्राइमरी सांपला से 1895 में झज्जर से 1899 में, मैट्रिक, एफए, बीए सेन्ट स्टीफेन कॉलेज दिल्ली से 1899-1905। कालाकांकर में राजा के पास नौकरी 1905-1909। आगरा से वकालत 1911, जाट स्कूल रोहतक की स्थापना 1913, जाट गजहट (उर्दू साप्ताहिक) 1916, रोहतक जिला कांग्र्रेस कमेटी के प्रथम अध्यक्ष 1916-1920, सर फजले हुसैन के साथ नेशनल यूनियनिस्ट पार्टी (जमींदार लोग) की स्थापना 1923, डायरकी में मंत्राी 1924-1926, लेजिस्लेटिव काउंसिल में विरोधी दल के नेता 1926-1935 व अध्यक्ष 1936, सर की उपाधि 1937, प्रोविन्सियल अटॉनमी में मंत्री 1937-1945, किसानों द्वारा रहबरे आजम की उपाधि से 6 अप्रैल 1944 को विभूषित, भाखड़ा बांध योजना पर हस्ताक्षर 8 जनवरी 1945। निधन: शक्ति भवन (निवास), लाहौर-9 जनवरी 1945। 1923 से 1944 के बीच किसानों के हित में कर्जा बिल, मंडी बिल, बेनामी एक्ट आदि सुनहरे कानूनों के बनाने में प्रमुख भूमिका। 1944 में मोहम्मद अली जिन्ना की पंजाब में साम्प्रदायिक घुसपैठ से भरपूर टक्कर। एक मार्च 1942 को अपनी हीरक जयंती पर उन्होंने घोषणा की-‘मैं मजहब को राजनीति से दूर करके शोषित किसान वर्ग और उपेक्षित ग्रामीण समाज कीसेवा में अपना जीवन खपा रहा हूं।’ भारत विभाजन के घोर विरोधी रहे। 15 अगस्त 1944 को विभाजन के राजाजी फॉर्मुले के खिलाफ गांधी जी को ऐतिहासिक पत्र लिखा।

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