किसान का दुखड़ा – चौधरी छोटू राम

चौ. छोटूराम

चौधरी छोटू राम, अनुवाद-हरि सिंह

जमींदार अपने धंधे से, अपने विचारों से, अपने काम से, अपने व्यवहार से और अपने स्वभाव से भोलेपन की तस्वीर है। परन्तु इस मासूमियत के बावजूद उसका जीवन अत्याचारों की पोटली बना हुआ है। उसका जीवन खाली-खाली है। उसकी हालत दयनीय हो गई है। जीवन के थपेड़़ों से, ऐतिहासिक घटनाओं के चक्र ने, भिन्न-भिन्न हुकूमतों के कानूनों ने, सामाजिक बंधनों ने, राजनीतिक विचार के बहाव की दिशा ने और आर्थिक शक्तियों के प्रभाव ने जमींदार की यह दयनीय मूर्ति बना दी है। गरीब है, दीन है हीन है, पीड़ित है। आकाश के चक्रों का शिकार है। पृथ्वी और आकाश की आफतों का खिलौना है। पड़ोसियों के हंसी मजाक का निशाना है। सरकार की दया दृष्टि और मेहरबानी से खाली है। खुशी से अपरिचित है। केवल रंज तकलीफ से परिचित है।

रियाजे-दहर में ना आशनाए बजूमे इसरत हूं।

खुशी रोती है जिसको, मैं वह महरूमे-मुसर्रत हूं।।

-इकबाल

(इस जमाने में मैं खुशी की सभा से अनभिज्ञ हूं। मैं आनंद से रहित एक व्यक्ति हूं, जिसके लिए खुशी रोती रहती है।)

ज्मींदार खामोश है। वह इतना चुप है कि लगता है कि वह गूंगा है। लेकिन बावजूद इस खामोशी और बेजुबानी के इसके शरीर का एक-एक रोंगटा उसकी पीड़ा की कहानी बता रहा है।

जमींदार हिन्दोस्तान के समाज का सबसे कमाऊ पूत है, परन्तु प्रातःकाल के भोजन तक के लिए तरसता है। कैसी-कैसी सौगात पैदा करता है! दूध, दही, घी, मक्खन इसी के घर पैदा होते हैं। गुड़, शक्कर चीनी को यही बनाता है। गेहूं, चावल, मकई, बाजरा, ज्वार और सब प्रकार की दालें इसी के मेहनत का परिणाम है, जो बनारस की मंडियों की चहल-पहल बढ़ाती है। ढाका की मलमल और बनारस की गुलबदन का कच्चा मसाला पैदा करने वाला यही जमींदार है। नागोरी बैल और किसके घर पैदा होते हैं। काठियावाड़ के तेज रफ्तार घोड़ों की पैदाइश और किसके घुड़सालों में होती है? मगर दुनिया की नजरों के सामने जमींदार का चित्र चिंताओं और निराशाओं से भरा है। सब वस्तुओं का उत्पादक होकर सब चीजों से खाली। दूसरों पर निर्भर। दूसरों के मुंह की ओर ताके।

वाए नादानी! कि तू मोहताजे साकी हो गया।

मय भी तू, मीना भी तू, साकी भी तू, महफिल भी तू।।

(कितनी नासमझी है कि तू दूसरों के अधीन हो गया, जबकि शराब भी तू ही है, शराब पीने का शीशा भी तू ही है, शराब पीने वाला भी तू ही है। सब कुछ तू ही है।)

तमाम देश की मंडियां इसी के पैदा किए हुए अनाज से भरी जाती हैं। रेल गोड़ियां इधर से उधर इस खेत की पैदावार से लदी फिरती है। बड़े-बड़े जहाज अपने बोझ के लिए जमींदार के ही अहसानमंद हैं। परन्तु विडम्बना यह है कि स्वयं जमींदार को पेट भराई अन्न नहीं मिलता। दूध और घी पैदा करता है, मगर वह इतना गरीब है कि अपने बच्चों को प्रतिदिन दूध और घी नहीं दे सकता है। उसके निस्हाय बच्चे कभी-कभी तीज-त्यौहार के दिन ही इसके स्वाद से परिचित हो सकते हैं। मोटे से मोटा कपड़ा भी कुटुम्ब की सारी आवश्यकताएं पूरी करने के लिए प्राप्त नहीं होता। गरीब और बरसात तों ज्यों-त्यों करके गुजार देता है, परन्तु जब जाड़ा आता है तो बेचारे किसान के सिर पर एक संकट सवार हो जाता है। अच्छे-अच्छे लिहाफ, तोशक, तकिए, गद्दे और कम्बल तो उसे स्वप्न में दिखाई नहीं देते। यदि रात के लिए मोटे और बिना रंगे हुए कपड़ों की सौड़ (रजाई) ऊपर ओढ़ने और पुराने कपड़ों का बना हुआ था, गलियों वाला गुदड़ बिछाने को मिल जाए और दिन में खद्दर की चद्दर या दोहर ओढ़ने को प्राप्त हो सके तो जमींदार अपने को बड़ा भाग्यशाली समझता है, परन्तु इस बेचारे के कुटुम्ब के प्रत्येक सदस्य को ये वस्तुएं कहां मिलती है? सुबह शाम इसके बच्चे आग के सामने तपते हैं। दिन में सूरज महाराज का आसरा लेते हैं। किसी दीवार की आड़ में बैठ जाते हैं और धूप की तरफ मुंह मरके जाड़े से छुटकारा पाने की कोशिश करते हैं। जब सोने का समय आता है तो समझिए कि मुहिम छिड़ जाती है। कितनी कठिन समस्या है। ओढ़ने का कपड़ा अपर्याप्त है। इसलिए एक-एक चारपाई पर दो-दो, तीन-तीन सोते हैं। तंग, अंधेरे और बेंद कोठे में खांटे घालते हैं, ताकि इसमें ठंडी हवा किसी और से दाखिल न हो सके। कई बार तो नीचे बिछाने के कपड़े की कमी को इस तरह पूरा करते हैं कि नीचे जमीन पर फूंस बिछाते हैं और अमीरों के तोशक का काम देते हैं। जमीन पर ही बौल मारते हैं।

गरीब की पहुंच से दूर महलों में रहने वाले लोग जमींदार की मुसीबत का अनुमान नहीं लगा सकते हैं। जिनके भूख के दवे से कभी युद्ध नहीं करना पड़ा, जिनको शीर का नंगापन एक अफसाना सा लगता है। जो कभी बिना पैसे नहीं रहे वे क्या जाने कि बेचारा जमींदार किन बलाओं के थपेड़ों से हर समय परेशान और चिंतित रहता है! मगर ओ लाड़-प्यार और अमीरी में पले हुए अमीर लोगो! आपत्तियों से अपरिचित लखपतियो! ओ पतझड़ को न जानने वाले बुलबुलो! बेचारा जमींदार, गरीब, दहकान देहात कारहने वाला हलपति मुसीबतों के जंजीर में जकड़ा हुआ है। इसकी ईद, ईद नहीं मुर्हरम है। इसकी शब्बरात, शब्बरात नहीं, सब अच्छी चीजों से खाली रात है। इसका दशहरा उल्लास खुशी का दशहरा नहीं, चिंता व फिक्र का दशहरा है। इसकी होली रंगरलियों की होली नहीं, आंसू पीने की होली है। तुम तरह-तरह के स्वादिष्ट बढ़िया भोजन खाते हो, उधर बेचारा जमींदार लाल शक्कर और मोटे चावल के लिए शायद अपना बेल्ला गिरवी रखने के फिक्र में है। तुम कीमती और चटकीले कपड़ों में मजलूस फिरते हो और बेचारा जमींदार अपने मोटे खद्दर के कपड़ों को धोबी से धुलवाने और रंगरेज से रंगवाने की क्षमता नहीं रखता। तुम्हारी औरतें सोने के जेवरों से लद-पद गूंदनी बनी फिरती हैं, वह अपनी बीवी का एक कम कीमत वाली चांदी की टूम भी उतारने पर रजामंद करने की कोशिश में लगा हुआ है, ताकि वह त्यौहार के दिन तो अपने बच्चे का मुंह मीठा कर दे। तुम मेलों में गैसदार पानी (सोडा वाटर) चाय, कहवा और शायद विहस्की शराब से अपने बिगड़े हुए मिजाज की सेवा में व्यस्त हो, मगर गरीब जमींदार अपने बच्चे को भुनी हुई मुंगफली खरीदने के लिए पैसा दे सके तो वह खुदा का शुक्र बजा लाता है कि मेले में इसका बच्चा भी खुशी के सामान से पूर्णतः खाली नहीं रहा।

परेशानी और चिंता हर समय जमींदार के सिर पर खड़ी रहती है कभी साहूकार का तकाजा है, कभी लंबरदार की ताकीद है। साहूकार अपनी बही संभाल कर उठने भी नहीं पाता कि लंबरदार अपनी ढाल-बाछ लेकर आ टपकता है। कभी दीवानी की डिगरी इसको बेचैन करती है। कभी महकमाल के दस्तकों से इसकी तबीयत परेशान है। कभी डिग्री के इजरा में इसका मकान नीलाम हो रहा है। कभी इसकी खड़ी फसल कुर्क होती है, कभी खुद आजादी की कुर्क होती है। कभी फसल बर्बाद हो जाती है, कभी पशुओं में बीमारी फैल जहाती है, कभी फसलस पकाई पर नहीं आती, कभी पकी-पकाई फसल पर ओले पड़ जाते हैं या टिड्डी चवट कर जाती है। जब बेचने के समय अपने पास कुछ होता है, तो मंदापन सताता है और जब खरीदने के लिए दूसरों के पास जाना पड़ता है महंगाई कचूमर निकालती है। इसमें तुर्रा यह कि खरीदो तो भी हजामत खूब की जाती है और ऐसी ऊन उतारी जाती है कि क्या भेड़ की ऊन उतरती होगी। असल बात तो यह है कि संघर्ष में किसान की चमड़ी ऐसी बुरी तरह जख्मी होती है कि वे घाव मुश्किल से भरने में आते हैं।

जमींदार के चारों ओर का वातावरण स्वास्थ्य को हानि पहुंचाने वाला होता है। इसका मकान तंग हवालात जैसा है, जिसमें हवा का प्रवेश नहीं और जिसमें परेशानी रोशनी को दाखिल होने की इजाजत नहीं। वहीं खुद रहता है, वहीं इसके बाल-बच्चे रहते हैं। रसोई का धुआं भी मकान के अंदर ही चक्कर काटता है। जाडे में तमाम पशु भी उसी मकान के अंदर बांधने पड़ते हैं, जहां पर जमींदार और इसके बाल-बच्चे सोते हैं। रात को मकान के द्वार बंद कर दिया जाता है। पशु और गोबर भी इसी बंद मकान के अंदर बदबू पैदा करता रहता है और आदमी तथा पशु के मांस से भी अंदर की हवा दूषित होती रहती है। गर्मी के मौसम में दूध देने वाले पशु दिन का काफी हिस्सा मकान के अंदर गुजारते हैं। गलियों के साफ करने का कोई प्रबंध नहीं है।  जगह-जगह गोबर व पेशाब की बदबू उठती रहती है। घरों का मैला-कुचला पानी भी गलियों में फैंक दिया जाता है। वर्षा ऋतु में गांव की गलियां इतनी गंदी रहती हैं कि इनमें से गुजरना आंख और नाक के लिए इतना ही नागवार बदमजा होता है, जितना कि पांवों के लिए कठिन होता है। गांव से निकलते ही स्थान-स्थान पर गड्ढे होते हैं, जिनमें खड़ा पानी सड़ता रहता है और ये गड्ढे मच्छरों की नस्ल बढ़ाने का खूब काम देते हैं। आबादी के निकट ही कच्चे तालाब होते हैं, जिनको जोहड़ कहते हैं। वर्षा ऋतु में तमाम गंदा पानी आसानी से इन जोहड़ों में इक्ट्ठा हो जाता है। इन्हीं में लोग नहाते हैं। इन्हीं में कपड़े साफ करते हैं। इन्हीं में पशुओं को पानी पिलाते हैं। इन्हीं में ही भैंसों और घोड़ों को नहलाया जाता है और बारह महीने इन्हीं का पानी पीने के अलावा अन्य तमाम घरेलू कामों जैसा आटा गूंदना, दाल पकाना आदि के लिए प्रयोग में लाया जाता है। काम में प्रयोग होने वाले पानी को गंदा होने से बचाने का कोई प्रबंध नहीं होता है।

ऐन आबादी से मिलती हुई कुरड़ियां (खाद के ढेर) गंदगी पैदा करती हैं। चमड़ा साफ करने और रंगने के स्थान भी गांव से दूर नहीं होते और सनी को सड़ाने के जोहड़ भी करीब ही होते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए बड़े खतरनाक हैं। यदि जमींदार बीमार कम होता है तो इसके केवल दो कारण हैं। एक यह कि खेतों की हवा पूर्णरूप से साफ होती है और किसान का तीन चैथाई समय घर बाहर खेतों में व्यतीत होता है। दूसरा कारण यह कि प्रायः लोग पाचन-शक्ति के खराब होने से पैदा होते हैं, परन्तु किसान का नफीस और कठिनाई से हजम होने वाला भोजन तो दूर, साधारण रूखा भोजन भी कठिनाई से मिलता है। इसलिए यह इन तमाम बीमारियों से सुरक्षित रहता है, जो भारी, नफीस, स्वादिष्ट या आवश्यकता से अधिक खाए हुए भोजन से होती है। सत्य तो यह है कि जिसको भूख की बीमारी हो, पेट भर अन्न न मिलता हो, वह फैलने वाले व्यापक रोगों (महामारियों) को छोड़कर बाकी करीब-करीब सब रोगों के प्रभाव से सुरक्षित रहता है।

यदि अति वर्षा और मच्छरों के अधिक होने से मलेरिया या बुखार फैल जाए या कपड़े की कमी के कारण सर्दी लगने से किसान के कुटुम्ब का कोई सदस्य निमोनिया के रोग से पीड़ित हो जाए या कोई संक्रामक फूट पड़े तो किसान की बेबसी की हालत देखने योग्य है। दो चार दिन तो किसी को घटना का ध्यान नहीं आता कि वह सदस्य बीमार है। जब रोग के बढ़ने से रोगी चलने-फिरने में असमर्थ हो जाता है और उसका खाना-पीना छूट जाता है तब उसके बीमार होने पर विश्वास होता है। परन्तु आमतौर पर इलाज कुदरत पर छोड़ दिया जाता है। जो नीम हकीम खतरा जान, वैद्य गांव में रहते हैं, उनके नुसखोजत पर अमल किया जाता है। गांव में कोई ‘सयाना’ (सिद्ध) या गंडे ताबीज बनाने वाला मौजूद हो तो उसके हुक्म की तामील होती है। असली और प्रभावकारी इलाज गरीब किसान की पहुंच से बाहर है। गांव में कोई अस्पताल नहीं। कोस दो कोस के अंदर कोई सफाखाना नहीं। नई सभ्यता, नया जमाना, और नई रोशनी अलग से उसके गले में मुसीबतों का हार डाल रहे हैं। कोई डाक्टर अगाऊ फीस लिए बिना आने को तैयार नहीं। सरकार से वेतन लेने वाला और किसान की लहू पसीने की कमाई से भरे हुए सरकारी खजाने से पलने वाला डाक्टर भी फीस मांगता है, सवारी मांगता है। जमींदार में फीस देने की ताकत नहीं और छकड़े के सिवाय या अपने मरियल टट्टू के अतिरिक्त और कोई सवारी का प्रबंध करने की शक्ति नहीं। छकड़े में बैठने से डाक्टर साहब की शान में फरक पड़ने का डर है और घोड़े की सवारी से अनभिज्ञ है। इसलिए मरीज बेचारा चारपाई पर पड़ा-पड़ा कराहता रहता है। अगर प्रकृति सहायता करे और मृत्यु पिंड छोड़ दे, तो छकड़े में सवार कराके अस्पताल पहुंचाता है। घंटों प्रतीक्षा करनी पड़ती है। दसों बार डाक्टर को सलाम करना पड़ता है। लेकिन यह मिश्र के अहंकारी बादशाह फरहून की तरह उसकी ओर नजर उठाकर भी नहीं देखता। मैले-कुचैले कपड़ों वाले मरीज से फीस की क्या आशा? बीसवीं सदी में कर्तव्य पालन का यह ऊंचा स्तर है। डाक्टर साहब को इस गरीब किसान की ओर ध्यान देने की क्या जरूरत है? कोई थानेदार हो, तहसीलदार हो, डिप्टी हो और कुछ नहीं तो कस्बे का कोई साहूकार हो, जिसमें कम अज कम कभी कभार मोटर या बग्गी की आशा तो हो सके, तो डाक्टर साहब कुछ ख्याल करें। इस नंगधडंग, असभ्य और निर्धन व्यक्ति की ओर कोई क्यों निगाह उठाकर देखे? अंत में कम्पोडर की सिफारिश पर डाक्टर साहब इसकी ओर ध्यान देने की कृपा करते हैं। ऐसी बेरुखी और असावधानी से रोगी को देखते हैं और ऐसे आधे दिल से नुस्खा लिखते हैं कि रोगी का दिल दोबारा अस्पताल जाने को नहीं करता। किस्सा कोताह यह कि ईलाज की सुविधाओं का अभाव और डाक्टरों की असावधानी, लालच और बेरुखी के कारण सैंकड़ों, हजारों देहाती जमींदार इलाज करने योग्य रोगों से मर जाते हैं।

जमींदार कौम की शिकायतों का दफ्तर भरपूर है। इसके कष्ट अनगिनत हैं। इसकी चिंताएं असीमित हैं और इसके दुखों का सिलसिला अटूट है। खुदा कहर, आकाश से आपत्तियों की वर्षा, प्रकृति का प्रकोप, सरकार की बेरुखी, साहूकार की पत्थरदिली, विलासी अफसरों की क्रूरता, इसके अपने मार्गदर्शन की कर्तव्यहीनता और जमींदार स्वयं अपनी ओर असावधानी और अज्ञानता के ऐसे कारण हैं, जो इसके विनाश, तबाही, बरबादी के सिलसिले को टूटने नहीं देते। प्रत्येक क्षण चिंताओं से इसकी छाती फटती रहती है, हृदय घायल होता रहता है, जी जलता रहता है। इसके दुख की कहानी लंबी, दर्दनाक और मार्मिक है। लेकिन क्या कहूं और किसको सुनाऊं? कोई इसकी पूछ करने वाला नहीं। कोई इसका हितैषी नहीं। कोई इसका साथी नहीं। कोई इसकी प्रार्थना सुनने वाला नहीं। कोई इसकी शिकायत पर कान धरने को तैयार नहीं। बेसाखता अपने-आप यही जबान से निकलता है:

इस कौम का इलाही दुखड़ा किसे सुनाऊं?

डर है कि इसके गम में घुल-घुल के मर न जाऊं।।

Avatar photo

Author: सर छोटू राम

जन्म: 24 नवम्बर 1881, दिल्ली-रोहतक मार्ग पर गांव गढ़ी-सांपला, रोहतक (हरियाणा-तत्कालीन पंजाब सूबा) में       चौधरी सुखीराम एवं श्रीमती सिरयां देवी के घर। 1893 में झज्जर के गांव खेड़ी जट में चौधरी नान्हा राम की सुपुत्राी ज्ञानो देवी से 5 जून को बाल विवाह। शिक्षा: प्राइमरी सांपला से 1895 में झज्जर से 1899 में, मैट्रिक, एफए, बीए सेन्ट स्टीफेन कॉलेज दिल्ली से 1899-1905। कालाकांकर में राजा के पास नौकरी 1905-1909। आगरा से वकालत 1911, जाट स्कूल रोहतक की स्थापना 1913, जाट गजहट (उर्दू साप्ताहिक) 1916, रोहतक जिला कांग्र्रेस कमेटी के प्रथम अध्यक्ष 1916-1920, सर फजले हुसैन के साथ नेशनल यूनियनिस्ट पार्टी (जमींदार लोग) की स्थापना 1923, डायरकी में मंत्राी 1924-1926, लेजिस्लेटिव काउंसिल में विरोधी दल के नेता 1926-1935 व अध्यक्ष 1936, सर की उपाधि 1937, प्रोविन्सियल अटॉनमी में मंत्री 1937-1945, किसानों द्वारा रहबरे आजम की उपाधि से 6 अप्रैल 1944 को विभूषित, भाखड़ा बांध योजना पर हस्ताक्षर 8 जनवरी 1945। निधन: शक्ति भवन (निवास), लाहौर-9 जनवरी 1945। 1923 से 1944 के बीच किसानों के हित में कर्जा बिल, मंडी बिल, बेनामी एक्ट आदि सुनहरे कानूनों के बनाने में प्रमुख भूमिका। 1944 में मोहम्मद अली जिन्ना की पंजाब में साम्प्रदायिक घुसपैठ से भरपूर टक्कर। एक मार्च 1942 को अपनी हीरक जयंती पर उन्होंने घोषणा की-‘मैं मजहब को राजनीति से दूर करके शोषित किसान वर्ग और उपेक्षित ग्रामीण समाज कीसेवा में अपना जीवन खपा रहा हूं।’ भारत विभाजन के घोर विरोधी रहे। 15 अगस्त 1944 को विभाजन के राजाजी फॉर्मुले के खिलाफ गांधी जी को ऐतिहासिक पत्र लिखा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *