जिन्दगी का मरकज – चौधरी छोटू राम

चौ. छोटूराम

चौधरी छोटू राम, अनुवाद-हरि सिंह

आज का मजमून इस सिलसिले का नौवां और अंतिम लेख होगा। यदि इस सिलसिले से जमींदार वर्ग अथवा किसानों में कोई स्थाई हरकत पैदा हो गई हो तो मैं समझंूगा, मेरा परिश्रम सफल हो गया। यदि किसानों में कोई हरकत पैदा न हो सकी, तो फिर किसी अन्य शस्त्र से किसानों के रूढ़ीवाद और जड़ता पर आक्रमण करूंगा। निराश होकर बैठा रहना, हिम्मत हारना, या साहस छोड़ना मेरे असूलों के खिलाफ है। एक बार की असफलता केवल यह सिद्ध करती है कि पर्याप्त प्रयत्न नहीं किया गया असैर अधिक जोर लगाने की जरूरत है। जब तक मनुष्य जीवित रहे, प्रयत्न और पुरुषार्थ करते रहना इसका कर्तव्य है। प्रयत्न का फल और अमन का बदला कब मिले और किस रूप् में मिले यह मालिक दो जहान भगवान की इच्छा पर छोड़ दे।

मैं यह खूब जानता हूं कि किसान कुंभकरण की नींद सोया हुआ है। इलाका हरियाणा में करीब बीस वर्ष से पंजाब में छह-सात वर्ष से मैं किसान को जगाने की कोशिश में लगा हुआ हूं। कभी पांवों के तलवे में गुदगुदी करता हूं। कभी छाती में चुटकी लेता हूं। कभी कंधा पकड़कर झंझोड़ता हूं। कभी मुंह पर ठंडे पानी के छींटे मारता हूं। किसान आंख खोलता है। करवट बदलता है। अंगड़ाई लेता है, लेकिन जंभाई लेकर फिर सो जाता है। बात यह है कि किसान की नींद से लाभ उठाने वाली जमायतें एक ऐसी गैस अपने पास रखती हैं कि किसान को तुरंत मूर्छित कर देती हैं। ज्योंही किसान कोई हरकत करता दिखाई देता है ये जमायतें तुरंत गैस का फव्वारा छोड़ती हैं। जिसमें किसान की नींद खुलते फिर रुक जाती है और कभी-कभार पहले से अधिक गहरी हो जाती है, लेकिन ये दुनिया उम्मीद पर कायम है, वाले कथन पर अमल करता हुआ किसान की दर्दभरी कहानी का अंतिम भाग सुनाता हूं। संभव है परमात्मा इस प्रयत्न में बरकत दे और किसान उठ बैठे, निद्रा त्यागे।

सरकार का यह अधिकार है कि वह प्रशासन चलाने के लिए प्रजा से टैक्स वसूल करे। मुझे सरकार के इस अधिकार में कोई आपत्ति नहीं। परन्तु इस अधिकार के साथ-साथ सरकार का कर्तव्य है कि अपनी प्रजा के साथ एक समान बराबर का सलूक करे। एक तबके और दूसरे तबके के बीच किसी प्रकार का भेदभाव न बरते। किसान कहता है ‘सरकार मेहरबानी फरमाकर मेरी जमीन का आबपाशी के लिए नहर निकाले, क्योंकि मैं ऐसे इलाके में पैदा हूं जहां वर्षा अपर्याप्त और अनिश्चित है। जहां सिंचाई के लिए कुएं का पानी बहुत गहरा और आमतौर पर खारा है। मेरा जीवन नहर के पानी से बच सकता है और कोई सूरत बचने की नहीं बनती।’ सरकार कहती है, ‘नहर तो हम निकाल देंगे, लेकिन उस समय तक पैसा लगाने के लिए तैयार नहीं, जब तक कि हमें यकीन न हो कि इस नहर में लगी हमें पूंजी से उचित सूद की आय हो जाएगी। अगर और कुछ नहीं तो मामूली खर्चे जैसे मुरम्मत व कर्मचारियों के वेतन के अतिरिक्त कम से कम सूद जरूर वसूल हो जानी चाहिए।’

साधारण स्थिति में शायद ऐसे सिद्धांत पर कोई आपत्ति न की जा सके। परन्तु यदि वास्तव में हालात ऐसे हों न कि किसान की जान होठों पर हो, बचने की और कोई सूरत न हो, तो प्रजा की रक्षा और पालन के लिए भी तो सरकार रुपया खर्च करती है और क्या कारण है कि शहरी आबादी के बारे में ऐसी शर्त नहीं लगाई जाती? शहरी आबादी का तो सुविधाएं, दिमागी और शारीरिक स्वास्थ्य के साधन उत्पन्न करने के लिए भी जमानत नहीं मांगी जाती कि जब तक पूंजी पर सूद वसूल होने की उम्मीद न होगी तो हम इन चीजों पर एक पैसा खर्च करने के लिए तैयार नहीं। फिर किसान से यह जमानत क्यों मांगी जाती है?

लाहौर में गवर्नमेंट कालेज खोला, तब क्या शहर वालों को यह गारंटी दी थी कि जो सरमाया इस पर खर्च होगा, उस पर उचित ब्याज वसूल होना चाहिए? क्या जब सरकार ने लाहौर में गवर्नमेंट मेडिकल कालेज खोला, उस समय कोई ऐसी गारंटी तलब की थी? लाहौर में मयो अस्पताल, एचीसन अस्पताल, संक्रामक रोगों का अस्पताल है। क्या इन अस्पतालों के बनाने के पहले गवर्नमेंट ने किसी गारंटी की मांग की थी? हरगिज नहीं। संभव है गवर्नमेंट के समर्थक यह कहें कि जिन चीजों का मैंने जिक्र किया है वे जन-कल्याण की चीजें हैं। परन्तु हर सख्स को यह मानना पड़ेगा कि नहर भी एक बड़े पैमाने पर सार्वजनिक लाभ का काम है। कालेज केवल दिमागी तरक्की के सामान पैदा करता है। अस्पताल बीमारों की सेहत को ठीक करता है, लेकिन नहर कई बार एक इलाके की जान बचाने के लिए जरूरी होती है। ऐसी हालत में सूद की गारंटी क्यों मांगी जाती है? पहले जिंदगी जरूरी है। सेहत और दिमागी तरक्की की जरूरत बाद में होती है, लेकिन यह बात बिल्कुल सही है कि जब गवर्नमेंट सेहत और दिमागी तरक्की की खातिर कोई पूंजी लगाती है तो पूंजी के सूद की वसूली का कोई ख्याल नहीं होता। लेकिन जब कहत के विनाश से प्रजा को बचाने के लिए नहर पर रुपया खर्च करने का प्रश्न हो तो गवर्नमेंट को व्यर्थ में सूद की चिंता हो जाती है।

सरकारी नौकरी का प्रश्न भी अहम प्रश्न है। सरकारी नौकरी न केवल जीविका कमाने का एक सर्वश्रेष्ठ साधन है, बल्कि इसके एक साथ बड़ी इज्जत और स्टेटस जुड़ा हुआ है जिनमें हिस्सा पाने का अधिकार प्रत्येक जमायत को हासिल है। इसके अतिरिक्त सरकारी नौकरी, ताकत, सत्ता, अधिकार का भी स्रोत है और जो शक्ति इज्जत और अधिकार नौकरी के साथ हासिल होते हैं, वह अपने साथियों हमवतनों और हमकौमों की सेवा करने का एक बहुत मूल्यवान अवसर प्रदान करते हैं। कई बार लोग नाक चढ़ा कर कहते हैं कि नौकरी तो एक गुलामी है और इसका लालच करने वाले दास वृृत्ति को प्रकट करते हैं, लेकिन इनका नाम चढ़ाना एक बनावटी काम है। जब इनको अपने प्रियजनों की नौकरी की जरूरत पड़ती है तो यही नाक चढ़ाने वाले लोग अफसरों के पीछे मारे-मारे फिरा करतेे हैं और इन अफसरों की ऐसी लज्जाजनक चापलूसी करते हैं कि किसान तो ऐसी शर्मनाक चापलूसी करने की सोच भी नहीं सकता।

सरकारी कर्मचारियों के वेतन में वर्ष भर में दो-तीन करोड़ रुपया खर्च होता है। यह कोई छोटी रकम नहीं है। जब किसानों की जेब से प्रांतीय करों का अस्सी-पचासी प्रतिशत निकलता है तो कोई कारण नहीं कि दो-तीन करोड़ रुपए में भी इसका इसी कदर हिस्सा न हो, लेकिन चंद विशेष विभागों को छोड़कर बाकी तमाम महकमों में किसान अपने उचित भाग से खाली दिखाई देता है। लोक निर्माण विभाग की इस शाख्खा को लीजिए। गैर-जमींदार के कब्जे में है। महकमा डाक्टरी के आंकड़ों पर ध्यान लीजिए। किसान खाल-खाल भी दिखाई नपहीं देते। शिक्षा विभाग गैर जमींदारों से पटा पड़ा है। सिविल जुडीशियल विभाग पर गैर-जमींदार बुरी तरह छाए हुए हैं। महकमा पुलिस के अफसरी ढांचे में भी गैर-जमींदारों का तत्व प्रधान है। महकमा आबकारी में इन्हीं की तूती बोल रही है। सदर के तमाम सक्रेटरियेट गैर-जमींदारों से भरा पड़ा है। विभागों के बड़े अफसरों के दफ्तरों में भी इन्हीं का राज है। किसी कमीश्नर का दफ्तर देख लें। गैर-जमींदारों का गलबा मिलेगा। किसी डिप्टी कमीश्नर की सूची पर नजर डालो। वहां भी गैर-जमींदारा हावी मिलेंगे। डिस्ट्रिक्ट व सेसन जनों के दफ्तर गोया उत्तराधिकार में इन लोगों को मिला हुआ है और किसान ऐेसे दफ्तरों के लिए गोया अछूत है।

अक्तूबर 1919 में गवर्नमेंट ने एक प्रस्ताव पास किया था जिसकी रू से करीब-करीब हर एक महकमे की नौकरियों में किसान का हिस्सा निश्चित किया गया था। इस प्रस्ताव को चैदह वर्ष होने को आए, लेकिन इस रेजूलेशन के असली उद्देश्य की पूर्ति के मार्ग में गैर-जमींदार एक सद्देसिकंद्री (भारी रुकावट) बने हुए हैं। कोेंसिल में बहुतेरा जोर मारते हैं, सवाल पूछते हैं, रेजोलूशन की तहरीक कहते हैं, कमी की तहरीक पेश करते हैं, परन्तु सब व्यर्थ। दो बार सब-जजों में हिन्दू किसान की कमी के संबंध में गवर्नमेंट के खिलाफ इजहार मलामत की तहरीकें पास हो चुकीं। हाईकोर्ट की न्यायप्रियता और योग्यता की पहचान की धज्जियां उड़ाई जा चुकी। ‘लेकिन पंचों का कहना सिर माथे पर, मगर परनाला यही रहेगा’ वाला मामला ही निकलता है। यदि कोई ऐसा रियायती सर्कुलर गैर-जमींदारों के पक्ष में कहीं जारी हो जाए, तो दस वर्ष का काम एक वर्ष में हो जाएगा। किसानों का एक वर्ष का काम पांच वर्ष में भी न होता है। इस देरी के कारण मैंने गिना दिए हैं।

गवर्नर साहब, गवर्नर साहब की एकजेक्टिव कोंसिल के मेंबर, दोनों जमींदार वजीर, तमाम सक्रेटरी और अक्सर महकमाजात के उच्च अधिकारी जमींदारों के साथ सहानुभूति प्रकट करते हैं, परन्तु यह सहानुभूति केवल शब्दों तक ही सीमित है। अमली रूप धारण नहीं करती। वर्तमान सरकार को किसी ने दफ्तरशाही का नाम बहुत उचित दिया है। इसमें जो कुछ होता है वह दफ्तरों किए से होता है और दफ्तरों में चूंकि गैर-जमींदारों का बड़ा भारी जोर है, इसलिए गवर्नर एग्जैक्टिव कोंसिल के सदस्यों, मिनिस्टरों और महकमाजात के उच्च अधिकारियों की सहानुभूति पानी पर लकीर की तरह तुरंत मिट जाती है।

लेकिन अब तक जो हुआ, वह अफसोस के काबिल ही है, आगे जो होता नज आता है वह और भी ज्यादा काबिले अफसोस होगा। हमारी सरकार को मुकाबले की परीक्षा का बड़ा खबत है और मुकाबले के इम्तिहान में केवल वे विषय होते हैं, जिनमें गैर-जमींदार ही अधिक अंक हासिल कर सकते हैं। इसलिए अब इंडियन सिविल सर्विस गैर-जमींदार से भरी जा रही है। दस वर्ष बाद पंजाब के 29 जिलों में से 20 में गैर-जमींदार डिप्टी कमीश्नर होंगे और अगर यह स्थिति हो गई तो फिर दूसरी नौकरियों में भी किसानों का हिस्सा ज्यादा होने की जगह कम होने लगेगा, क्योंकि सिफारिश करने वाले यही डिप्टी कमीशनर होंगे। यदि सरकार की इस समस्या के इलाज की कोई इच्छा है तो या तो मुकाबले की परीक्षा बंद होनी चाहिए या मुकाबले के इम्तिहान में दो या तीन विषय ऐसे होने चाहिए, जिन पर मुकाबलों की परीक्षाओं में भाग लेने वालों के उन गुणों की जांच हो सके जो इंडियन सिविल सर्विस के एक अफसर में होनी चाहिए। यदि अंधेरी रात में दस बीस मील पैदल अकेला सफर एक विषय तजबीज कर दिया जाए तो अनुचित न होगा।

परन्तु मैं किसानों से प्रश्न पूछता हूं कि मैंने उनकी ओर से ये रोने तो रो दिए। मैंने उनको मौन पथ को छोड़ शिकवा-शिकायत का तरीका अपनाने के लिए जोर दिया है। लेकिन केवल इस शिकवा-शिकायत से तो कोई काम नहीं बनता। मैं तो उनको डा. इकबाल वाला सुझाव पेश करता हूं।

नाला ओ फरियाद मातम ता कुजा?

सीना कोवीहाए पैहम ता कुजा।

दर अमल पोशीदा मजमूने-हयात।

लज्जते तखलीके कानूने हयात।।

(दुहाई-देना कब तक काम देगी? बार-बार छाती पीटना कब तक चलेगा? जिंदगी का असल मजमून तो अमल के अंदर छुपा हुआ है और जिंदगी का असली कानून नई-नई रचना करने के स्वाद के साथ बंधा हुआ है।)

किसान को चाहिए कि सक्रिय हो जाए, डटकर पुरुषार्थ करे और कोई ऐसा नया रास्ता निकाले, जिससे इसको अपनी मौजूदा मुसीबतों और कष्टों से मुक्ति मिल सके। वह सूरत एक ही है कि किसान पूरी लगन के साथ संगठन शुरू करे और अपने संगठन को बाकी सब कामों पर प्राथमिकता दे, संगठन को सब चीजों से महत्वपूर्ण समझे। इस कलयुग में संगठन ही शक्ति है। मेरे भाई किसान! समझले कि कांग्रेस, मुस्लिम लीग, सिख लीग, चीज खालसा दीवान और हिन्दू सभा सब शहरियों के चोंचले हैं। इनको शहरियों पर छोड़, जमींदार लीग के अंददर नई रूह फूंक दे। अपने अंदर नया और ताजा जीवन का संचार कर। मजहब को मस्जिद, मंदिर और गुरुद्वारों में बंद कर दो। मौलवियों, पंडितों और ज्ञानियों से अपना पीछा छुड़ा लो। पांचों वक्त की नमाज पढ़ो और रोजा रखो। दान-जकात दो। गुरु ग्रंथ साहिब जी का पाठ करो, जपजी पढ़ो, वेद पढ़ो, गीता पढ़ो, संध्या करो, आरती करो। लेकिन मजहब को पोलिटिक्स (राजनीति) के दायरे से बाहर कर दो। पंजाब की राजनीति में तमाम जमींदार बिना लिहाज मजहब बड़ी आसानी के साथ और बड़े कुदरती तौर से एक प्लेटफार्म पर आ सकते हैं, परन्तु शर्त यह हैं कि वे मौलवियों, पंडितों, ग्रंथियों के क्लोरोफार्म से अपने-आप को बचाए रखें।

गवर्नमेेंट और गैर जमींदार से भी मैं चंद शब्द अर्ज कर दूं।

पंजाब की तमाम आर्थिक और राजनीतिक जीवन की धुरी किसान हैं। इसकी भलाई सबकासे अपने दिल में सर्वप्रथम रखनी चाहिए। यदि किसान खुशहाल है तो सब खुशहाल हैं। अगर किसान दुर्दशा में है, तो सबका बुरा हाल है। अगर किसान बचता है तो सब बच सकते हैं। यदि किसान तबाह होता है, तो उसकी तबाही में सबकी तबाही है। किसान सबसे पूरी सच्चाई के साथ इकबाल के शब्दों में खिताब कर सकता है:

मेरा रोन नहीं, रोना है सारे गुलसितां का।

वह गुल हूं मैं, खिजां हर गुल की है गोया खिजां मेरी।।

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Author: सर छोटू राम

जन्म: 24 नवम्बर 1881, दिल्ली-रोहतक मार्ग पर गांव गढ़ी-सांपला, रोहतक (हरियाणा-तत्कालीन पंजाब सूबा) में       चौधरी सुखीराम एवं श्रीमती सिरयां देवी के घर। 1893 में झज्जर के गांव खेड़ी जट में चौधरी नान्हा राम की सुपुत्राी ज्ञानो देवी से 5 जून को बाल विवाह। शिक्षा: प्राइमरी सांपला से 1895 में झज्जर से 1899 में, मैट्रिक, एफए, बीए सेन्ट स्टीफेन कॉलेज दिल्ली से 1899-1905। कालाकांकर में राजा के पास नौकरी 1905-1909। आगरा से वकालत 1911, जाट स्कूल रोहतक की स्थापना 1913, जाट गजहट (उर्दू साप्ताहिक) 1916, रोहतक जिला कांग्र्रेस कमेटी के प्रथम अध्यक्ष 1916-1920, सर फजले हुसैन के साथ नेशनल यूनियनिस्ट पार्टी (जमींदार लोग) की स्थापना 1923, डायरकी में मंत्राी 1924-1926, लेजिस्लेटिव काउंसिल में विरोधी दल के नेता 1926-1935 व अध्यक्ष 1936, सर की उपाधि 1937, प्रोविन्सियल अटॉनमी में मंत्री 1937-1945, किसानों द्वारा रहबरे आजम की उपाधि से 6 अप्रैल 1944 को विभूषित, भाखड़ा बांध योजना पर हस्ताक्षर 8 जनवरी 1945। निधन: शक्ति भवन (निवास), लाहौर-9 जनवरी 1945। 1923 से 1944 के बीच किसानों के हित में कर्जा बिल, मंडी बिल, बेनामी एक्ट आदि सुनहरे कानूनों के बनाने में प्रमुख भूमिका। 1944 में मोहम्मद अली जिन्ना की पंजाब में साम्प्रदायिक घुसपैठ से भरपूर टक्कर। एक मार्च 1942 को अपनी हीरक जयंती पर उन्होंने घोषणा की-‘मैं मजहब को राजनीति से दूर करके शोषित किसान वर्ग और उपेक्षित ग्रामीण समाज कीसेवा में अपना जीवन खपा रहा हूं।’ भारत विभाजन के घोर विरोधी रहे। 15 अगस्त 1944 को विभाजन के राजाजी फॉर्मुले के खिलाफ गांधी जी को ऐतिहासिक पत्र लिखा।

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