राम लगती बात – चौधरी छोटू राम

चौधरी छोटू राम, अनुवाद-हरि सिंह

किसान कहता है कि मैं सरकार की रईयत हूं। मुझे सरकार को टैक्स देने में कोई आपत्ति नहीं। मेरे हिस्से का जो बोझ है, मैं उसको उठाने को तैयार हूं। जिस हिसाब से, जिस तरीके पर जो जिस असूल पर दूसरों के जिम्मे आयकर लगाया हुआ है, इसी हिसाब से, इसी तरीके पर और इसी सिद्धांत पर मेरे जिम्मे कर लगा दिया जाए। सरकार कहती है, ‘नहीं। तेरे साथ दूसरे प्रकार का सलूक बरता जाएगा, क्योंकि तू हमारी जमीन का किराएदार है।’

गैर-जमींदार की दलील है कि सरकार जो बात कहती है वह बिल्कुल सच्ची है और असूल की बात है। आखिर जो दुकानदार किराए पर दुकान लेकर बैठता है, वह भी किराया देता है। किसान उत्तर देता है, सरकार दौलतमंद गुस्ताखी माफ। मगर तुम यह तो फरमाइए कि जमीन आपकी कैसे और हम किराएदार किस तरह? हम तो हजारों पीढ़ियों से यहां आबाद चले आ रहे हैं। जब कम्पनी का राज हुआ, उस समय हम यहीं मौजूद थे। बाबर बादशाह आया। उस समय हम इसी पवित्र भूमि पर मौजूद थे। मुहम्मद गजनवी और शहाबुद्दीन गौरी के लश्कर इस पांच नदियों के प्रदेश से गुजरे तो भी हमारे बुजुर्गों का हल इसी भूमि पर चला करता था।

अनंग पाल, पृथ्वी राज, राजा भोज, बाहन, विक्रमाजीत, चन्द्रगुप्त, अशोक, कौरव-पांडव, कृष्ण और राम सब आए और चले गए। हमारे पूर्वज और हमारे बुर्जमन उस समय भी जमीन के मालिक थे। भला यह क्यों जबरदस्ती है जो अब हमें किराएदार का दर्जा दिया जाता है? सरकार कहती है, तू इन बातों को समझता नहीं। तू अपने ही देश वाले कुछ रईसों से तो पूछ कर देख, वह भी यही कहेंगे।

किसान अपने जमींदार भाई से कहता है, ‘बड़े भाई, यह जो दुकान का हवाला देता है, यह तो बिल्कुल झूठी बात है। हम जानते हैं कि दुकान की जमीन दूसरे की है। हम जानते हैं कि दुकान का सामान दूसरे का है। हम जानते हैं कि दुकान का निर्माण दूसरे ने किया है। हम जानते हैं कि मजदूरी, ध्यानगी, माल-मलवा दूसरे का है। किराएदार का इसमें कसे किसी चीज पर दखल नहीं है। मालिक मकान और किराएदार की मिसाल सरकार ने हमारे ऊपर कैसे घटा दी? हमारी जमीन तो सदा से हमारे पास चली आती है। कभी सरकार का कोई मुनीम, कोई गुमाश्ता, कोई कारिंदा कर्मचारी हमारी जमीन पर तूने कभी देखा? सच बता तेरे बाप-दादा ने सात पीढ़ियों तक सरकार का कोई संबंध हमारी जमीन से देखा? तो सरकार ऐसे निराधार दावे को कैसे न्याय और सिद्धांत के अनुसार बयान करती है? कांग्रेस के प्लेटफार्म से, हिन्दू सभा के प्लेटफार्म से और समाचार पत्रों में तो तू और तेरे सारे भाई जमींदारों के साथ बड़ी सहानुभूति प्रकट करते हैं। जवाब में गैर जमींदार कहता है, भाई देख, इसमें इंसाफ-विनसाफ का कोई झगड़ा नहीं है। मैं तो एक सिद्धांत को मानता हूं। व्यापार की बात भी यही है। यदि मुझ पर कुछ बोझ पड़े बिना तेरा भला होता हो, तो मुझे कोई आपत्ति नहीं। परन्तु तेरा बोझ हल्का करने के लिए सरकार कुछ मुझ पर बोझ डालना चाहे तो यह मुझे स्वीकार नहीं। फिर सरकार जो कुछ करती है, वह ठीक है।

किसान बहुतेरा कहता है, भले मानस, अभी तो किसी दूसरों के कंधे पर बोझ डालने का जिक्र नहीं है। यह तो तू अपनी जबान से कह दे कि किसान के साथ जो सलूक इस समय हो रहा है, वह न्याय से दूर है। यह तो राम लगती बात है। इसको तो मानना ही चाहिए। गैर-जमींदार झट कहता है-देखा भाई व्यापारी आदमी के साथ सुलटना कोई मुश्किल बात नहीं है। तू व्यापारी आदमी नहीं, तू व्यापार को समझता नहीं। व्यापार तेरी आदत में नहीं। तुझसे मैं कैसे सुलटूं? जिस बात को कहने से अपने-आप को चोट लगती हो वह राम लगती बात नहीं होती। अगर इस प्रकार राम लगती बातें मानने लगें तो गोरी का मांस चुटकियों में उड़ जाए। तू मुझे यह बात बता दे कि किसानों को बोझ हल्का करने से घाटा पड़ेगा, उसे पूरा करने के लिए रुपया कहां से आवेगा?

उदाहरण एक हजार रुपए तक की आय बिल्कुल माफ है। दो हजार तक की आय पर प्रति रुपया चार पाई आयकर देना पड़ता है। दो हजार से पांच हजार तक की आय पर प्रति रुपया 6 पाई टैक्स देना पड़ता है। गरजेकि दूसरे धंधोंवाली हालत में अधिक आय वालों को अधिक दर से टैक्स देना पड़ता है और कम आय वालों पर यह दर कम होती चली जाती है। यहां तक कि एक हजार रुपए पर कोई टैक्स नहीं देना पड़ता। लेकिन किसान की हालत में सबको एक ही लाठी से हांका जाता है। जो पांच हजार एकड़ जमीन का मालिक है और दस हजार रुपए की वार्षिक आय रखता है, उसको भी प्रति एकड़ दो रुपया अदा करना पड़ता है और जो पांच एकड़ जमीन का मालिक है और सिर्फ बीस, तीस, पचास रुपए इससे कमाता है, उसको भी दो रुपया एकड़ की दर से मामला देना पड़ता है। क्या एक लाठी से सबको हांका जाता है।

एक और तमाशे की बात है। जिसकी जानकारी गैर-जमींदारी में तो शायद ही किसी को हो और किसानों में बहुत से आदमियों को नहीं होगी। आय-कर देने वालों में यदि एक व्यक्ति वर्ष पांच हजार रुपए कमाता है, तो उसको पांच हजार पर ही कर देना होगा। फर्ज करो, अगले वर्ष इसकी आय केवल एक हजार रुपए रह जाती है तो वह किसी रकम के अदा करने का जिम्मेदार नहीं। अगर इससे अगले वर्ष को पुनः दस हजार रुपए आए होगी तो फिर वह दस हजार रुपए पर कर देगा। लेकिन बीच वाले वर्ष से सरकार उससे कुछ न मांगेगी। मामला-जमीन का कानून बिल्कुल निराला है। एक वर्ष फसल बहुत अच्छी हुई। किसान से निश्चित मामला राशि वसूल की गई। फर्ज करो, अगले वर्ष फसल बिल्कुल फेल हो गई। तो माफी कोई नहीं होती। केवल मामले की वसूली मुलतवी हो जाती है। फर्ज करो, उससे अगले वर्ष फसल औसत दर्जे से कम हुई तो इस वर्ष वाला मामला वसूल कर लिया जावेगा और बीच वाले साल का मामला भी वसूल कर लिया जाएगा। जब तक मामला जमीन तीन फसलों तक लगातार बगैर वसूल किए बिना न रह जाए माफी का सवाल पैदा नहीं होता और सरकारी अफसरान इस बात की विशेष सावधानी रखते हैं कि जहां तक हो सके कोई रकम तीन फसलों तक लगातार इलतवा में न रहनी चाहिए। तहसीलदार व अफसर माल अपनी नेकनामी व कार्य कुशलता इसीस में समझते हैं कि किसानों को लगान देने मे कितनी ही कठिनाई पेश आए, लेकिन जहां तक पार बसावे इलतवा या माफी की नौबत न पहुंचे। इसलिए पटवारी बार-बार पैदावार की गलत रिपोर्ट करते हैं और तहसीलदार और अफसर माल पटवारियों को किसी कारणवश या अकारण गलत रिपोर्ट पेश करने की प्रेरणा देते हैं। इसके अलावा जहां पुख्ता-जमा का अमल है, वहां इलतवा या माफी के मामले में किसान अपने व्यक्तिगत रूप में कोई चीज नहीं है। जो कुछ होता है, तमाम गांव के लिए होता है। यदि इतफाक से फसल के मौके पर एक किसान का सारा कुटुम्ब बीमार हो जाए या अन्य प्रकार के इत्तफाकिया से फसल के मौके पर एक किसान का सारा कुटुम्ब बीमार हो जाए या अन्य प्रकार के इत्तफाकिया हालात से किसान एक बिसवा जमीन भी काश्त न कर सके, मगर सामूहिक रूप से इसकी रिहायश के गांव की पैदावार औसत दर्जे की या औसत दर्जे से अच्छी हो तो उस किसान को माफी या इलतवा की रियायत कतई नहीं मिल सकती।

किसान कहता है: सरकार अपना कुछ खर्च कम कर लेगी।

गैर-जमींदार कहता है: यदि सरकार खर्च कम न करे तो?

किसान कहता है: सरकार अपना घड़ा कहीं और से भर ले।

गैर-जमींदा जवाब देता है, ‘उस कहीं और से’ ही तो मैं घबराता हूं। नहीं भाई, मैं कोई जोखम उठाने के लिए तैयार नहीं। मेरी तो यह टेर रहेगी कि जमीन की बाबत जो कुछ सरकार कहती है वह बिल्कुल ठीक कहती है कि सरकार मालिक और किसान बाजार के दुकानदार की भांति किराएदार हैं।

किसान की शिकायत केवल इस बात पर समाप्त नहीं हो जाती कि उसकी हालत में कोई माफी नहीं, उसकी जमीन का एक-एक बिसवा मामला-जमीन से लदा हुआ है। इसके अलावा और भी शिकायतें हैं। जमीन की आमदनी को छोड़कर तमाम और पेशों की आमदनी पर टैक्स घटती-बढ़ती दर लगता है। यानी कम आय वाले को कम दर पर टैक्स देना पड़ता है और ज्यादा आमदनी वाले को ज्यादा दर पर।

जिन गांवों में जमा पक्की है, कच्ची नहीं है, वहां की हालत दयनीय है। एक गांव की भूमि बीस हजार बीघे है, लेकिन इसमें से किसी फसल में केवल पांच हजार बीघे जमीन काश्त होती है और पांच हजार बीघे में से फसल केवल एक हजार बीघे में पकती है यानी पुख्ता होती है, तो उस गांव के किसानों को पूरे बीस हजार बीघे जमीन की जमा अदा करनी पड़ती है। इस बात का कोई लिहाज नहीं किया जाता कि पंद्रह हजार बीघे जमीन में काश्त ही नहीं हुई या उन्नीस हजार बीघे जमीन में कोई फसल नहीं पकी। जमीन चाहे खाली रहे, चाहे काश्त की गई हो, चाहे फसल पकी हो या न पकी हो, परन्तु किसान पर जमा का डंडा हर हालत में कायम रहेगा। जिन लोगों का जमीन से कोई वास्ता नहीं और जिनको पंजाब के माल-गुजारी के तरीके की जानकारी न है, उनको यह सुनकर बड़ा आश्चर्य होगा कि जो गांव वाहिद मालिकों की सम्पति नहीं, बल्कि भाईचारे की शक्ल रखते हैं, वहां हर एक बिसवादार की जिम्मेदारी सामूहिक व व्यक्तिगत दोनों तरीके से होती है। मान लीजिए कि एक गांव का क्षेत्रफल दस हजार बीघे का है और इसमें बीसवेदारों की संख्या चार सै है। मुशतरकन व मुनफर्दन जिम्मेदारी का अर्थ यह है कि तमाम भमि के मालिक न केवल अपनी खेवट की जमा के जिम्मेदार हैं। यदि इनमें से एक या दो या दस बिसवेदारान अपनी जमा अदा न कर सकें या अदा करने से इन्कार कर दे ंतो उनकी जमा बाकीबिसवदारान से सामूहिक तौर पर वसूल की जा सकती है और इनमें से चाहे जिस बिसवेदार से भी वसूल की जा सकती है।

वसूली के तरीके भी निहायत कठोर हैं। यदि सरकार चाहे तो बाकीदार की खड़ी फसल को कुर्क कर सकती है। चंद चीजों की कुरकी से छूट है, बाकी तमाम चल व अचल सम्पति को कुर्क व नीलाम किया जा सकता है। कर न देने वालों को भी जेल भेजा जा सकता है। जमीन को छीनकर दूसरे के हवाले किया जा सकता है। कलैक्टर स्वयं जमीन को अपने अधीन नियंत्रण में ले सकता है। जमीन को जब्त करके नीलाम किया जा सकता है। एक आसामी के बकाया के दंड के रूप में नंबरदार को हवालात में दिया जा सकता है। यही नहीं बल्कि इक्ट्ठी जिम्मेदारी के असूल के मातहत प्रत्येक बिसवेदार के विरुद्ध दूसरे बाकीदार की जमा वसूल करने के लिए वह तमाम जबरन कार्रवाइयां प्रयोग की जा सकती हैं जिनका ऊपर जिक्र किया गया है। जिस कद्र कठोर शिकंजे में किसान की जान है, कोई बताए तो सही इस तरक्की और तहजीब के जमाने में, किसी और की जान ऐसे शिकंजे में खिंची हुई है? हरगिज नहीं। यदि एक इन्कम टैक्स वाला व्यक्ति आय कर देने से इन्कार कर दे तो सरकार इस टैक्स की वसूली से इस इन्कार करने वाले की केवल चल सम्पति को कुर्क कर सकती है इसकी अचल सम्पति मसलन जरअई जमीन, मकान या दुकान को सरकार छू नहीं सकती। मगर मामला जमीन की वसूली के लिए जमींदार की हर किस्म की जायदाद कुर्क या नीलाम हो सकती है।

किसान क्या है? एक अजीब हस्ती है जो इस दुनिया में असंख्य और निहायत अनोखी जिम्मेदारियां रखता है लेकिन जिसके अधिकार लुप्त व खोए हुए दिखाई देते हैं। क्या करें? बेचारा किसान, बेयार व बेमददगार है। अपने और पराये सभी इससे आंखें चुराए हुए हैं। आह! इस दुनिया में इसका कोई नहीं।

सर छोटू राम

सर छोटू राम

जन्म: 24 नवम्बर 1881, दिल्ली-रोहतक मार्ग पर गांव गढ़ी-सांपला, रोहतक (हरियाणा-तत्कालीन पंजाब सूबा) में       चौधरी सुखीराम एवं श्रीमती सिरयां देवी के घर। 1893 में झज्जर के गांव खेड़ी जट में चौधरी नान्हा राम की सुपुत्राी ज्ञानो देवी से 5 जून को बाल विवाह। शिक्षा: प्राइमरी सांपला से 1895 में झज्जर से 1899 में, मैट्रिक, एफए, बीए सेन्ट स्टीफेन कॉलेज दिल्ली से 1899-1905। कालाकांकर में राजा के पास नौकरी 1905-1909। आगरा से वकालत 1911, जाट स्कूल रोहतक की स्थापना 1913, जाट गजहट (उर्दू साप्ताहिक) 1916, रोहतक जिला कांग्र्रेस कमेटी के प्रथम अध्यक्ष 1916-1920, सर फजले हुसैन के साथ नेशनल यूनियनिस्ट पार्टी (जमींदार लोग) की स्थापना 1923, डायरकी में मंत्राी 1924-1926, लेजिस्लेटिव काउंसिल में विरोधी दल के नेता 1926-1935 व अध्यक्ष 1936, सर की उपाधि 1937, प्रोविन्सियल अटॉनमी में मंत्री 1937-1945, किसानों द्वारा रहबरे आजम की उपाधि से 6 अप्रैल 1944 को विभूषित, भाखड़ा बांध योजना पर हस्ताक्षर 8 जनवरी 1945। निधन: शक्ति भवन (निवास), लाहौर-9 जनवरी 1945। 1923 से 1944 के बीच किसानों के हित में कर्जा बिल, मंडी बिल, बेनामी एक्ट आदि सुनहरे कानूनों के बनाने में प्रमुख भूमिका। 1944 में मोहम्मद अली जिन्ना की पंजाब में साम्प्रदायिक घुसपैठ से भरपूर टक्कर। एक मार्च 1942 को अपनी हीरक जयंती पर उन्होंने घोषणा की-‘मैं मजहब को राजनीति से दूर करके शोषित किसान वर्ग और उपेक्षित ग्रामीण समाज कीसेवा में अपना जीवन खपा रहा हूं।’ भारत विभाजन के घोर विरोधी रहे। 15 अगस्त 1944 को विभाजन के राजाजी फॉर्मुले के खिलाफ गांधी जी को ऐतिहासिक पत्र लिखा।

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